राजस्थान में हस्तकला

राजस्थान के प्रमुख हस्तकला एवं लोक कला


- हाथ से वस्तुएँ बनाने की कला।
- राजस्थान सम्पूर्ण देश में हस्तकलाओं के आगार के रूप में जाना जाता है।
- हस्तकला, एक लघु उद्योग है।
- लघु उद्योगों का विकास एवं संरक्षण, राजसीको (राजस्थान लघु उद्योग विकास निगम) द्वारा किया जाता है।
- राजस्थान में हस्तकला का प्रमुख केन्द्र- बोरानाडा (जोधपुर)
ब्लू पॉटरी- जयपुर

- राजस्थान में ब्लू पॉटरी निर्माण की शुरुआत जयपुर में सवाई रामसिंह-द्वितीय (1835-1880 ई.) के काल में हुई।
- ब्लू पॉटरी – चीनी मिट्टी के बर्तनों पर नीले रंग की चित्रकारी।
- यह कला मूल रूप से चीन और फारस की है, जो मुगलकाल में भारत आई।
- दिल्ली के भोला नामक कलाकार से जयपुर निवासी चूड़ामन और कालू कुम्हार ने यह कला सीखकर राजस्थान में इसकी शुरुआत की।
- पद्मश्री से सम्मानित कृपाल सिंह शेखावत ने इस कला को देश-विदेश में पहचान दिलाई।
- सन् 1976 में जयपुर के कृपाल सिंह शेखावत को ब्लू पॉटरी के लिए सम्मानित किया गया। स्वर्गीय नाथी बाई इस काल की प्रसिद्ध महिला कलाकार थी।
- बर्तनों पर हरा काँच, कथीरा, सागी, क्वार्ट्ज पाउडर और मुल्तानी मिट्टी का घोल चढ़ाया जाता है।
- बर्तनों पर फूल-पत्तियों, देवी-देवताओं व अन्य दृश्यों के चित्र बनाए जाते हैं।
- तैयार पॉटरी को 800° सेन्टीग्रेड तापमान में पकाया जाता है।
- वर्तमान में ब्लू पॉटरी के प्रमुख कलाकार– त्रिलोकचन्द, दुर्गालाल, गिरिराज हनुमान सहाय, भगवान सहाय व भौंरू खारवाड़ आदि हैं।
ब्लैक पॉटरी - कोटा

- चीनी मिट्टी के बर्तनों पर काले रंग की चित्रकारी।
- ब्लैक पॉटरी, राजस्थान की सबसे सस्ती पॉटरी है।
- ब्लैक पॉटरी का कार्य कप, प्लेटे, गमलेदान, कुड़ेदान आदि पर किया जाता है।
कागजी पॉटरी – अलवर

- कागज से निर्मित बर्तनों पर चित्रकारी।
- कागज से बर्तन या मूर्ति बनाने की कला पेपरमेशी कहलाती है।
- इस पॉटरी से निर्मित बर्तनों में तरल पदार्थों का प्रयोग नहीं होता है।
सुनहरी पॉटरी- बीकानेर

- ‘गोल्डन पॉटरी’ बीकानेर की प्रसिद्ध है।
थेवा कला – प्रतापगढ़

- जनक - नाथूजी सोनी
- मुख्य केन्द्र - प्रतापगढ़
- शुरुआत – राजा सावंतसिंह
- डाक टिकट जारी – नवम्बर, 2002
- थेवा कला, काँच पर सोने का सूक्ष्म चित्रांकन है।
- इसके लिए ‘रंगीन बेल्जियम काँच’ का प्रयोग किया जाता है।
- थेवा कला में नारी शृंगार के आभूषण सजावटी वस्तुएँ व देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को अलंकृत रूप दिया जाता है।
- थेवा कला पाँच सौ वर्षों से प्रतापगढ़ के सोनी परिवार तक ही सीमित है।
- यह परिवार इस कला को गोपनीय रखता है इसलिए परिवार की बेटियों को भी यह कला नहीं सिखाई जाती है।
- थेवा कला के प्रमुख कलाकार – जगदीश सोनी, महेश सोनी, रामप्रसाद सोनी, बेनीराम सोनी रामविलास सोनी।
- जस्टिन वकी (अंग्रेज अधिकारी) ने इस कला को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाया।
मीनाकारी – जयपुर

- जयपुर में मीनाकारी की कला, कच्छवाहा शासक मिर्जा राजा मानसिंह (1589-1614 ई.) द्वारा लाहौर से लाई गई।
- लाहौर में यह कला मुगलों द्वारा फारस से लाई गई।
- जयपुर के साथ-साथ नाथद्वारा, बीकानेर में भी मीनाकारी का काम होता है।
- मीनाकारी के लिए जयपुर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध है।
- जयपुर में मीनाकारी, सोने-चाँदी व ताँबे से निर्मित आभूषणों पर की जाती है।
- इस कला के लिए परंपरागत रूप से काले, नीले, नारंगी, गुलाबी, पीले रंग का प्रयोग किया जाता है।
- इस कला के लिए कुदरत सिंह को वर्ष 1988 में ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया गया।
- प्रसिद्ध कलाकार – दुर्गासिंह, काशीनाथ व कैलाशचंद्र।
- मीनाकारी की सबसे बड़ी मण्डी जैम्स एण्ड ज्वैलरी पार्क, सीतापुरा (जयपुर) है।
- ताँबे की मीनाकारी, भीलवाड़ा की प्रसिद्ध है।
बंधेज - जयपुर

- इस कला का कार्य जयपुर व अलवर में मुख्य रूप से होता है।
- इस काल में पीतल की घिसाई, पॉलिश एवं उस पर कलात्मक मीनाकारी की सजावटी वस्तुएँ बनाने का कार्य होता है।
उस्ता कला - बीकानेर

- उस्ता कला – ऊँट की खाल पर स्वर्ण मीनाकारी और मुनव्वती का कार्य उस्ता कला के नाम से जाना जाता है।
- प्रमुख केंद्र – बीकानेर
- इस कला के लिए हिसामुद्दीन उस्ता को वर्ष 1986 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया।
- उस्ता कला के प्रमुख कलाकार- हनीफ उस्ता, जलीम उस्ता
- राजस्थान लघु उद्योग निगम उस्ता के नाम पर बीकानेर में ‘कैमल हैयर हाईड ट्रैनिंग सेंटर’ खोलकर इस कला को प्रोत्साहन दे रहा है।
मथैरणा कला - बीकानेर

