भारत में यूरोपियों का आगमन
- अट्ठारहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में मुगल साम्राज्य के शीघ्र विघटन के कारण विविध भारतीय शक्तियों में राजनीतिक शून्यता को भरने के लिए तीव्र प्रतिद्वंद्विता दृष्टिगोचर हुई। कुछ समय के लिए ऐसा प्रतीत हुआ, कि मराठे मुगलों के स्थान पर भारत में सर्वाधिक शक्तिशाली हैं। लेकिन उनकी शक्ति के हृास ने भी यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों को भारतीय राजनीति में सक्रिय होने का अवसर प्रदान किया।
- आरंभ में यूरोपीय कंपनियों ने स्थानीय शासकों के राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप करना शुरू किया। इस चरण में सर्वोच्चता के लिए पारस्परिक द्वद्वों में भी उलझ गए। अंतत: अंग्रेज़ उप-महाद्वीपीय राजनीतिक शक्ति की प्रतिस्पर्धा में सक्रिय हो गए और अंतिम विजयी के रूप में सफल हुए।
- उनकी इस सफलता के पीछे भारतीय शक्तियों की सामान्य दुर्बलताएँ थीं। भारतीय व्यापार से अर्जित धन को युद्ध की श्रेष्ठ विधियों के साथ प्रयोग करते हुए, अंग्रेज़ों ने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य स्थापित किया।
- यूरोप से भारत पहुँचने हेतु दो मार्ग थे:-
1. स्थल मार्ग:- बाल्कन प्रदेशों से टर्की, फारस ईरान से अफगान तक पहुँचता था फिर खैबर, कुर्रम, बोलन, तथा गोमल आदि दर्रों से होते हुए भारत पहुँचता था।
2. जलमार्ग:- भूमध्यसागर अथवा कालासागर द्वारा लालसागर, फारस की खाड़ी और अरब सागर होते हुए भारत पहुँचता था। 15वीं सदी में इन दोनों मार्गों पर अरबों का प्रसार बढ़ता गया। - 1453 ई. में उस्मानिया तुर्कों ने कुस्तुनतुनिया पर अधिकार कर लिया और धीरे-धीरे सम्पूर्ण दक्षिण-पश्चिम व दक्षिण-पूर्वी यूरोपीय क्षेत्रों व व्यापार पर अधिकार हो गया।
- इस अधिकार के साथ ही स्थल मार्ग व्यापार हेतु बंद हो गया, अत: यूरोपीयों को नए जल मार्ग की आवश्यकता पड़ी।
- भारत में यूरोपियों के आगमन का क्रम:-
पुर्तगाल – डच – अंग्रेज – डेनिस – फ्रांसिसी
(1498 ई.) (1595 ई.) (1600 ई.) (1616 ई.) (1664 ई.) - भारत में स्थापना-
1. पुर्तगाल – 1503 ई. – कोचीन
2. अंग्रेज – 1608 ई. – सूरत
3. डच – 1610 ई. – पुलीकट
4. डेनमार्क – 1620 ई. (तंजौर)
5. फ्रासिंसी – 1668 ई. (सूरत)
भारत में पुर्तगालियों का आगमन:-
- आधुनिक युग में भारत आने वाले यूरोपीय व्यापारियों के रूप में पुर्तगाली सर्वप्रथम रहे। पोप अलेक्जेण्डर ने एक आज्ञा पत्र द्वारा पूर्वी समुद्रों में पुर्तगालियों को व्यापार करने का एकाधिकार प्रदान किया। प्रथम यूरोपीय यात्री वास्को-डि गामा 90 दिन की समुद्री यात्रा के बाद अब्दुल मनीक नामक गुजराती पथ प्रदर्शक की सहायता से 1498 ई. में कालीकट (भारत) के समुद्री तट पर उतरा।
- वास्को-डि-गामा के भारत आगमन से पुर्तगालियों एवं भारत के मध्य व्यापार के क्षेत्र में एक नये युग का शुभारम्भ हुआ। वास्को-डि-गामा ने भारत आने और पुर्तगाल जाने पर हुए यात्रा व्यय के बदले में लगभग 60 गुना अधिक कमाई की। धीरे-धीरे पुर्तगालियों का भारत आने का क्रम जारी हो गया। पुर्तगालियों के दो प्रमुख उद्देश्य -
- अरबों और वेनिस के व्यापारियों का भारत से प्रभाव समाप्त करना।
- ईसाई धर्म का प्रचार करना।
- 9 मार्च, 1500 को 13 जहाजों के एक बेड़े का नायक बनकर पेड्रो अल्वारेज केब्रोल जलमार्ग द्वारा लिस्बन से भारत के लिए रवाना हुआ। वास्को-डि-गामा के बाद पुर्तगालियों ने भारत में कालीकट, गोवा, दमन, दीव एवं हुगली के बंदरगाहों में अपनी व्यापारिक कोठियाँ स्थापित की। पूर्वी जगत के कालीमिर्च और मसालों के व्यापार पर एकाधिकार प्राप्त करने के उद्देश्य से पुर्तगालियों ने 1503 ई. में कोचीन (भारत) में अपने पहले दुर्ग की स्थापना की।
- 1505 ई. में फ्रांसिस्को द अल्मेडा भारत में प्रथम पुर्तगाली वायसराय बन कर आया। उसने सामुद्रिक नीति (नीले पानी की नीति) को अधिक महत्त्व दिया तथा हिन्द महासागर में पुर्तगालियों की स्थिति को मजबूत करने का प्रयत्न किया। 1509 ई. में अल्मेडा ने मिस्र, तुर्की और गुजरात की संयुक्त सेना को पराजित कर दीव पर अधिकार कर लिया।
- अल्मेडा के बाद अलफांसो द अल्बुकर्क 1509 ई. में पुर्तगालियों का वायसराय बनकर भारत आया। यह भारत में पुर्तगाली गवर्नर था। उसने कोचीन को अपना मुख्यालय बनाया।
- 1510 ई. में उसने बीजापुर के शासक यूसुफ आदिल शाह से गोवा को छीन कर अपने अधिकार में कर लिया। गोवा के अलावा अल्बुकर्क ने 1511 ई. में मलक्का (द.पू.एशिया) और 1515 में फारस की खाड़ी में स्थित हरमुज पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार दमन, दीव, सालमेट, बसीन, चोला, मुम्बई हरमुज तथा सेन्ट थोमे पर पुर्तगालियों का अधिकार हो गया।
- पुर्तगालियों की आबादी को बढ़ाने के उद्देश्य से अल्बुकर्क ने भारतीय स्त्रियों से विवाह को प्रोत्साहन दिया। उसने अपनी सेना में भारतीयों को भी भर्ती किया। 1515 ई. में अल्बुकर्क की मृत्यु हो गई। उसे गोवा में दफना दिया गया।
- अल्बुकर्क के बाद नीनो-डी-कुन्हा अगला पुर्तगीज गवर्नर बनकर भारत आया। 1530 में उसने अपना कार्यालय कोचीन से गोवा स्थानान्तरित किया और गोवा को पुर्तगाल राज्य की औपचारिक राजधानी बनाई। कुन्हा ने सैन्थोमी (चेन्नई), हुगली (बंगाल) तथा दीव (काठमाण्डू) में पुर्तगीज बस्तियों को स्थापित कर भारत में पूर्वी समुद्र तट की ओर पुर्तगाली वाणिज्य का विस्तार किया। उसने 1534 ई. में बसीन और 1535 में दीव पर अधिकार कर किया।
- मेड्रिक संधि:- 1633 ई.
