मन ख्वाईशो मे अटका रहा,
और जिंदगी हमे जी कर चली गई।
और जिंदगी हमे जी कर चली गई।
मुझे महँगे तोहफ़े बहुत पसंद है,
अगली बार यूं करना, ज़रा सा वक़्त ले आना।
मत तोला कर इबादत को अपने हिसाब से,
रहमतें उसकी देखकर, अक्सर तराज़ू टूट जाते हैं।
वहम था कि सारा बाग अपना है तूफां के बाद,
पता चला सूखे पत्तों पर भी हक हवाओं का था।
हमारी आँखों पर भरोसा कीजिये,
जनाब, गवाही तो अदालतें माँगा करती है।
फ़लसफी को बहस के अंदर ख़ुदा मिलता नहीं,
डोर को सुलझा रहा है और सिरा मिलता नहीं।
मेरे बिना रह ही जायेगी कोई न कोई कमी,
तुम जिंदगी को जितनी मरजी सँवार लेना।
दोस्तो से बडी कोई दौलत नही,
इस मामले में मुझ से बड़ा कोई अमीर नहीं।
माना कि दो किनारो का कही संगम नही होता,
मगर साथ चलना भी तो कम नहीं होता।
जिनके उपर जिम्मेदारीयों का बोझ होता है,
उनको रुठने और टूटने का हक़ नही होता।
लगाई तो थी आग उसकी तस्वीर में रात को,
सुबह देखा तो मेरा दिल छालों से भरा पड़ा था।
सुबह देखा तो मेरा दिल छालों से भरा पड़ा था।
कोई कितना ही खुश-मिज़ाज क्यों न हो
रुला देती है किसी की कमी कभी-कभी।
नुमाइश करने से चाहत नही बढ़ जाती,
मुहब्बत वो भी करते है जो इजहार तक नही करते।
वो किताब लौटाने का बहाना तो लाखों में था,
लोग ढुँढते रहें सबूत, पैग़ाम तो आँखों मे था।
ग़म सलीक़े में थे, जब तक हम ख़ामोश थे,
ज़रा ज़ुबां क्या खुली, दर्द बे-अदब हो गए।
आंखे बंद होने से पहले, यदि आंखे खुल जाए,
दावे के साथ कहता हूँ, पूरी ज़िंदगी सुधर जाए।
तहजीब देखता हूं, मै अक्सर गरीबो के घर मे,
दुपट्टा फटा होता है, लेकिन सर पर होता है।
आँखों की झील से दो कतरे क्या निकल पड़े,
मेरे सारे दुश्मन एकदम खुशी से उछल पडे़।
दोस्ती कभी-कभी ऐसे भी निभानी चाहिये,
कुछ बातें बिन कहे भी समझ जानी चाहिये।
यूँ चेहरे पर उदासी ना ओढिये साहब,
वक़्त ज़रूर तकलीफ का है लेकिन कटेगा मुस्कुराने से ही।
आओ आज महफ़िल सजाते हैं,
तुम्हें लिखकर, तुम्हें ही सुनाते हैं।
तुम्हें लिखकर, तुम्हें ही सुनाते हैं।
नींद चुराने वाले पूछते हैं सोते क्यू नही,
इतनी ही फिक्र है तो फिर हमारे होते क्यू नही।
रास्ते जुदा होने से अहसास मिटा नहीँ करते,
हमतब भी महकेंगे जब मौसम पतझड़ के होंगे।
झूठ बोलते थे कितना, फिर भी सच्चे थे हम,
ये उन दिनों की बात है, जब बच्चे थे हम।
मत पहनाओ इन्हें.. शर्तों का लिबास,
रिश्ते तो.. बिंदास ही अच्छे लगते हैं।
प्यास तो मर कर भी नहीं बुझती ज़माने की,
मुर्दे भी जाते जाते गंगाजल का घूँट मांगते है।
तलब में शुमार इस कदर दीदार उनका,
सौ बार भी मिल जाये अधूरा लगता है।
तुम्हारा सिर्फ हवाओं पे शक़ गया होगा,
चिराग़ खुद भी तो जल-जल के थक गया होगा।
बड़ी तब्दीलिया लाया हूँ अपने आप मे लेकिन,
बस तुमको याद करने की वो आदत अब भी है।
नाम तेरा ऐसे लिख चुके है अपने वजूद पर,
कि तेरे नाम का भी कोई मिल जाए.. तो भी दिल धड़क जाता है।
महफ़िल मैं कुछ तो सुनाना पड़ता हैं,
गम छुपाकर मुस्कुराना पड़ता हैं,
कभी उनके हम थे दोस्त,
आजकल उन्हें याद दिलाना पड़ता हैं।
मुझसे बिछड़े अरसा बीता,
जाने अब वो किससे लड़ता होगा।
जाने अब वो किससे लड़ता होगा।
बच्चों को पैरों पर, खड़ा करना था,
पिता के घुटने, इसी में जवाब दे गये।
हम सादगी में झुक क्या गए,
लोगों ने समझा हमारा दौर ही खत्म हो गया।
मिल जाएंगे हमारी भी तारीफ करने वाले,
कोई हमारी मौत की अफवाह तो फैला दो।
अगर नए रिश्ते न बनें तो, मलाल मत करना,
पुराने टूट ना जायें बस, इतना ख्याल रखना।
ऐ-जिंदगी तू खेलती बहुत है खुशियों से,
हम भी इरादे के पक्के हैं मुस्कुराना नहीं छोडेंगे।
आँखों की झील से दो कतरे क्या निकल पड़े,
मेरे सारे दुश्मन एकदम खुशी से उछल पडे़।
जहाँ भी जिक्र हुआ सुकुन का,
वही मुझे तेरी बाहों कि तलब लग जाती हैं।
बंद लिफाफा था अब तो इश्तहार हो गयी,
मेरी मासूम सी मोहब्बत अखबार हो गयी।
कोन कैसा है, ये ही फ़िक्र रही तमाम उम्र
हम कैसे है, ये कभी भूल कर भी नही सोचा।
सच्चे किस्से शराबखाने में सुने,
वो भी हाथ मे जाम लेकर,
झूठे किस्से अदालत में सुने,
वो भी हाथ मे गीता-कुरान लेकर।