- मथैरणा कला किसी भी धार्मिक अथवा पौराणिक स्थल पर धार्मिक अथवा पौराणिक ग्रंथों का भित्ति चित्रण ‘मथैरणा कला’ कहलाती है।
- यह कला मुख्यत: जैन धर्म से संबंधित है।
- इस कला के कलाकार ‘उस्ताद’ कहलाते हैं।
- मथैरणा कला के प्रमुख उस्ताद- रामलाल, मुन्नालाल व हसन हैं।
वस्त्र पर हस्तकला
दाबू प्रिंट चित्तौड़गढ़

- प्रमुख केंद्र - आकोला गाँव, चित्तौड़गढ़
- कपडे़ में रंगाई–छपाई के दौरान जिस जगह पर रंग नहीं चढ़ाना हो, उसे ‘लई या लुगदी’ से दबा दिया जाता है। इसी लुई या लुगदी को ‘दाबू’ कहा जाता है।
- दाबू प्रिंट बेडशीट, चूंदड़ी, कपड़ों, साड़ियों आदि पर किया जाता है।
- इनकी रंगाई-छपाई मुख्यत: मुम्बई के सफेद लट्ठे पर की जाती है।
आजम प्रिंट

- प्रमुख केन्द्र - आकोला, चित्तौड़गढ़
जाजम प्रिंट
- प्रमुख केन्द्र - चित्तौड़गढ़
- गाड़िया लोहारों की महिलाओं के कपड़े इसी प्रिंट में बनाए जाते हैं।
बगरू प्रिंट – जयपुर

- प्राकृतिक रंगों का प्रयोग किया जाता है।
- बगरू प्रिंट, कपड़े पर बेल-बुँटों की छपाई हेतु प्रसिद्ध है।
- इसके प्रमुख कलाकार रामकिशोर छीपा है जिन्हें वर्ष 2009 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया।
सांगानेरी प्रिंट

- इस प्रिंट में काला और लाल रंगों का अधिक प्रयोग किया जाता है।
- मुन्नालाल गोयल, सांगानेरी प्रिंट को देश-विदेश में भी लोकप्रिय बनाया।
- मलमली कपड़ों पर छपाई हेतु प्रसिद्ध है।
- छपाई कला का कार्य – गमछा, साफा, तकिया, दुपट्टा, ओढ़नी आदि पर किया जाता है।
अजरक प्रिंट

- मुख्य केंद्र - बाड़मेर
- यह दोनों तरफ से छपाई होती है।, लाल और नीले रंगों में होती है और इसके अलंकरण ज्यामितीय होते हैं और काफी कुछ तुर्की शैली से मिलते-जुलते होते हैं।
- नीले रंग व ज्यामितीय अंलकरण का अधिक प्रयोग होता है।
- तुर्की शैली का अधिक प्रयोग होता है।
मलीर प्रिंट

- मुख्य केन्द्र - बाड़मेर
- काले व कत्थई रंग का अधिक प्रयोग होता है।
- मोम का दाबू – सवाई माधोपुर
मिट्टी का दाबू – बालोतरा (बाड़मेर)
- गेहूँ का दाबू – सांगानेर (जयपुर)
कोटा डोरिया या मसूरिया साड़ी
- प्रमुख केन्द्र – कैथून, कोटा व मांगरोल, बाराँ
- झाला जालिम सिंह ने इस कला के कलाकार मंसूर अहमद को
हैदराबाद से लाए थे।
- मंसूर अहमद के नाम पर मंसूरिया कला भी कहा जाता है।
- कैथून को बुनकरों का गाँव कहते हैं।
बंधेज - जयपुर

- बंधेज से आशय कपड़े को बाँधकर रंगना।
- यह कला बाँधों और रंगों (Tie & Die) के नाम से प्रसिद्ध है।
- बंधेज का कार्य करने वाले व्यक्ति को ‘बंधारा, चढ़ावा व रंगरेज’ कहा जाता है।
- दानेदार बंधाई मोठड़ा के नाम से जानी जाती है।
- बंधेज कार्य, जयपुर का प्रसिद्ध है।
- चूँदड़ी (ओढ़नी) और साफे पर बंधेज का कार्य प्रसिद्ध है।
पीला पोमचा

– पोमचा का संबंध पदम (कमल) से है। अत: कमल के फूल वाली ओढ़नी पोमचा कहलाती है।
- यह मुख्यत: दो प्रकार के होते हैं।
1. लाल गुलाबी पोमचा – बेटी के जन्म पर देने का रिवाज है।
2. लाल-पीला पोमचा – बेटे के जन्म पर देने का रिवाज है।
- पोमचा शिशु जन्म पर नव प्रसूता के लिए उसके मातृ पक्ष की तरफ से आता है।
- इनका सर्वाधिक प्रचलन शेखावाटी एवं पूर्वी राजस्थान में है।
- पीले पोमचे का एक प्रकार पाटोदा का लूगड़ा है जो सीकर के लक्ष्मणगढ़ तथा झुंझुनूँ के मुकन्दगढ़ का प्रसिद्ध है।
लहरिया

- प्रमुख केंद्र – जयपुर
- लहरिए एक, दो, तीन, पाँच और सात रंगों में बनाए जाते हैं।
- यदि आड़ी धारिया केवल एक ओर से हो तो वह लहरिया कहलाता है।
- यदि धारियाँ दोनों ओर से एक दूसरे को काटती हुई आ रही हो तो वह मोठड़ा कहलाता है।
- जयपुर के रंगरेज व नीलगर, राजशाही लहरिया समुद्र लहर नामक लहरिया रंगते थे।
- जयपुर का लहरिया व पोमचा प्रसिद्ध है।
- बीकानेर का लहरिया व मोठड़ा प्रसिद्ध है।
चूनड़ी