यह संधि ब्रिटेन व पुर्तगालियों के मध्य हुई थी। इसकी शर्त पुर्तगाल व ब्रिटेन के मध्य व्यापारिक शत्रुता समाप्त करना था।
पुर्तगालियों का पतन
- अपनी शक्ति के विस्तार के साथ ही पुर्तगालियों ने भारतीय राजनीति में भी हस्तक्षेप करना प्रारम्भ कर दिया। इसका स्वाभाविक परिणाम यह हुआ, कि यह कालीकट के राजा से, जिसकी समृद्धि अरब सौदागरों पर निर्भर थी, शत्रुता रखने लगे। यह कालीकट के राजा के शत्रुओं से, जिनमें कोचीन का राजा प्रमुख था, संधियां करने लगे।
1. धार्मिक असहिष्णुता की नीति।
2. अल्बुकर्क के अयोग्य उत्तराधिाकारी।
3. डच तथा अंग्रेज शक्तियों का विरोध।
4. बर्बरतापूर्वक समुद्री लुटमार की नीति का पालन।
5. स्पेन द्वारा पुर्तगाल की स्वतन्त्रता का हरण।
6. विजयनगर साम्राज्य का विध्वंस आदि । - ब्राजील का पता लग जाने पर पुर्तगाल की उपनिवेश संबंधी क्रियाशीलता पश्चिम की ओर उन्मुख हो गई। अत: उनके पीछे आने वाली यूरोपीय कंपनियों से उनकी प्रतिद्वंदिता हुई जिसमें वे पिछड़ गए।
- हिन्द महासागर और दक्षिणी तट पर पुर्तगालियों के पतन के लिए निम्नलिखित कारण जिम्मेदार थे-
- एशियाई जहाजों की तुलना में पुर्तगाली नौसेना का अधिक कुशल होना।
- मुगल शासक शाहजहाँ ने 1632 ई. में पुर्तगालियों से हुगली छीन लिया, क्योंकि पुर्तगाली वहाँ पर लूटमार तथा धर्म परिवर्तन आदि निन्दनीय कार्य कर रहे थे।
भारत पर पुर्तगाली प्रभाव


गोथिक स्थापत्य कला
- भारत में गोथिक स्थापत्य कला का आगमन पुर्तगालियों के साथ हुआ पुर्तगालियों ने गोवा, दमन और दीव पर 1661 ई. तक शासन किया।
- भारत व जापान के मध्य व्यापार प्रारंभ करने का श्रेय पुर्तगालियों को दिया जाता है।
- ईसाई मिशनरियों ने भारत में धर्म परिवर्तन के प्रयास किए। 1540 ई. में गोवा के सभी हिंदु मंदिरों को नष्ट कर दिया गया।
- इसके द्वारा 1560 ई. में गोवा में ईसाई धार्मिक न्यायालय की स्थापना।
- 1556 ई. में गोवा में सर्वप्रथम प्रिटिंग प्रेस की स्थापना पुर्तगालियों द्वारा की गई थी।
- 1563 ई. में भारतीय जड़ी-बुटियाँ व वनस्पति पर आधारित प्रथम पुस्तक ‘द इंडियन मेडिसनल प्लांट्स’ प्रकाशित की गई।
भारत में डचों का आगमन
दक्षिण-पूर्व एशिया के मसाला बाजारों में सीधा प्रवेश प्राप्त करना ही डचों का महत्वपूर्ण उद्देश्य था। डच लोग हालैण्ड के निवासी थे। भारत में 'डच ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना 1602 ई. में की गई। 1596 ई. में भारत में आने वाला प्रथम डच नागरिक कारनोलिस डेडस्तमान था।
10 मार्च 1602 ई. की एक राजकीय घोषणा के आधार पर "युनाईटेड ईस्ट इण्डिया कम्पनी ऑफ द नीदरलैण्ड की स्थापना की गई।
भारत में डचों की महत्वपूर्ण कोठियाँ
- डचों ने भारत में अपना पहला कारखाना 1605 ई. में मछलीपट्टम में खोला। मछलीपट्टम से डच लोग नील का निर्यात करते थे। डच लोग भारत में मुख्यतः मसालों , नील, कच्चे रेशम, शीशा, चावल व अफीम का व्यापार करते थे। डचों ने मसालों के स्थान पर भारतीय कपड़ों को अधिक महत्त्व दिया। यह कपड़े कोरोमण्डल तट, बंगाल और गुजरात से निर्यात किए जाते थे।
- डचों का भारत में अन्तिम रूप से पतन 1759 ई. में अंग्रेजों एवं डचों के मध्य हुए ‘बेदारा के युद्ध’ में हुआ। इस युद्ध में अंग्रेजी सेना का नेतृत्व क्लाइव ने किया था। डचों के पतन के कारणों में अंग्रजों की तुलना में नौ-शक्ति का कमजोर होना, मसालों के द्वीपों पर अधिक ध्यान देना, बिगड़ती हुई आर्थिक स्थिति, अत्यधिक केन्द्रीयकरण की नीति आदि को गिना जाता है।
भारत में अंग्रेजों का आगमन
- इंग्लैण्ड की रानी एलिजाबेथ-I के समय में 31 दिसम्बर, 1600 को दि गवर्नर एण्ड कम्पनी ऑफ लन्दन ट्रेंडिंग इन्टू दि ईस्ट इंडीज अर्थात् ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना हुई। इस कम्पनी की स्थापना से पूर्व महारानी एलिजाबेथ ने पूर्वी देशों से व्यापार करने के लिए चार्टर तथा एकाधिकार प्रदान किया। प्रारंभ में यह अधिकार मात्र 15 वर्ष के लिए मिला था, किन्तु कालान्तर में इसे 20-20 वर्षों के लिए बढ़ाया जाने लगा। ईस्ट इंडिया कम्पनी में उस समय कुल करीब 217 साझेदार थे। कम्पनी का आरम्भिक उद्देश्य व्यापार था।
- भारत में व्यापारिक कोठियाँ खोलने के प्रयास के अन्तर्गत ही ब्रिटेन के सम्राट जेम्स प्रथम ने 1608 ई. में कैप्टन हॉकिन्स को अपने राजदूत के रूप में मुगल सम्राट जहाँगीर के दरबार में भेजा। 1609 ई. में हॉकिन्स ने जहाँगीर से मिलकर सूरत में बसने की इजाजत मांगी परन्तु पुर्तगालियों तथा सूरत के सौदागरों के विद्रोह के कारण उसे स्वीकृति नहीं मिली।
- हॉकिंस फारसी भाषा का ज्ञाता था। कैप्टन हॉकिंस तीन वर्ष आगरा में रहा। जहाँगीर ने उससे प्रसन्न होकर 400 का मनसब तथा जागीर प्रदान की।
- 1615 ई. में सम्राट जैम्स-I ने सर टामस-रो को अपना राजदूत बना कर जहाँगीर के पास भेजा।
- 1611ई. में दक्षिण-पूर्वी समुद्र तट पर सर्वप्रथम अंग्रेजों ने मुसलीपट्टम में व्यापारिक कोठी की स्थापना की। यहाँ से वस्त्रों का निर्यात होता था। 1632 ई. में गोलकुन्डा के सुल्तान ने एक सुनहरा फरमान दिया, जिसके अनुसार 500 पगोड़ा सालाना कर देकर गोलकुण्डा राज्य के बन्दरगाहों से व्यापार करने की अनुमति मिल गई।
- 1639 ई. में मद्रास में तथा 1651 ई. में हुगली में व्यापारिक कोठियाँ खोली गई। 1661ई. में इंग्लैण्ड के सम्राट चार्ल्स -II का विवाह पुर्तगाल की राजकुमारी कैथरीन से हुआ तथा चार्ल्स को बम्बई दहेज के रूप में प्राप्त हुआ जिसे उन्होंने 1668ई. में दस पौण्ड वार्षिक किराये पर कम्पनी को दे दिया था।
- पूर्वी भारत में अंग्रेजों ने बंगाल, बिहार, पटना एवं ढाका में अपने कारखाने खोले। 1639 ई. में अंग्रेजों ने चंद्रगिरि के राजा से मद्रास को पट्टे पर लेकर कारखाने की स्थापना की तथा कारखाने की किलेबन्दी कर उसे फोर्ट सेंट जार्ज का नाम दिया। फोर्ट सेन्ट जार्ज शीघ्र ही कोरोमण्डल समुद्र तट पर अंग्रेजी बस्तियों के मुख्यालय के रूप में मुसलीपट्टम से आगे निकल गया।