- जोधपुर की चूनड़ी प्रसिद्ध है।
- चूनड़ी के बंधेज सबसे प्रसिद्ध है।
- बारीक बंधेज की चूनड़ी शेखावाटी की प्रसिद्ध है।
- मामा की ओर से अपनी भांजी को विवाह के अवसर पर दी जाने वाली चूनड़ी को मामा चूनड़ी कहते हैं।
- वर पक्ष की ओर से वधू के लिए भेजी जाने वाली चूनड़ी बडूली कहलाती है।
मलयगिरि
- भूरे रंग के इस रंग को कई मिश्रणों से तैयार किया जाता था। इस रंग में रंगा हुआ वस्त्र वर्षों तक सुगंधित रहता था।
- जयपुर के महाराजा सवाई रामसिंह द्वितीय कीअंगरखिया अभी तक सुगंधित है।
अमोवा
- एक रंग की रंगतों में खाकी से मिलती जुलती रंगत अमोवा कहलाती है।
- इसका प्रयोग शिकारी लोग करते थे।
जसोल की जट पट्टी
- प्रमुख केन्द्र - जसोल गाँव, बाड़मेर
- जट पट्टी उद्योग को जिरोही, भाकला गंदहा के नाम से जाना जाता है।
दरी व कालीन
- प्रमुख केंद्र - जयपुर व अजमेर
- जयपुर का गलीचा उद्योग सर्वाधिक प्रसिद्ध है।
- जयपुर व बीकानेर की जेलों में दरियाँ बनाई जाती है।
- सालावास गाँव (जोधपुर)।
- टांकला गाँव (नागौर)।
- लवाण गाँव (दौसा)
- टांकला गाँव सुन्दर, आकर्षण एवं मजबूत दरी निर्माण के लिए प्रसिद्ध है।
पट्टु, बरड़ी, शॉल, लोइयां

- जैसलमेर में बनने वाले कलात्मक ऊनी वस्त्र।
- यह ‘चौकला भेड़ (मेरिनो) की ऊन’ से तैयार की जाती है।
- यहाँ की पुरुषों के लिए हीरावल शॉल प्रसिद्ध है।
- जालर के लेटा गाँव गुढ़ा बालोतान गाँव ‘खेसले’ की बुनाई के लिए प्रसिद्ध है।
रंगाई-छपाई का कार्य
रेवड़ी या खड्ढी की छपाई
- लाल रंग की ओढ़नियों पर गोंद मिश्रित मिट्टी की छपाई की जाती है, इसके बाद लकड़ी के छापों द्वारा सोने-चाँदी के तलक की छपाई की जाती है।
- खड्ढी की छपाई के लिए जयपुर एवं उदयपुर प्रसिद्ध है।
टुकड़ी छपाई
- जालोर और मारोठ, नागौर टुकड़ी छपाई के लिए प्रसिद्ध है।
रंगरेज
- वस्त्रों की रंगाई-छपाई करने वाला मुस्लिम कारीगर।
छीपा या छींपा
- कपड़ों पर छपाई व रंगाई का कार्य करने वाले को ‘छींपा’ कहा जाता है।
नीलगर
- वैदिक काल में भी वस्त्रों को रंगना जानते थे, नील के रंग से वस्त्र रंगकर छपाई का काम करने वाले करीगर नीलगर के नाम से प्रसिद्ध थे।
- सवाई जयसिंह द्वारा स्थापित कारखानों में सीवन खाना (कपड़े सिलना), रंग खाना, (कपड़े रंगना) व छापाखाना (कपड़े छापना) आदि प्रमुख कारखाने थे।
कढ़ाई
मुकेश
- सूती या रेशम कपड़े पर बादले से छोटी-छोटी बिंदकी की कढ़ाई ‘मुकेश’ कहलाती है।
जरदोजी
- सुनहरे धागो से जो कढ़ाई का कार्य किया जाता है उसे ‘जरदोजी’ कहते हैं।
- इसमें सुनहरे तार का प्रयोग होता है उसे ‘कलाबत्तू’ कहते हैं।
कशीदाकारी

- कशीदाकारी कार्य, बाड़मेर-जैसलमेर जिले की महिलाओं द्वारा किया जाता है।
- इसके लिए बाड़मेर जिले की ‘रमाबाई’ को राज्यस्तरीय पुरस्कार दिया गया।
पेचवर्क
- कपड़ों को तरह-तरह से काटकर, कपड़ों पर सिल दिया जाता है, जिसे पेचवर्क कहा जाता है।
गोटा


- सोने और चाँदी के परतदार तारों से वस्त्रों पर जो कढ़ाई का काम किया जाता है उसे गोटा कहते हैं।
- गोटे का काम जयपुर व बातिक का काम खण्ड़ेला में होता है।
- लप्पा, लप्पी, किरण, बाँकड़ी, गोखरू, बिजिया, मुकेश, नक्शी आदि गोटे के प्रमुख प्रकार हैं।
- जयपुर का गुलाल गोटा देशभर में प्रसिद्ध है।
- खण्डेला, सीकर अपने गोटा उद्योग के लिए प्रसिद्ध है।
काष्ठ कलाकृतियाँ
- इस कला में लकड़ी से विविध प्रकार की कलात्मक वस्तुएँ बनाई जाती है।
- इस कला प्रधान केन्द्र बस्सी, चित्तौडगढ़ है। जहाँ पर लकड़ी के बेवाण, कावड़ तथा रंगाई-छपाई के ठप्पे तैयार किए जाते हैं।
- लकड़ी से निर्मित खिलौनों एवं कठपुतली निर्माण के लिए उदयपुय प्रसिद्ध है।
- लकड़ी की मूर्तियों के लिए जेठाना, डूँगरपुर तथा फर्नीचर के लिए शेखावाटी एवं बीकानेर प्रसिद्ध है।
कठपुतली