- 1651 ई. में बंगाल में सर्वप्रथम अंग्रेजों को व्यापारिक छूट प्राप्त की, जब ग्रेवियन वांटन जो बंगाल के सूबेदार शाहशूजा के साथ दरबारी चिकित्सक के रूप में रहता था, यह कम्पनी के लिए एक फरमान प्राप्त करने में सफल हुआ। इस फरमान से कम्पनी की 3000 रू. वार्षिक कर के बदले बंगाल, बिहार तथा ओड़ीसा में मुक्त व्यापार करने की अनुमति मिल गई। राजकुमार शुजा की अनुमति से अंग्रेजों ने बंगाल में अपनी प्रथम कोठी 1651 ई. में हुगली में स्थापित की। कम्पनी ने 1672 ई. में शाइस्ता खाँ से तथा 1680 ई. में औरंगजेब से व्यापारिक रियायतों के संबंध में फरमान प्राप्त किया। धीरे-धीरे अंग्रेजों का मुगल राजनीति में हस्तक्षेप प्रारम्भ हो गया।
- 1698 ई. में तत्कालीन बंगाल के सूबेदार अजीमुश्शान द्वारा कम्पनी ने तीन गाँव-सुतानाती, कलकत्ता एवं गोविन्दपुर की जमींदारी 12000 रुपये भुगतान कर प्राप्त कर ली। 1700 ई. तक जब चारनाक ने इसे विकसित कर कलकत्ता का रूप दिया। कलकत्ता में फोर्ट विलियम की स्थापना हुई। इसका पहला गवर्नर चार्ल्स आयर बना।
- डॉक्टर विलियम हैमिल्टन, जिसने सम्राट फर्रुखसियर को एक प्राण घातक बीमारी से निजात दिलाई थी,इस सेवा से खुश होकर 1717 ई. में सम्राट फर्रुखसियर ने ईस्ट इंडिया कम्पनी के लिए फरमान जारी किया, जिसके तहत-
- बंगाल में कम्पनी को 3000 रुपये वार्षिक देने पर नि:शुल्क व्यापार का अधिकार मिल गया।
- कम्पनी को कलकत्ता के आस-पास की भूमि किराये पर लेने का अधिकार दिया गया।
- कम्पनी द्वारा बम्बई की टकसाल से जारी किए गए सिक्कों को मुगल साम्राज्य में मान्यता प्रदान की गई।
- सूरत में 10,000 रुपये वार्षिक कर देने पर निःशुल्क व्यापार का अधिकार प्राप्त हो गया।
- इतिहासकार ओर्स (Orms) ने फर्रुखसियर द्वारा जारी किए गए इस फरमान को कम्पनी का महाधिकार पत्र (Magna Carta of the Company) कहा।
- 1669 ई. से 1677 ई. तक बम्बई का गवर्नर रहा गोराल्ड औगियार ही वास्तव में बम्बई का महानतम संस्थापक था। 1687 ई. तक बम्बई पश्चिमी तट का प्रमुख व्यापारिक केन्द्र बना रहा। गोराल्ड औगियार ने बम्बई में किलेबन्दी के साथ ही गोदी का निर्माण करवाया तथा बम्बई नगर की स्थापना और एक न्यायालय और पुलिस दल की स्थापना की। गोराल्ड औगियार ने बम्बई के गवर्नर के रूप में यहाँ से तांबे और चाँदी के सिक्के ढालने के लिए टकसाल की स्थापना करवाई।
- औगियार के समय में बम्बई की जनसंख्या 60,000 हो गई थी। उसका उत्तराधिकारी रौल्ड (1677-82 ई.) बना।
- ईस्ट इंडिया कम्पनी- ईस्ट इंडिया कम्पनी एक निजी व्यापारिक कम्पनी थी, जिसने 1600 में शाही अधिकार पत्र द्वारा व्यापार करने का अधिकार प्राप्त कर लिया था। कम्पनी का मुख्य उद्देश्य धन कमाना था। 1708 ई. में ईस्ट इंडिया कम्पनी की प्रतिद्वन्दी कम्पनी न्यू कम्पनी का ईस्ट इंडिया कम्पनी में विलय हो गया। परिणामस्वरूप द यूनाइटेड कम्पनी आफ मर्चेटस ऑफ इंग्लैण्ड ट्रेडिंग टू ईस्ट इंडीज की स्थापना हुई।
- कम्पनी और उसके व्यापार की देख-रेख ‘गवर्नर-इन- काउन्सिल’ करता था।
भारत में फ्रांसीसियों का आगमन:-
- फ्रांसीसियों ने भारत में सबसे अन्त में प्रवेश किया। इनसे पहले यहाँ पर पुर्तगाली, डच और अंग्रेज लोग अपनी व्यापारिक कोठियाँ स्थापित कर चुके थे। फ्रांस के सम्राट लुई 14वें के मंत्री कोलबर्ट के सहयोग से 1664 ई. में भारत में फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना हुई। यह सरकारी आर्थिक सहायता पर निर्भर थी, इसलिए इसे सरकारी व्यापारिक कम्पनी भी कहा जाता है।
- भारत में फ्रांसीसियों की पहली कोठी फ्रेंकों कैरो द्वारा सूरत में 1668 ई. में स्थापित हुई। गोलकुण्डा रियासत के सुल्तान से अधिकार पत्र प्राप्त करने के बाद फ्रांसीसियों ने अपनी दूसरी व्यापारिक कोठी की स्थापना 1669 ई. में मुसलीपट्टम में की थी।
- 1673 ई. में फ्रांस्वा मार्टिन तथा बेलागर द लेस्पिन ने वलिकोण्डपुरम के मुस्लिम सुबेदार शेर खाँ लोदी से एक छोटा गांव पुडुचेरी प्राप्त किया। पुडुचेरी में ही फ्रांसीसियों ने पांडिचेरी की नींव डाली।
- बंगाल के तत्कालीन नवाब शाइस्ता खाँ ने 1674 ई. में फ्रांसीसियों को एक जगह दी जहाँ पर 1690-92 ई. के मध्य चन्द्रनगर की सुप्रसिद्ध फ्रांसीसियों की कोठी की स्थापना हुई। पांडिचेरी के कारखाने में ही मार्टिन ने फोर्ट लुई का निर्माण कराया।
- 1742 ई. से पूर्व फ्रांसीसियों का मूल उद्देश्य व्यापारिक लाभ कमाना था, परन्तु 1742 ई. के बाद डूप्ले के पांडिचेरी का गवर्नर नियुक्त होने पर राजनीतिक लाभ व्यापारिक लाभ से महत्वपूर्ण हो गया। डूप्ले की इस महत्वाकांक्षा ने ही भारत में फ्रांसीसियों के पतन के मार्ग को प्रशस्त किया।
डेन : डेनमार्क की "ईस्ट इण्डिया कम्पनी" की स्थापना 1616 ई. में हुई। इस कम्पनी ने 1620 ई. में त्रैकोवार (तमिलनाडु) तथा 1667 ई. में सेरामपुर (बंकार) में अपनी व्यापारिक कंपनियां स्थापित की। सेरामपुर डेनों का प्रमुख व्यापारिक केन्द्र था। 1854 ई. में डेन लोगों ने वाणिज्य कंपनी को अंग्रेजों को बेच दिया।
यूरोपीय (आंग्ल-फ्रांसीसी) वाणिज्यिक कंपनियों के मध्य संघर्ष -
- भारतीय संदर्भ में हुए कर्नाटक युद्ध की एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ब्रिटेन एवं फ्रांस के बीच मध्यकाल से ही चल रही प्रतिस्पर्धाओं से रही है। 13वीं-14वीं सदी में चलने वाला 100 वर्षीय युद्ध इसका स्पष्ट प्रमाण है। 15वीं सदी में राष्ट्र-राज्यों के विकास के साथ इन दोनों देशों में राष्ट्र के विस्तार एवं समृद्धि के विकास के लिए विभिन्न प्रयास प्रारम्भ हुए। इन्हीं प्रयासों के परिणामस्वरूप ये दोनों यूरोप के दो मजबूत प्रतिद्वन्द्वी बनकर उभरे और यहाँ तक की 18वीं सदी के मध्य से चले तीन कर्नाटक युद्धों को इस प्रतिस्पर्धा के परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है।
प्रथम कर्नाटक युद्ध (1746-1748 ई.)