- उद्भव स्थल- राजस्थान
- नृतक जाति - नट या भाट।
- कठपुतली निर्माण के केन्द्र - उदयपुर, चित्तौड़गढ़ व कठपुतली नगर (जयपुर)।
- कठपुतली के क्षतिग्रस्त होने पर इसे फेंका न जाकर जल में प्रवाहित कर दिया जाता है।
- वर्षा काल में कठपुतली का प्रदर्शन नहीं होता है।
- कठपुतलियाँ अरडू की लकड़ी की बनाई जाती हैं।
- स्व. श्री देवीलाल सामर के नेतृत्व में लोक कला मंडल, उदयपुर ने कठपुतली कला को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- इस कला के विकास के लिए सन् 1968 में स्व. श्रीदेवीलाल सामर ने पद्मश्री से सम्मानित किया गया है।
- प्रसिद्ध कठपुतली विषय
- राजा विक्रमादित्य की सिंहासन बतीसी
- पृथ्वीराज संयोगिता।
- नागौर के अमरसिंह राठौड़ का खेल।
- चार प्रकार की कठपुतलियाँ हैं -
1. दस्ताना पुतली
2. छड़ पुतली
3. छाया पुतली
4. धागा या सूत्र पुतली
- कठपुतली कला का जनक देवीलाल सामर को माना जाता है।
कावड़

- मन्दिरनुमा काष्ठ कलाकृति, जिसमें कई कपाट (द्वार) होते हैं।
- इन कपाटों पर विभिन्न प्रकार के धार्मिक एवं पौराणिक कथाओं से संबंधित देवी-देवताओं के मुख्य प्रसंग चित्रित होते हैं।
- कावड़ के चित्रों में राम जीवन की बहुलता के कारण इसे राम जी की कावड़ भी कहते हैं।
- यह एक चलता-फिरता देवघर है।
- कावड़ निर्माण के लिए चित्तौड़गढ़ का बस्सी गाँव प्रसिद्ध है।
- कावड़ पूरी लाल रंग से रंगी जाती है व उसके ऊपर काले रंग से पौराणिक कथाओं का चित्रांकन किया जाता है।
- कावड़ निर्माण खेरादी जाति द्वारा किया जाता है।
- मांगीलाल मिस्त्री कावड़ चित्रण के लिए प्रसिद्ध है।
बेवाण

- यह लकड़ी का छोटा-सा मंदिर होता है जिसे मिनिएचर वुड टेम्पल कहा जाता है।
- अनंत चतुर्दशी एवं देवझूलनी एकादशी को बेवाण निकालने की परम्परा सदियों से चली आ रही है।
- खाण्डा (खांडे)
- होली के अवसर पर लकड़ी से निर्मित तलवारनुमा आकृति। राजस्थान में दुल्हन द्वारा दुल्हे के घर खांडे भेजने की परम्परा है।
- चौपड़े
- विवाह एवं मांगलिक अवसरों पर कुंकुम, अक्षत, चावल आदि रखने हेतु प्रयुक्त लकड़ी का पात्र।
- पातरे-तिपरणी
- श्वेताम्बर जैन साधु-सन्तों के प्रयोग में आने वाले लकड़ी के पात्र।
- पीपाड़ (जोधपुर) में विशेष रूप से बनाए जाते हैं।
- तोरण :- विवाह के अवसर पर वधू के घर के मुख्य प्रवेश द्वार पर लटकाई जाने वाली लकड़ी की कलाकृति जिसके शीर्ष पर मोर या तोता बना होता है।
- तोरण जाल, बेर या खेजड़ी की लकड़ी का बना होता है।
- वरवधू के घर में प्रवेश करने से पहले हरी डाली, तलवार, खाडे या गोटा लगी डंडी से स्पर्श करता है।
- तोरण शक्ति परीक्षण का प्रतीक माना जाता है। जयपुर का (त्रिपोलिया बाजार) में तोरण निर्माण के लिए प्रसिद्ध हैं।
- छापे :- कपड़े पर हाथ से छपाई करने में प्रयुक्त लकड़ी के छापे खेरादी जाति के लोग बनाते हैं।
- बाजोट :- लकड़ी की चौकी जिसे भोजन या पूजा के समय प्रयुक्त करते हैं।
बादले – जोधपुर

- बादले, पानी भरने के बर्तन जो जिंक से बने होते हैं और इन पर कपड़े या चमड़े की परत चढ़ाई जाती है।
- बादले, जोधपुर के प्रसिद्ध हैं।
- बादले में पानी लम्बे समय तक ठण्डा रहता है।
लाख का काम

- लाख के आभूषणों के लिए जयपुर एवं जोधपुर प्रसिद्ध है।
- लाख से चूड़ियाँ, पशु-पक्षी अन्य सजावटी उपकरण बनाए जाते है।
- जयपुर निवासी अयाज अहमद लाख के कार्य के लिए लोकप्रिय हैं।
- लाख का कार्य करने वाले व्यक्ति को ‘मणिहार’ कहा जाता है।
कुट्टी/पेपरमेशी का काम

- कुट्टी के काम के लिए जयपुर प्रसिद्ध है। सवाई रामसिंह द्वितीय (1835 – 1880 ई.) के शासनकाल सें जयपुर में कुट्टी का कार्य हो रहा है।
- कागज, चाक, फेवीकोल, गोंद व मिट्टी के घोल से निर्मित लुगदी को ‘कुट्टी’ कहा जाता है।
- जाजम की छपाई के लिए चित्तौड़गढ़ प्रसिद्ध है।
मृण्य शिल्प या टेराकोटा

- मिट्टी से मूर्तियाँ, विभिन्न सजावटी व उपयोगी वस्तुएँ तैयार कर पकाना, टेराकोटा कहलाता है।
- इस कला से मिट्टी की मूर्तियाँ बनाई जाती हैं।
- मिट्टी के बर्तन, खिलौने, ईंटें शेखू आदि बनाने का कार्य करने वाला व्यक्ति कुंभार या कुम्हार कहलाता है।
- मोलेला, राजसमंद के कुम्हार अपने टेराकोटा कार्य के लिए देश-विदेश में जाने जाते हैं।
- मोलेला तथा हरजी दोनों ही स्थानों में कुम्हार सिरेमिक जैसी मिट्टी में गधे की लीद मिलाकर मूर्तियाँ बनाते हैं व उन्हें उच्च ताप पर पकाते हैं।
- तीव्र लाल, सिन्दूरी, पीला, हरा नीला और कहीं-कहीं फिरोजी रंग इन मूर्तियों का आकर्षक और रहस्यमय रूप प्रदान करता है।
- जालोर के हरजी गाँव के कुम्हार मामाजी एवं गोगाजी के घोड़े बनाते हैं।
- बू-नरावता गाँव, नागौर में मिट्टी के खिलौने, गुलदस्त, गमले, पक्षियों की कलाकृतियों के काम के लिए प्रसिद्ध हैं।
- बसवा गाँव, दौसा का अपने मिट्टी के विविध प्रकार, आकार एवं चित्राकर्षक अलंकरण वाले बर्तनों के लिए जाना जाता है।
- यहाँ के मिट्टी के बर्तनों में पानी ठण्डा रखने के लिए कुंजा बड़ा प्रसिद्ध है।
- भरतपुर का मेहटोली गाँव अपनी मृत्तिका शिल्प के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के प्रेमसिंह प्रसिद्ध मृत्तिका शिल्पकार है।
- सवाईमाधोपुर के श्यामोता गाँव में कुम्हारों द्वारा बनाए जाने वाले मिट्टी के खिलौने एवं बर्तन बड़े प्रसिद्ध है।
जेवर बनाने वाले शिल्प
जड़ाई:-