- प्रथम कर्नाटक युद्ध ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार युद्ध से प्रभावित था, जो 1740 ई. से ही प्रारम्भ था। चूंकि यूरोप में फ्रांस और ब्रिटेन एक दूसरे के प्रबल विरोधी थे, अतः भारत में भी इस विरोध का असर पड़ा जिसके परिणामस्वरूप अंग्रेज और फ्रांसीसी सेना के बीच 1746 ई. में युद्ध प्रारम्भ हो गया।
- 1740 ई. में डूप्ले फ्रांसिसियों गवर्नर बनकर भारत आया। इसने यूरोपीय कम्पनियों द्वारा भारतीय राजनीति में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप की शुरूआत की जिसकी परिणति कर्नाटक युद्ध के रूप में हुई।
- कर्नाटक युद्ध मुख्यतः यूरोप में चल रहे अंग्रेजों एवं फ्रांसीसियों के बीच ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार युद्ध का भारतीय विस्तार माना जाता है।
- अंग्रेज अधिकारी बार्नेट द्वारा कुछ फ्रांसीसी जलपोतों को पकड़े जाने की प्रतिक्रियास्वरूप डूप्ले ने 'लाबुर्डाने' (मॉरीशस का फ्रांसिसियों अधिकारी) की सहायता से मद्रास पर अधिकार कर लिया था।
- इसी समय हैदराबाद के निजाम के तहत आने वाले कर्नाटक क्षेत्र में उत्तराधिकार का विवाद भी चल रहा था, जिसमें एक ओर ब्रिटिश समर्थित अनवरूद्दीन तथा दूसरी ओर फ्रांसिसियों समर्थित प्रतिनिधि था।
- मद्रास पर अधिकार के मुद्दे को लेकर युद्ध की स्थिति बन गई थी। कर्नाटक समर्थित नवाब अनवरूद्दीन ने 1748 ई. में फ्रांसिसियों के विरुद्ध 'सेन्ट थोमे' की लड़ाई लड़ी। जिसमें अनवरूद्दीन की हार हुई। लड़ाई के पश्चात् ‘ए. ला. शापेल' की संधि हुई, जिसके तहत फ्रांसीसियों ने अंग्रेजों को मद्रास तो वापस कर दिया पर उसके बदले उसे अमेरिका का एक क्षेत्र मिला।
- कर्नाटक का प्रथम युद्ध सेन्ट टोमे के युद्ध के लिए स्मरणीय है। यह युद्ध फ्रांसीसी सेना एवं कर्नाटक के नवाब अनवरूद्वीन के मध्य लड़ा गया था। यह युद्ध फ्रांसीसियों द्वारा मद्रास की विजय पर हुआ, जिसका परिणाम फ्रांसीसियों के पक्ष में रहा क्योंकि कैप्टन पेराडाइज के नेतृत्व में फ्रांसीसी सेना ने महफूज खाँ के नेतृत्व में लड़ रही भारतीय सेना को अदमार नदी पर स्थित सेन्ट टोमे नामक स्थान पर पराजित कर दिया। ऑस्ट्रिया का उत्तराधिकार युद्ध जो 1740 ई. में प्रारम्भ हुआ था और अप्रत्यक्ष रूप से प्रथम कर्नाटक युद्ध के लिए भी उत्तरदायी था, 1748 ई. में सम्पन्न ए-ला शापेल की संधि के द्वारा समाप्त हो गया । इसी संधि के तहत प्रथम कर्नाटक युद्ध भी समाप्त हुआ और संधि में निश्चित की गई शर्तों के अनुसार फ्रांसीसियों ने अंग्रेजों को जीते हुये क्षेत्र वापस कर दिए ।
द्वितीय कर्नाटक युद्ध (1749-54 ई.)
- द्वितीय कर्नाटक युद्ध, जो 1749 ई. से 1754 ई. तक चला जिसका मूल कारण हैदराबाद एवं कर्नाटक में उत्तराधिकार के लिए दो गुटों के बीच संघर्ष था। हैदराबाद में नासिरजंग ब्रिटिश समर्थित था, तो मुजफ्फरजंग फ्रांसिसियों समर्थित था। वैसे ही कर्नाटक में अनवरूद्दीन ब्रिटिश समर्थित तथा चंदा साहब फ्रांसिसियों प्रतिनिधि थे। अतः इस प्रकार दो गुट बने। दोनों गुटों में 1749 ई. में अम्बूर की लड़ाई हुई जिसमें फ्रांसिसियों समर्थित गुट विजयी हुआ। अनवरूद्दीन मारा गया तथा चन्दा साहिब नवाब बने। कुछ समय बाद नासिरजंग की जगह हैदराबाद में फ्रांसिसियों समर्थित मुजफ्फरजंग नवाब बना। इस प्रकार प्रारम्भिक स्तर पर फ्रांसिसियों का प्रभाव स्थापित हुआ पर कुछ ही समय बाद अनवरूद्दीन के पुत्र मुहम्मद अली ने अंग्रेजों के साथ मिलकर चन्दा साहब एवं फ्रांसिसियों को हराकर कर्नाटक पर अपनी सत्ता स्थापित की, लेकिन हैदराबाद पर फ्रांसिसियों प्रभाव बना रहा। 1756 ई. में अंग्रेजों एवं फ्रांसीसियों के बीच पाण्डिचेरी की संधि हुई। जिसमें यह तय हुआ कि दोनों एक दूसरे के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे।
तृतीय कर्नाटक युद्ध (1756-63 ई.)