- सोने अथवा चाँदी के आभूषणों में नग/नगीना को जमाने की क्रिया।
- जड़ाऊ गहनों के लिए जयपुर, जोधपुर, बीकानेर एवं उदयपुर प्रसिद्ध है।
- नग/नगीना - आभूषणों पर जड़े जाने वाले मूल्यवान पत्थर।
- जड़िया – नगों की जड़ाई करने वाले कारीगर।
बरक या वर्क:-
- बरक – मशीन से खीचकर अथावा हथौड़े से कुटकर सोने अथवा चाँदी को अत्यन्त पतले, झिल्ली के समान बनाए गए ‘पत्तर’ को बरक करते हैं।
- बरक बनाने वाला ‘बरकसाज’ कहलाता है।
- वर्क – चाँदी के तार को हरिण की खाल के मध्य रखकर पीठने के पश्चात् बनने वाला बारीक पत्तर के समान टुकड़ा वर्क या तबक कहलाता है।
- ‘वर्क’ का कार्य जयपुर का प्रसिद्ध है।
कलईगिरी:-
- कलई – ताँबा, पीतल आदि धातुओं के बर्तनों पर की जानी वाली चमक।
- कलईगर – कलई करने वाला कारीगर।
चमड़े की जूतियाँ:-
- जूती बनाने का काम रेगर, मोची और चमार करते हैं।
- छोटे बच्चों की घुण्डी और तसमें वाली जूतियाँ ‘खाल्या’ या ‘खोल्या’ कहलाती है।
- दुल्हे व दुल्हन की जुतियाँ ‘बिनोटा’ कहलाती है।
हस्तकला और उनके कलाकार
हस्तकला | प्रसिद्ध कलाकार |
मीनाकारी | पद्मश्री कुदरतसिंह |
फड़ पेंटिंग | पद्मश्री श्रीलाल जोशी, विजय जोशी |
थेवा कला | नाथूजी सोनी |
उस्ता कला | पद्मश्री हिसामुद्दीन, मोहम्मद हनीफ |
ब्लू पॉटरी | पद्मश्री कृपालसिंह शेखावत गिरिराज त्रिलोकचन्द, भगवान सहाय |
हस्तकला | प्रमुख केंद्र |
1. फड़ कला | शाहपुरा, भीलवाड़ा |
2. पिछवाई कला | नाथद्वारा, राजसमंद |
3. थेवा कला | प्रतापगढ़ |
4. उस्ता कला | बीकानेर |
5. मथैरणा | बीकानेर |
6. सुनहरी पॉटरी | बीकानेर |
7. कागजी पॉटरी | अलवर |
8. ब्लैक पॉटरी | कोटा |
9. ब्लू पॉटरी | जयपुर |
10. मीनाकारी | जयपुर |
11. हाथी दाँत की वस्तुएँ | जयपुर |
12. कठपुतली कला | जयपुर |
13. पाव रजाई | जयपुर |
14. रत्नाभूषण का काम | जयपुर |
15. संगमरमर की मूर्तियाँ | जयपुर |
16. बन्धेज | जयपुर, जोधपुर, शेखावाटी |
17. जरी व गोटे का काम | जयपुर, भिनाय, अजमेर, खण्डेला, सीकर |
18. लकड़ी का चित्रित फर्नीचर | जयपुर, किशनगढ़, अजमेर |
19. चंदन की कलात्मक वस्तुएँ | जयपुर, चूरू |
20. लाख का काम (चूड़ियाँ) | बगरू, जयपुर, जोधपुर |
21. बगरू प्रिंट | जयपुर |
22. सांगानेरी प्रिंट | जयपुर |
23. जाजम या आजम प्रिंट | आकोला, चित्तौड़गढ़ |
24. दाबू प्रिंट | आकोला, चित्तौड़गढ़ |
25. अजरक प्रिंट | बाड़मेर |
26. मलीर प्रिंट | बाड़मेर |
27. कोटा-डोरिया (मसूरिया डोरिया) | कैथून, कोटा |
28. काष्ठ-कला | बस्सी, चित्तौड़गढ़ |
29. लकड़ी के फर्नीचर | बाड़मेर |
30. चमड़े की जूतियाँ | जयपुर, जोधपुर, भीनमाल, जालोर |
31. मलमल की तनसुख | मथानिया, जोधपुर |
32. बादले | जोधपुर (जस्ते की पानी की बोतल) |
33. दरी-पटिटयाँ | टाँकला, नागौर, सालावास, जोधपुर |
34. गलीचे | जयपुर |
35. टेराकोटा, मृण्मूर्तियाँ | मोलेला, राजसमंद, बस्सी, चित्तौड़गढ़ |
36. मोजड़ी कशीदादार | जोधपुर, भीनमाल, जालोर |
37. गुलकंद | पुष्कर, अजमेर, खमनौर, राजसमंद |
38. शीशम का फर्नीचर | हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर |
39. सुराहियाँ (मटके) | रामसर, बीकानेर |
40. कृषि उपकरण (हैंडटूल्स) | गजसिंहपुर, श्रीगंगानगर, नागौर |
41. सोपस्टोन रमकड़ा | गलियाकोट, डूँगरपुर |
42. सूँघनी नसवार | ब्यावर, अजमेर |
43. जस्ते की मूर्तियाँ | जोधपुर |
44. मुकेश का काम | जयपुर, शेखावाटी |
45. तारकशी | नाथद्वारा |
46. नमदे | मालपुरा, टोंक, बीकानेर |
47. लाल व काले पत्थर की मूर्तियाँ | तलवाड़ा (बाँसवाड़ा), थानागाजी (अलवर) |
48. आलागीला | शेखावाटी क्षेत्र |
49 चद्दर की छपाई | सांगानेर, बगरू, पाली, बालोतरा, बाड़मेर |
राजस्थान के जी.आई टैग |
1. बगरू प्रिंट – जयपुर |
2. बीकानेर भुजिया – बीकानेर |
3. ब्लू पॉटरी – जयपुर |
4. मकराना संगमरमर – नागौर |
5. कोटा डोरिया – कोटा |
6. मोलेल मिट्टी कार्य – नाथद्वारा, राजसमंद |
7. फुलवारी – राजस्थान, पंजाब, हरियाणा |
8. सांगानेरी – प्रिंट – जयपुर |
9. थेवा कला – प्रतापगढ़ |
लोक कलाएँ
- कलाएँ जीवन की सुरुचिपूर्ण अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम हैं। आमजन अर्थात् सभी लोगों के मध्य विकसित एवं संचारित कला को लोक-कला कहा जाता है। जनमानस की सांस्कृतिक इच्छाएँ एवं आकांक्षा जब कलात्मक सौन्दर्य के साथ सहज अभिव्यक्ति पाती है एवं उपलब्ध वस्तुओं की सहायता से अनूठे रूप में प्रस्तुत की जाती है तो वह लोक कला का स्वरूप ग्रहण करती है। राजस्थान की लोक कलाओं ने विश्व बाजार और कला प्रेमियों के मन में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई हैं।
फड़ चित्रण

- रेजी अथवा खादी के कपड़े पर लोक देवताओं की जीवन गाथाएँ, धार्मिक व पौराणिक कथाएँ व ऐतिहासिक गाथाओं के चित्रित स्वरूप को ही ‘फड़’ कहा जाता है।
- फड़ चित्रण का मुख्य केन्द्र - शाहपुरा (भीलवाड़ा)
- फड़ चित्रण का उद्गम मेवाड़ चित्रशैली के भित्ति चित्रण से माना जाता है।
- लगभग 700 वर्ष पूर्व पूरे (मेवाड़) में विकसित परम्परागत ‘फड़’ चित्र शैली के प्रसिद्ध चित्रकार पांचाजी जोशी ने शाहपुरा में फड़ चित्रण को आगे बढ़ाया।
- शाहपुरा (भीलवाड़ा) का जोशी परिवार फड़ चित्रण हेतु सम्पूर्ण देश में प्रसिद्ध है।
- श्रीलाल जोशी ने ‘फड़’ चित्रकला को राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई है। श्रीलाल जोशी को वर्ष 2006 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया है।
- श्रीलाल जोशी के शिष्य जयपुर निवासी प्रदीप मुखर्जी ने फड़ शैली में नए प्रयोग कर महत्त्वपूर्ण पौराणिक आख्यानों (श्रीमद्भागवत, गीत-गोविन्द आदि) का चित्रण किया।
- वर्तमान में अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त फड़ कलाकार – विजय जोशी।
- श्रीमती पार्वती जोशी - कन्हैयालाल जोशी की पत्नी, जो देश की प्रथम फड़ चितेरी महिला है।
- गौतली देवी - अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त फड़ कलाकार
विशेषताएँ-
- फड़ चित्रण में लोक नाट्य, लोक गायन, लोकवादन, मौखिक साहित्य, चित्रकला व लोकधर्म का अनूठा संगम देखने को मिलता है।
- फड़ की लम्बाई लगभग 30 फीट व चौड़ाई 5 फीट होती है।
- इसमें रंगों का प्रतीकात्मक प्रयोग भावाभिव्यक्ति में सहायता प्रदान करता है।
- फड़ चित्रण में लाल व हरे रंग का प्रयोग किया जाता है।
- फड़ कथा में मुख्य चरित्रों की वेशभूषा लाल एवं खलनायक की वेशभूषा हरे रंग की होती है।
- चित्र संयोजन में मुख्य आकृति को सबसे बड़ा बनाकर प्रधानता दी जाती है।
- फड़ का वाचन ‘भोपों’ द्वारा किया जाता हैं।
- चातुर्मास में फड़ चित्रण नहीं होता है क्योंकि देवता सो जाते हैं। पुन: देवउठनी ग्यारस (कार्तिक शुक्ला ग्यारस) से फड़ चित्रण का कार्य आरम्भ हो जाता है।
- फड़ का वाचन प्राय: मनौती के रूप में किसी अनिष्ट की आशंका को दूर करने हेतु सामूहिक रूप से प्राय: देवी-देवताओं से संबंधित तिथि पर ही किसी खुली जगह या चौपाल में पूर्ण आस्था व श्रद्धा के साथ होता है।
- फड़ ठंडी करना :- फड़ के फट जाने या जीर्णशीर्ण हो जाने पर पुष्कर सरोवर में विसर्जित कर दिया जाना। इस अवसर पर भोपे समाज में ‘सवामणी’ का आयोजन करते हैं।
- फड़ चित्र का वाचन भोपों द्वारा किसी विशेष वाद्य यंत्र की सहायता से किया जाता हैं।
पाबूजी की फड़ :-
- फड़ वाचक जाति :- ‘नायक’ या ‘थोरी जाति’ के भोपे।
- वाद्य यंत्र :- रावणहत्था।
- सबसे लोकप्रिय फड़।
- इस फड़ में मुख के सामने ‘भाले का चित्र’ होता है एवं युद्ध के दृश्यों का चित्रांकन आकर्षक होता हैं।
- पाबूजी की घोड़ी ‘केसर कालमी’ को काले रंग से चित्रित किया जाता है।
- इस फड़ का वाचन रात्रि में किया जाता है।
देवनारायण जी की फड़ :-
- फड़ वाचक जाति :- गुर्जर जाति के भोपे।
- वाद्य यंत्र :- जंतर
- यह फड़ सबसे लम्बी (24 हाथ लम्बी), सबसे पुरानी, सर्वाधिक चित्रांकन वाली एवं सर्वाधिक समय लगने वाली फड़ है।
- फड़ के मुख के सामने सर्प का चित्र होता है तथा इनकी घोड़ी ‘लीलागर’ को हरे रंग से चित्रित किया जाता है।
- इस फड़ का वाचन दो या दो से अधिक भोपों द्वारा रात्रि में किया जाता हैं।
- श्रीलाल जोशी द्वारा बनाई गई देवनारायणजी की फड़ पश्चिमी जर्मनी के एक संग्रहालय में रखी हुई है।
- भारतीय डाक विभाग ने 1992 में देवनारायण जयन्ती के अवसर पर देवनारायण जी की फड़ पर 2 X 2 सेमी. के आकार में डाक टिकट जारी किया गया।
- देवनारायणजी की फड़ में नाट्य, गायन, मौखिक साहित्य, चित्रकला एवं लोकधर्म का अनूठा संगम मिलता है।
रामदेवजी की फड़ :-
- फड़ वाचक जाति :- कामड़ जाति के भोपे।
- वाद्य यंत्र :- रावणहत्था।
- इस फड़ का सर्वप्रथम चित्रांकन चौथमल चितेरे ने किया।
- यह फड़ मेघवाल, कोली, चमार, बलाई तथा अन्य रामदेवजी की भक्त जातियों में प्रचलित है।
रामदला – कृष्णदला की फड़ :-
- फड़ वाचक जाति :- भाट जाति के भोपे।
- इस फड़ का वाचन बिना वाद्य यंत्र के किया जाता है।
- इस फड़ का सर्वप्रथम चित्रण धूलजी चितेरे ने किया था।
- यह फड़ राम व कृष्ण भगवान के प्रसंगों पर आधारित होती है।
- इस फड़ का वाचन सर्वाधिक हाड़ौती अंचल में होता है।
- इस फड़ का वाचन दिन में होता है।
भैंसासुर की फड़ :-
- यह फड़ ‘बावरी’ या ‘बागरी’ जाति के लोग रखते हैं जो चोरी के लिए जाते समय शुगन के रूप में पूजते हैं।
- इस फड़ का वाचन नहीं किया जाता है।
साँझी