- यह युद्ध यूरोप में ब्रिटेन एवं फ्रांस के बीच चल रहे सप्तवर्षीय युद्ध (1756-63 ई.) का भारतीय विस्तार था। 1761 ई. में ब्रिटिश सेना ने फ्रांसिसियों मुख्यालय पाण्डिचेरी पर अधिकार कर लिया। 1763 ई. में सप्तवर्षीय युद्ध की समाप्ति पर पेरिस की संधि हुई, जिसके तहत पाण्डिचेरी फ्रांसिसियों को वापस कर दिया गया। यह तय हुआ कि फ्रांसिसियों भविष्य में किसी भी प्रकार का राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं करेंगे और सिर्फ एक व्यापारिक कम्पनी बनकर रहेंगे।
- वांडिवाश का युद्ध (1760 ई.) यह फ्रांसीसियों के लिए निर्णायक युद्ध था, क्योंकि फ्रांसीसियों के समक्ष में यह बात पूर्ण रूप से आ चुकी थी, कि वे कम से कम भारत में ब्रिटिश कम्पनी के रहते सफल नहीं हो सकते, चाहे वह उतर-पूर्व हो या पश्चिम या फिर दक्षिण भारत। 1763 ई. में सम्पन्न हुई पेरिस संधि के द्वारा अंग्रेजों ने चन्द्रनगर को छोड़कर शेष अन्य प्रदेश, जो फ्रांसीसियों के अधिकार में 1749 ई. तक थे, वापस कर दिए और ये क्षेत्र भारत के स्वतंत्र होने तक इनके पास बने रहे थे।
- फ्रांसीसियों की पराजय के अनेक कारण -
1. फ्रांसीसी अत्यधिक महत्वाकांक्षा के कारण यूरोप में अपनी प्राकृतिक सीमा इटली, बेल्जियम तथा जर्मनी तक बढ़ाने का प्रयत्न कर रहे थे और भारत के प्रति वे उतने गम्भीर नहीं थे।
2. इस दोनों कम्पनियों में गठन तथा संरक्षण की दृष्टि से काफी अंतर था। फ्रांसीसी कम्पनी जहाँ पूर्ण रूप से राज्य पर निर्भर थी, वहीं ब्रिटिश कम्पनी व्यक्तिगत स्तर पर कार्य कर रही थी।
3. फ्रांसीसी नौसेना अंगेजी नौसेना की तुलना में काफी कमजोर थी।
4. भारत में बंगाल पर अधिकार कर अंग्रेजी कम्पनी ने अपनी स्थिति को आर्थिक रूप से काफी मजबूत कर लिया था, दूसरी ओर फ्रांसीसियों को पांडिचेरी से उतना लाभ कदापि नहीं हुआ, जितना अंगेजों को बंगाल से हुआ।
दक्षिण भारत
- अंग्रेज़ों द्वारा शक्ति प्राप्त करने की प्रक्रिया दक्षिण भारत से शुरू हुई। 1748 ई. में हैदराबाद के निज़ाम की मृत्यु के पश्चात उसके उत्तराधिकारियों के बीच सिंहासन के लिए उत्तराधिकारी संघर्ष शुरू हो गया। इसके बाद इसी प्रकार का एक संघर्ष आरकॉट के नवाब के पुत्रों के बीच हुआ, जो सैद्धांतिक रूप से निज़ाम का सूबेदार था, परंतु अपनी शक्ति और महत्वाकांक्षा के कारण वास्तव में स्वतंत्र हो गया था। इन दोनों ही संघर्षों में फ्रांसी सियों और ब्रिटिशों ने विरोधी दावेदारों का पक्ष लिया।
- संघर्ष के प्रथम चरण में जिसे बाद में द्वितीय कर्नाटक युद्ध (1749-1754 ई.) कहा गया, पांडिचेरी के गवर्नर डूप्ले के नेतृत्व में फ्रांसीसियों को हैदराबाद और आरकॉट के सिंहासनों पर अपना उम्मीदवार बैठाने में सफलता मिली थी। इस घटना से दो वर्ष पूर्व प्रथम कर्नाटक युद्ध (1746-1748 ई.) में डूप्ले ने आरकॉट के नवाब अनवर-उद्-दीन के विरुद्ध पहली जीत अर्जित की थी। सैन्य दृष्टिकोण से यह एक छोटी लड़ाई थी। लेकिन इसका प्रचुर ऐतिहासिक महत्त्व था।
- इतिहासकार एम.एन. दास के अनुसार, कुछ पश्चिमी सैनिकों और उनके प्रशिक्षित भारतीय सिपाहियों, जिनकी संख्या केवल पाँच सौ थी, इन्होंने अपने से बीस गुना बड़ी नवाब की शक्तिशाली सेना को लड़ाई में अत्यंत आसानी से हरा दिया। दूसरी विजय के साथ ही उसकी महत्वाकांक्षा ऊँची उड़ान भरने लगी।
- ब्रिटिश जनरल आयर कूट ने वांडीवाश की लड़ाई (1760 ई.) में फ्रांसीसियों को हराकर भारत में इनकी औपनिवेशिक महत्वाकांक्षाओं को समाप्त कर दिया।
- इन दिनों यूरोपीय लोग कोरोमंडल तट के उस भाग को कर्नाटक कहते थे, जो आरकॉट के अधिकार क्षेत्र में था। चूँकि तीनों युद्ध उसी क्षेत्र में हुए थे, अतः उन्हें कर्नाटक युद्धों के नाम से जाना गया है।
प्लासी का युद्ध (1757 ई.)
- इस युद्ध के बाद में ईस्ट इंडिया कंपनी के सहयोग से मीर जाफर बंगाल का नवाब बना। ईस्ट इंडिया कंपनी को अपदस्थ नवाब सिराज-उद्-दौला से कलकत्ता पर आक्रमण करने के मुआवज़े स्वरूप17,700,000 रुपए भी मिले। साथ ही बिना किसी शुल्क अदायगी के कंपनी को बंगाल, बिहार और ओडिशा में उन्मुक्त व्यापार का अधिकार भी मिला। इसके अतिरिक्त कंपनी को नवाब मीर जाफर से बंगाल के 24 परगना की ज़मींदारी भी मिली। इस प्रकार रातों-रात यह कंपनी भारत में एक क्षेत्रीय शक्ति बन गई। फिर भी कंपनी की लालसा और अधिक धन पाने की थी, जिसको संतुष्ट करने में मीर जाफर सक्षम नहीं था। इसलिए कंपनी ने उसके दामाद मीर कासिम के साथ गुप्त समझौता कर 1760 ई. में मीर जाफर को सिंहासन त्यागने के लिए मजबूर कर दिया। यह परिवर्तन बहुत थोड़े से अंतराल पर उस समय हुआ, जब क्लाइव इंग्लैंड में था। बंगाल के सिंहासन का उत्तरदायित्व लेते ही मीर कासिम ने इस कृपा के बदले कंपनी को बर्दवान, मिदनापुर और चटगाँव की ज़मींदारी सौंप दी और कंपनी के अधिकारियों को कीमती उपहार दिए।
- इन कार्यों के बदले मीर कासिम ने यह आशा की थी, कि कंपनी बंगाल के नवाब के रूप में उसकी संप्रभुता का सम्मान करेगी। अपनी वास्तविक शक्ति को सुनिश्चित करते हुए उसने अपनी राजधानी मुर्शिदाबाद से मुंगेर स्थानांतरित कर दी थी। उसने भारतीय व्यापारियों को अंग्रेज़ व्यापारियों के समान ही बिना किसी शुल्क अदायगी के व्यापार करने की अनुमति दे दी। यह कदम कंपनी की अपेक्षाओं के प्रतिकूल थे। अतः मीर कासिम और कंपनी के बीच लड़ाई आवश्यक हो गई। मीर कासिम ने अवध के नवाब शुजा-उद्-दौला और मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय, जो अवध में रह रहा था, का समर्थन प्राप्त किया। हमेशा की भाँति अंग्रेजों ने दांव-पेंच का सहारा लिया और शुजा-उद्-दौला के बहुत से अधिकारियों और अधीनस्थों को अपने पक्ष में कर लिया। अंत में दोनों सेनाओं के बीच 1764 ई. में बक्सर की लड़ाई हुई। इस लड़ाई में कंपनी की सेना के कमांडर हेक्टर मुनरो ने शुजा-उद्-दौला और मीर कासिम को बुरी तरह परास्त कर दिया। इस बीच मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय ने बनारस में कंपनी के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। मीर कासिम दिल्ली भाग गया जहाँ अत्यंत निर्धनता में 1777 ई. में उसकी मृत्यु हो गई। इस प्रकार प्लासी में शुरू हुई प्रक्रिया को बक्सर की विजय ने पूर्ण कर दिया। बंगाल अंग्रेज़ों के अधीन आ गया।
- मई, 1765 में क्लाइव को युद्धोत्तर औपचारिकताओं को पूरा करने के लिए पुन:भारत के गवर्नर के रूप में भेजा गया। इनके आगमन पर सर्वप्रथम क्लाइव ने नवाब शुजा-उद्-दौला के साथ एक संधि की। इस संधि के द्वारा नवाब ने इलाहाबाद और कड़ा कंपनी को सौंप दिया और लड़ाई के मुआवजे के रूप में पचास लाख रुपए देना भी स्वीकार किया। बाद में क्लाइव ने 12 अगस्त, 1765 को मुगल बादशाह शाह आलम-II के साथ इलाहाबाद की संधि पर हस्ताक्षर किए। इस संधि के अनुसार मुगल बादशाह को कंपनी की सुरक्षा में ले लिया गया और अवध के नवाब द्वारा दिए गए दोनों इलाके उसे सौंप दिए गए। पुनः, कंपनी ने बंगाल, बिहार और ओडिशा की दीवानी का स्थायी अधिकार सौंपने के बदले मुगल बादशाह को एक फरमान के अनुसार 26 लाख रुपए वार्षिक पेंशन देना स्वीकार किया।
- इलाहाबाद की संधि ने बंगाल पर नवाब की सत्ता का अंत कर वहाँ 'दोहरे शासन' की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। इस व्यवस्था के अंतर्गत नवाब कानून और प्रशासन की देखभाल करता था, जबकि कंपनी ने राजस्व संग्रह का अधिकार अपने हाथों में रखा था। संक्षेप में, नवाब को बिना शक्ति के उत्तरदायित्व दिया गया था और कंपनी बिना किसी उत्तरदायित्व के शक्ति का आनंद ले रही थी। निश्चित रूप से ऐसी व्यवस्था बहुत दिनों तक नहीं चल सकती थी।
भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार
- 1772 ई. में वॉरेन हेस्टिंग्स को बंगाल का गवर्नर नियुक्त किया गया। इसने 'मुगल संप्रभुता के मुखौटे को उतार फेंका' और बंगाल का पूरा प्रशासन अपने हाथों में ले लिया। मुगल बादशाह इस समय मराठों के संरक्षण में रहउ रहे थे। विश्वासघात के लिए उसे दंडित करने हेतु उसका वार्षिक अनुदान रोक दिया गया। इसके अतिरिक्त उसने बादशाह से इलाहाबाद और कड़ा लेकर इन क्षेत्रों को अवध के नवाब के हाथों बेच दिया।
- अवध पर वॉरेन हेस्टिंग्स की कृपा दृष्टि के पीछे उसकी अवध को, कंपनी क्षेत्रों और मराठों के बीच अंत:स्थ राज्य के रूप में स्थापित करने की मंशा थी। इस कारण इसने अवध के नवाब (जिनकी अंग्रेजों से कोई सीधी शत्रुता नहीं थी) की रूहेलखंड जीतने में सहायता की।
- वॉरेन हेस्टिंग्स द्वारा डाली गई नींव पर ही उसके उत्तराधिकारी लॉर्ड कार्नवालिस ने भारत विजय अभियान पूरा किया। मैसूर में हैदर अली और उसके बाद उसके पुत्र टीपू सुल्तान की बढ़ती हुई ताकत से क्षेत्र के अन्य प्रतिस्पर्धी राज्यों के हित प्रभावित हुए।
- 1789 ई. में जब टीपू ने त्रावणकोर के छोटे राज्य पर विजय पाई, तो कार्नवालिस ने उससे बदला लेने का निश्चय किया। इस युद्ध में मराठों और निज़ाम ने भी ब्रिटिशों का साथ दिया। तीसरा आंग्ल-मैसूर युद्ध (1790 1792 ई.) दो वर्षों तक चला। टीपू के लिए अपने विरोधियों की सम्मिलित शक्ति का मुकाबला करना कठिन था। परिणामस्वरूप, टीपू शांति के लिए सहमत हो गया। श्रीरंगपट्टम की संधि' पर 1792 ई. में हस्ताक्षर किए गए थे। इस प्रकार यह युद्ध तब तक अनिर्णीत ही रहा, जब तक कि रिचर्ड माविस वेलेजली 'भारत में ब्रिटिश साम्राज्य को भारत का ब्रिटिश साम्राज्य' बनाने की मंशा से भारत में नहीं आ गया
युद्ध | गवर्नर जनरल | समय |
प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध | वेरेल्स्ट | 1767-69 |
द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध | लॉर्ड वारेन हेस्टिंग्स | 1780-84 |
तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध | लॉर्ड कार्नवालिस | 1790-92 |
चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध | लॉर्ड वेलेजली | 1799 |
युद्ध | कारण | परिणाम |
प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध (1767-69 ई.) |
| मद्रास की संधि, 1769 ई. - हैदरअली व ईस्ट इंडिया कम्पनी दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के विजित प्रदेश तथा युद्धबंदी लौटा दिए। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर किसी भी शक्ति के आक्रमण के समय सहायता देने का वचन दिया। |
द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1780-84 ई.) |
| मंगलौर की संधि, 1784 ई. - टीपू को मैसूर राज्य में अंग्रेजों के व्यापारिक अधिकार को मानना पड़ा। अंग्रेजों ने आश्वासन दिया, कि वे मैसूर के साथ मित्रता बनाए रखेंगे तथा संकट के समय उसकी मदद करेंगे। |
तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1790-92 ई.) |
| श्रीरंगपट्टनम की संधि, 1792 ई. -इस संधि के अनुसार अंग्रेजों अर्थात् कार्नवालिस को टीपू सुल्तान द्वारा अपना आधा राज्य तथा तीन करोड़ रुपये जुर्माना के रूप में दिया। |
चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध (1799 ई.) |
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आंग्ल-मराठा युद्ध
प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775-82 ई.) :-
- 1775 ई. में रघुनाथ राव और अंग्रेजों के बीच सूरत की संधि हुई। इस संधि के अनुसार रघुनाथ राव को पेशवा बनना था तथा कम्पनी को सालसेट तथा बेसीन मिलने थे।
- अंग्रेज तथा रघुनाथ राव ने मिलकर अरास के युद्ध में पेशवा को पराजित किया। अंग्रेजों की कलकत्ता कौंसिल ने इसकी तीव्र आलोचना की। फलस्वरूप अंग्रेजों और पेशवा के मध्य 1776 ई. में पूना की संधि हुई। इसके अनुसार कम्पनी ने रघुनाथ राव का साथ छोड़ दिया।
- लेकिन अंग्रेजों और मराठों के बीच शांति स्थापित नहीं हो सकी और पेशवा की सेना ने 1778 ई. में अंग्रेजों को तेलगाँव एवं बड़गांव में पराजित किया। 1779 ई. में बड़गाँव की संधि हुई इसके अंतर्गत अंग्रेजों को मराठों के प्रदेश वापस करने थे। लेकिन अंग्रेजों ने इसे नहीं माना और उनमें अनेक युद्ध हुए।
- 1782 ई. में महादजी सिंधिया के प्रयासों के फलस्वरूप दोनों पक्षों में सालबाई की संधि हुई और प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध समाप्त हो गया। इसके अंतर्गत सालसेट एवं एलीफैंटा अंग्रेजों को मिला तथा अंग्रेजों ने माधवराव को पेशवा मान लिया।
द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1803-06 ई.):-
- आंग्ल-मराठा संघर्ष का दूसरा दौर फ्रांसीसी भय से संलग्न था। लॉर्ड वेलेजली ने इससे बचने के लिए समस्त भारतीय प्रान्तों को अपने अधीन करने का निश्चय किया।
- लॉर्ड वेलेजली के मराठों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप की नीति और सहायक संधि थोपने के कारण द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध आरम्भ हुआ।