- साँझी श्राद्धपक्ष (आश्विन अमावस्या से पूर्णिमा) में बनाई जाती है।
- साँझी बनाने की परम्परा भगवान श्रीकृष्ण ने प्रारम्भ की थी।
- राजस्थान में साँझी बनाने की परम्परा वृंदावन से आई।
- कुँवारी लड़कियाँ साँझी को पार्वती मानकर अच्छे घर व वर के लिए कामना करती है।
- अंतिम पाँच दिनों में बड़े आकारों में साँझी बनाई जाती है जिसे संझ्या कोट कहते हैं।
- नाथद्वारा के श्रीनाथ के मंदिर में ‘केले की संझ्या’ (कदली पत्तों की साँझी) बनाई जाती है जो सम्पूर्ण भारत में प्रसिद्ध है।
- उदयपुर का मछन्दरनाथ मंदिर, साँझियोंके लिए प्रसिद्ध है, उसका नाम ही ‘संझ्या मंदिर’ पड़ गया है।
- जयपुर के लाडली जी का मंदिर में श्राद्ध पक्ष में प्रतिदिन आकर्षक साँझी बनाई जाती है।
पाने

- राजस्थान में विभिन्न पर्व त्योहारों एवं मांगलिक अवसरों पर कागज पर बने देवी-देवताओं के चित्रों को प्रतिष्ठित किया जाता है, जिन्हें ‘पाने’ कहा जाता है।
- ये पाने शुभ, समृद्धि व आनन्द के द्योतक माने जाते हैं।
- राजस्थान में लक्ष्मीजी, गणेशजी, राम-कृष्ण, श्रवण कुमार, श्रीनाथजी रामदेवजी, गोगाजी, देवनारायण जी, का पाने प्रमुख हैं।
- श्रीनाथ जी का पाना सबसे अधिक कलात्मक है, जिसमें 24 शृंगारों का चित्रण हैं।
मांडणा

- मांडणा का अर्थै - चित्रित अथवा लिखित चित्र।
- माण्डणे अत्यन्त सर, अमूर्त्त व ज्यामितीय शैली का सुंदर सम्मिश्रण हैं।
- ‘मांडणे’ श्री एवं समृद्धि के प्रतीक माने जाते हैं।
- सबसे छोटा मांडणा स्वस्तिक चिह्न होता है जो गणेशजी का प्रतीक है।
- ‘माडणा’ माँगलिक अवसरों पर महिलाओं द्वारा घर-आँगन को लीपपोत कर खड़िया, गैरुं से अनामिका की सहायता से निर्मित किए गए ज्यामितीय अलंकरण है।
- मांडणे की इकाइयों को ‘चीरण’, ‘जुआँ’, ‘झंबरा’, ‘बेलभरत’ व फुलड़ी भी कहते हैं।
- विभिन्न क्षेत्रों में मांडणा के नाम -
उत्तरप्रदेश सोन या चौक पूरना
गुजरात - सातियाँ
महाराष्ट्र - रंगोली
बंगाल - अल्पना
भोजपुरी - थापा
तेलगु - मोगु
केरल - अत्तापु
तमिल - कोलम
बिहार - अपहन
ब्रज – सांझा
ताम
- विवाह के समय लग्न मंडप में तैयार किया गया मांडणा।
चौकड़ी
- होली के अवसर पर बनाया गया मांडणा, जिसमें चार कोण होते हैं।
साट्या/सातिये
- बच्चे के जन्म के अवसर पर ग्रामीण क्षेत्र में बनाया जाने वाला मांडणा। साट्या को ‘स्वास्तिक’ के नाम से भी जाना जाता है, जो चारों दिशाओं को संबोधित करता है।
मोरडी
- दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान में मीणा जनजाति की महिलाओं द्वारा घरों में बनाई जाने वाली मोर की आकृति का मांडणा।
पगल्या

- मांडणे को पूजा-पाठ के अवसर पर आराध्य देव के घर में पर्दापण की अभिलाषा में उनके पदचिह्नों को प्रतीक रूप में तथा उनके स्वागत हेतु घर के आँगन व पूजा के स्थान पर चित्रित किया जाता है। राजस्थान के मांडणों में इनका चित्रण सर्वाधिक होता हैं।
गोदना

- किसी तीखे औजार से शरीर की ऊपरी चमड़ी खोदकर उसमें काला रंग भरने से चमड़ी में पक्का निशान बन जाता है, जिसे गोदना कहा जाता है।
- गोदने की कला का आरम्भ भगवान श्रीकृष्ण ने किया था।
- गोदना सौंदर्य के साथ अंधविश्वासों से भी जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि अनगुदा शरीर असुरक्षित होता है।
- गोदने के अलंकरण जाति विशेष व रुचि पर आधारित होते हैं।
मेहंदी

- मेहंदी महिलाओं के सौन्दर्य प्रसाधन की प्रमुख रचनाओं में गिना जाता है। राजस्थान में मेहंदी को सुहाग एवं सौभाग्य का शुभ चिह्न माना जाता है।
- राजस्थान में मेहंदी के लिए सोजत (पाली) प्रसिद्ध है।
पथवारी
- राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में पथवारी निर्माण की परम्परा सभी जगह दृष्टिगोचर मिलती है। गाँवों में पथरक्षक के रूप में पूजे जाने वाले स्थल को पथवारी कहा जाता है।
- पथवारी में एक ओर काला-गौरा भैरु जी एवं दूसरी ओर कावड़िया वीर (श्रवण कुमार) के चित्र होते हैं। तीर्थ यात्रा पर जाते समय इसकी पूजा की जाती है।
देवरे
- खुले चबूतरे पर निर्मित मंदिर, जिनकी आकृति त्रिकोणात्मक होती हैं।
- राजस्थान में विभिन्न क्षेत्रों में रामदेवजी, गोगाजी, भैरुजी, तेजाजी आदि के देवरे देखने को मिलते हैं।
थापे

- महिलाओं द्वारा ग्रामीण क्षेत्र में विभिन्न त्योहार व उत्सवों पर परम्परागत रंगों द्वारा किया गया चित्रण ‘थापा’ कहलाता है।
- ‘थापों’ में राजस्थानी धर्म-संस्कृति के प्रतीक देवी-देवताओं के आदर्श स्वरूप परिलक्षित होते हैं।
पिछवाई
- श्रीनाथजी के स्वरूप के पीछे बड़े आकार के कपड़े के पर्दों पर किया गया चित्रण, ‘पिछवाई’ कहलाता है। यह नाथद्वारा चित्रशैली की मौलिक देन है।
- पिछवाई चित्रण का प्रमुख विषय ‘श्रीकृष्ण-लीला’ है।
बटेवड़े या थापड़ा
- सूखे उपलों (गोबर) को सुरक्षित रखने के लिए बनाई गई आकृतियाँ।
वील
- ग्रामीण आँचलों में महिलाओं द्वारा गृह सज्जा एवं दैनिक उपयोग की चीजों को सुरक्षित करने के लिए निर्मित मिट्टी की महलनुमा चित्रित कलाकृति। मेघवाल जाति की महिलाएँ इस कला में दक्ष होती हैं।
सोहरियाँ

- भोजन सामग्री रखने के मिट्टी के बने कलात्मक पात्र।
कोठियां
- राजस्थान के ग्रामीण अँचलों में अनाज संग्रह हेतु प्रयुक्त मिट्टी के कलात्मक पात्र।
ओका नाका गुणा
- व्याधि निवारण हेतु ग्रामीण अँचलों में गोबर से बनाई जाने वाली कलाकृति जो चेचक निकलने पर विशेषत: बनाकर पूजा जाता है।
मोण
- मेड़ता क्षेत्र में बनाए जाने वाले मिट्टी के बड़े माटे (मटके)।
भराड़ी
- भील जनजाति में लड़की के विवाह पर घर की दीवार पर बनाया जाने वाला लोक देवी भराड़ी का मांगलिक चित्र। यह चित्र घर के जंवाई द्वारा चावल के विविधरंगी गोल से बनाया जाता है।
घोड़ा बावसी
- मिट्टी के बने कलात्मक घोड़े, जिनकी आदिवासी भील, गरासियों में बड़ी मान्यता है। मनौती पूर्ण होने पर इन्हें पूजकर इष्ट देवता के चढ़ाया जाता है।
हीड़
- मिट्टी का बना हुआ पात्र, जिसमें ग्रामीण अँचलों में दीपावली के दिन बच्चे तेल व रूई के बिनौले जलाकर अपने परिजनों के यहाँ जाते हैं और बड़ों का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
- सिरोही में तलवारें एवं ढालें बनाने का काम उत्कृष्ट कोटि का होता है।
ठप्पा
- देवी-देवताओं की छाया को धातु पर उतारकर उनके छोटे-छोटे ठप्पे या फूल बनाना, जो गले में पहने जाते हैं।
- नारियल की कलात्मक चूड़ियाँ (पट्टे) बनाने का काम भीलवाड़ा व कपासन (चित्तौड़गढ़) में होता है।
- जूट की गुड़ियाँ, पर्स, जूते आदि बनाने का काम दीनानाथ जी की गली जयपुर में होता है।
- हड्डियों की चूड़ियाँ, आभूषण एवं अन्य सजावटी सामान बनाने का कार्य जयपुर में होता है।
- अंता (बाराँ) में कण्ठियाँ (मालाएँ) बनाने का काम बहुतायत से होता है।
1. सोना, चांदी ज्वैलरी
2. संगमरमर पर हस्तकला
3. लाख हस्तकला
4. हाथी दांत हस्तकला
5. बंधेज/टाई- डाई/रंगाइ - छपाई
12. ओढ़नियों के प्रकार
- तारा भांत की ओढ़नी - आदिवासी महिलाएं ओढती है।
- कैरी भांत की ओढ़नी - आदिवासी महिलाएं ओढती है।
- लहर भांत की ओढ़नी - आदिवासी महिलाएं ओढती है।
- ज्वार भांत की ओढ़नी - आदिवासी महिलाएं ओढती है।