- 1802 ई. में पेशवा ने अंग्रेजों के साथ बेसीन की संधि की। जिसके अंतर्गत पेशवा ने अंग्रेजों का संरक्षण स्वीकार कर लिया। एक तरह से वह पूर्ण रूप से अंग्रेजों पर निर्भर हो गए।
- इसलिए अनेक युद्ध हुए और अंत में 1806 ई. में होल्कर और अंग्रेजों के मध्य राजघाट की संधि हुई और युद्ध समाप्त हो गया।
तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1817-18 ई.) :-
- मराठा सरदारों द्वारा अपनी खोई हुई स्वतंत्रता की पुनः प्राप्ति तथा अंग्रेज रेजीडेंट द्वारा मराठा सरदारों पर कठोर नियंत्रण के प्रयासों के चलते यह युद्ध हुआ।
- लॉर्ड हेस्टिंग्स के पिण्डारियों के विरुद्ध अभियान से मराठों के प्रभुत्व को चुनौती मिली तथा दोनों पक्षों में युद्ध आरम्भ हो गया।
- 1818 ई. को बाजीराव-II ने सर जॉन मेल्कम के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। इसके बाद पेशवा का पद समाप्त कर दिया गया और पेशवा को विठूर भेज दिया गया। पूना पर अंग्रेजों का अधिकार स्थापित हो गया।
- मराठों के आत्मसम्मान की तुष्टि के लिए सतारा नामक एक छोटे राज्य का अंग्रेजों द्वारा निर्माण किया गया तथा इसे शिवाजी के वंशज को सौंप दिया गया।
- अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए लॉर्ड वेलेजली ने एक नीति अपनाई, जो ‘सहायक संधि' कहलाई। इस संधि के नियम बहुत सरल थे। वे भारतीय शासक, जिन्हें इस संधि को स्वीकार करने के लिए आमंत्रित किया जाता था, उनसे यह अपेक्षा की जाती थी, कि वे ब्रिटिश अनुमति के बिना किसी अन्य शक्ति से न तो लड़ाई करेंगे और न ही किसी प्रकार का संबंध रखेंगे।
- सहायक संधि स्वीकार करने वाले राज्य की आंतरिक शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए ब्रिटिश जनरलों के नियंत्रण में एक ब्रिटिश सेना रखी जाती थी। इस सेना के खर्च को वहन करने के लिए उस राज्य को अपने क्षेत्र का एक हिस्सा कंपनी को देना पड़ता था या फिर केवल वार्षिक अनुदान देना पड़ता था। इसके बदले में कंपनी सहायक राज्यों को उनके आकार का विचार किए बिना बाह्य आक्रमणों से सुरक्षा प्रदान करती थी।
- कमज़ोर भारतीय राज्यों के लिए सहायक संधि का यह प्रस्ताव वरदान की तरह था। सहायक संधि को खुशी-खुशी स्वीकार करने वाला प्रथम भारतीय शासक हैदराबाद का निज़ाम था। लेकिन टीपू ऐसा भारतीय शासक नहीं था जो चुपचाप अंग्रेजों के समक्ष घुटने टेक देता। फ्रांसीसी सहायता से अपनी सेना को निरंतर आधुनिक बनाने के टीपू के प्रयासों को अंग्रेज़ों द्वारा एक शत्रुतापूर्ण कार्यवाही के रूप में लिया गया। इस प्रकार 1799 ई. में चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध हुआ, जिसमें अपनी राजधानी श्रीरंगपट्टम की रक्षा के लिए बहादुरी से लड़ता हुआ टीपू मारा गया। परिणामस्वरूप, मैसूर राज्य का एक बड़ा भाग ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया।
- मैसूर की विजय सैन्य और वित्तीय दृष्टि से क्लाइव के समय से ब्रिटिश शक्ति की सर्वाधिक महत्वपूर्ण विजय थी। युद्ध और कूटनीति की प्रत्येक विधा में अंग्रेजों ने अपने को मैसूर के बहादुर राजाओं से श्रेष्ठ सिद्ध कर दिया। एक ओर जहाँ हैदरअली और टीपू सुल्तान दोनों ही अन्य भारतीय शक्तियों का समर्थन पाने में असफल रहे, वहीं दूसरी ओर अंग्रेज़ दक्षिण भारत के प्रभावशाली राज्यों का समर्थन पाने अथवा उन्हें अपने समर्थन में तटस्थ रखने में सफल रहे। अंत में, टीपू के राज्य पर विजय के साथ ब्रिटिश साम्राज्य दक्कन के एक छोर से दूसरे छोर तक विस्तृत हो गया।
- टीपू के पतन के तुरंत बाद ब्रिटिश शक्ति के सामने मराठों को भी झुकना पड़ा। द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1803-1805) के आरंभ होने के एक वर्ष पूर्व, पेशवा बाजीराव- II ने बसीन की संधि पर हस्ताक्षर कर अंग्रेजों के साथ सहायक संधि कर ली थी। वास्तव में जसवंत राव होल्कर द्वारा पूना को हस्तगत करने के बाद पेशवा ब्रिटिश सुरक्षा लेने के लिए विवश हुआ, लेकिन यह शीघ्रता में उठाया गया कदम था। इसमें संदेह नहीं कि अंग्रेज़ों ने पेशवा को राजगद्दी पर पुनः प्रतिष्ठित कर दिया लेकिन उन्हें मराठों के मामलों में हस्तक्षेप करने का अवसर भी मिल गया। इस कार्यवाही से मराठा सम्मान को भी चोट पहुँची, क्योंकि प्रथम आंग्ल मराठा युद्ध (1775-1782 ई.) में वे मराठा शक्ति को चोट पहुँचाने की दिशा में वॉरेन हेस्टिंग्स के प्रयासों को निष्फल करने में सफल रहे थे। अतः मराठा प्रमुखों ने अब अंग्रेज़ों के विरुद्ध हथियार उठा लिए। खिन्न पेशवा ने स्वयं गुप्त रूप से उन्हें लड़ाई के लिए प्रोत्साहित किया। किंतु, मराठे संयुक्त होने के बजाय अनुशासित ब्रिटिश सेनाओं से अलग-अलग लड़ते रहे। परिणामस्वरूप, 1803 ई. में असाय की लड़ाई में दौलत राव सिंधिया और रघुजी भोंसले द्वितीय की संयुक्त सेनाएँ गवर्नर जनरल लॉर्ड वेलेजली के छोटे भाई आर्थर वेलेजली से हार गईं। इसके तुरंत बाद अरगाँव में रघुजी भोंसले-II पुनः हार गया और उसने एक संधि पर हस्ताक्षर करना स्वीकार किया। इस संधि के द्वारा भोंसले राजा ने अंग्रेज़ों को ओडिशा सौंप दिया। इसी प्रकार उत्तर में लसवारी नामक स्थल में जनरल लेक द्वारा दौलत राव सिंधिया बुरी तरह पराजित हुआ और इसने सुरजी-अर्जनगाँव में एक संधि पर हस्ताक्षर किए। इस संधि के अनुसार सिंधिया ने गंगा और यमुना नदियों के मध्य स्थित अपने राज्य का एक विशाल भाग अंग्रेज़ों को सौंप दिया।
- इन विजयों के फलस्वरूप भारत में राजनीतिक हवा अंग्रेजों के समर्थन में बहने लगी। ओडिशा के तटीय क्षेत्र को मिला लेने के बाद ब्रिटिश राज्य पूर्व में बंगाल और दक्षिण में मद्रास तक भूमि द्वारा जुड़ गया। भय से राजपूत राजाओं ने अंग्रेज़ों के साथ संधियाँ कीं। 1803 ई. में मराठों पर वेलेजली की विजय ने भारत में अंग्रेज़ों को सर्वोच्च सत्ता बना दिया, लेकिन वे मराठों की शक्ति को पूरी तरह नहीं कुचल पाए। मुकुंद दारा में जसवंत राव होल्कर की कर्नल मानसन के विरुद्ध विजय एवं उसके दिल्ली कूच करने के पश्चात वेलेजली को 1805 ई. में कंपनी प्रशासन ने इंग्लैंड वापस बुला लिया। लॉर्ड वेलेजली द्वारा अपूर्ण छोड़े गए इस कार्य को पूरा करने में लॉर्ड हेस्टिंग्स को 12 वर्षों का समय लगा।
- लॉर्ड हेस्टिंग्स भारत में अहस्तक्षेप की नीति का अनुसरण करने की इच्छा से आया था। लेकिन अंग्रेज़ों द्वारा पिंडारियों के दमन ने तृतीय मराठा युद्ध का रास्ता खोल दिया। तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1817-1818 ई.) का प्राथमिक कारण पेशवा बाजीराव-II का अपनी अधीनस्थ स्थिति से असंतुष्ट होना था। इसलिए उसने अंग्रेजों के विरुद्ध अन्य मराठा प्रमुखों को संगठित करना शुरू किया। हालांकि, बड़ौदा का गायकवाड़ उसके पक्ष में नहीं था। अतः उस पर दबाव डालने के लिए पेशवा ने गायकवाड़ से अहमदाबाद क्षेत्र की माँग की। यहाँ तक कि पूना में गायकवाड़ों के दूत की भी बहुत बुरी तरह से हत्या कर दी गई। इस हत्या में पेशवा के मंत्री त्रिम्बक जी का हाथ होने की आशंका थी। इसलिए पूना में ब्रिटिश रेजीडेंट एलफिंस्टन ने गायकवाड़ों की ओर से हस्तक्षेप किया। उसने त्रिम्बक जी के आत्मसमर्पण और पेशवा के साथ एक नई सहायक संधि करने की माँग की। इसी प्रकार, गायकवाड़, भोंसले प्रमुख अप्पा साहेब और दौलतराव सिंधिया को अंग्रेजों के साथ नई संधियाँ करनी पड़ी। मराठा सरदारों के साथ हुए इस प्रकार के व्यवहार को पेशवा ने पसंद नहीं किया। अतः उसने अंग्रेज़ों पर आक्रमण कर दिया। इसी समय नागपुर में अप्पा साहेब भोंसले ने और इंदौर में मल्हार राव- II ने अंग्रेजों के विरुद्ध हथियार उठा लिए। अंग्रेज़ों ने शीघ्र ही इन तीनों को अलग-अलग हरा दिया और इस प्रकार तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध का अंत 1818 ई. में हो गया।
- पिंडारियों का उद्भव अज्ञात है। उनका यह नाम संभवतः कर्नाटक के बेदर अथवा बैदर से लिया गया है। वे अपने प्रमुखों के अधीन समूहों में कार्य करते थे और उनकी जातीय अथवा धार्मिक पहचान भिन्न थी। पेशवा बाजीराव प्रथम के समय से ही वे मराठा सेना से अनियमित घुड़सवारों के रूप में जुड़े थे। पानीपत की तीसरी लड़ाई के बाद वे मालवा क्षेत्र में बस गए और इन्होंने अपने को सिंधिया और होल्करों से जोड़ लिया। लेकिन ज्योंही मराठों की शक्ति का ह्रास हुआ, यह मध्य भारत, राजस्थान के कुछ भागों और दक्कन के कुछ जिलों तक फैले वृहद् भौगोलिक क्षेत्र में अंधाधुंध लूटमार करने लगे। अंग्रेजों ने भारत में अपने साम्राज्य का विस्तार करने की प्रक्रिया में उनका दमन करना आवश्यक समझा। 1817 ई. में ब्रिटिश जनरलों जॉन मैलकॉम और थामस हिस्लॉप ने लॉर्ड हेस्टिंग्स की देख-रेख में पिंडारी दलों को कुचल दिया।
- इस युद्ध के परिणाम मराठों के लिए बहुत भयानक सिद्ध हुए। पेशवा के पद को समाप्त कर दिया गया तथा उसका संपूर्ण राज्य अंग्रेजों द्वारा हस्तगत कर लिया गया। छत्रपति शिवाजी के एक वंशज को सतारा के सिंहासन पर बैठाया गया। इसी प्रकार, अप्पा साहेब को पदच्युत कर दिया गया और नर्मदा नदी के उत्तर में स्थित उनका संपूर्ण क्षेत्र हस्तगत कर लिया गया। नागपुर में रघुजी भोंसले-II के स्थान पर उनके अवयस्क पुत्र को सिंहासन पर बैठाया गया। मल्हार राव होल्कर द्वितीय को सहायक संधि स्वीकार करने और राजपूत राज्यों से अपने सारे दावे छोड़ने के लिए बाध्य किया गया। अतः इस नवीन राजनीतिक परिदृश्य में अंग्रेज़ों का प्रभुत्व संपूर्ण हो गया।
- मराठों को पराजित करने से पूर्व लॉर्ड हेस्टिंग्स ने भारत में एक बड़ी युद्धनीतिक कार्यवाही कर दी थी। नेपाल के गोरखा उस समय शक्तिशाली हो रहे थे। उत्तर भारतीय मैदानों के क्षेत्र हथियाने के उनके निश्चय ने ब्रिटिश हितों को प्रभावित किया। अतः आंग्ल-नेपाल युद्ध (1814-1816 ई.) अवश्यंभावी हो गया। प्रारंभ में अंग्रेजों को कुछ पराजयों का सामना करना पड़ा। अंततः गोरखा नेता अमर सिंह को पराजित कर दिया गया और मार्च, 1816 में 'सगौली की संधि' पर हस्ताक्षर किए गए। इस संधि द्वारा गोरखों ने गढ़वाल और कुमायूँ अंग्रेज़ों को सौंप दिए। इससे अंग्रेजों का क्षेत्रीय विस्तार उत्तर-पश्चिम में पहाड़ों तक हो गया। पूर्व में गोरखों ने सिक्किम को भी छोड़ दिया, जो ब्रिटिश संरक्षित राज्य बन गया। इन सबके साथ ही गोरखों ने काठमांडू में एक ब्रिटिश रेजीडेंट रखना भी स्वीकार कर लिया।
- 1816 ई. में ब्रिटिश-भारत और नेपाल के बीच स्थापित संबंध आज भी कायम हैं। तभी से भारतीय सेना में सेवा के लिए विशाल संख्या में गोरखों की भर्ती की जाती है। यह आज भी सम्मान के साथ ब्रिटिश सेना में सेवारत हैं।
- लॉर्ड हेस्टिंग्स के बाद सबसे बड़ा विलयकर्ता लॉर्ड डलहौज़ी (1846-1856 ई.) था। लेकिन इन दोनों साम्राज्यवादी गवर्नर जनरलों का मध्यवर्ती काल भी घटनाप्रधान था। इस समय बर्मा (म्यांमार) और सिंध पर अंग्रेज़ों का नियंत्रण स्थापित हो गया।
- सिंध विजय के बाद ही पंजाब पर विजय प्राप्त की गई। अंग्रेजों के लिए यह विजय उनके साम्राज्य की सीमाओं को उत्तर-पश्चिम में उसकी प्राकृतिक सीमा तक विस्तृत करने के लिए आवश्यक थी। पंजाब में महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु से जो राजनीतिक अव्यवस्था उत्पन्न हुई। मेजर ब्रॉडफूट को पंजाब में लॉर्ड हार्डिंग (1844- 1848 ई.) द्वारा अंग्रेजों के राजनीतिक प्रतिनिधि के रूप में भेजा गया था, जिसने सिक्ख कुलीनों को विभाजित करने और सिक्ख सेना को सतलुज नदी पार करने के लिए प्रवृत्त करने हेतु हर तरह का प्रयास किया। 1809 ई. में अमृतसर में की गई संधि द्वारा इस नदी को ब्रिटिश और महाराजा रणजीत सिंह के राज्यक्षेत्रों के मध्य की सीमा निर्धारित कर दिया गया था। सिक्ख सेना ने मुश्किल से नदी पार की ही थी, कि लॉर्ड हार्डिंग ने युद्ध की घोषणा कर दी। यह युद्ध प्रथम आंग्ल-सिक्ख युद्ध (1845-1846 ई.) के नाम से जाना गया। सिक्खों के सेनापति तेजसिंह और अन्य सेनापतियों द्वारा की हार के साथ ही यह युद्ध समाप्त हुआ। अंग्रेज़ लाहौर की ओर बढ़े।
- और शांति की शर्तों का निर्देश दिया। इसी के अनुरूप मार्च, 1846 में लाहौर की संधि पर हस्ताक्षर किए गए। इस संधि द्वारा महाराजा दलीप सिंह ने सतलुज नदी के बाईं तरफ और सतलुज व व्यास नदी के बीच के सभी क्षेत्र अंग्रेज़ों को सौंप दिए। युद्ध के एक बड़े मुआवजे के रूप में उसे जम्मू और कश्मीर भी सौंपना पड़ा। उसकी सेना की शक्ति बहुत कम कर दी गई। इसके अतिरिक्त लाहौर में सुरक्षा सेना के साथ एक ब्रिटिश रेजीडेंट को नियुक्त किया गया।
- 1846 ई. के शांति समझौते ने न तो अंग्रेज़ों की साम्राज्यवादी आकांक्षाओं की पूर्ति की और न ही सिक्खों को संतुष्ट किया। सिक्खों ने विशेष रूप से पंजाब के आंतरिक मामलों में अंग्रेजों के हस्तक्षेप को पसंद नहीं किया। अज़ान तथा गौ-वध में मुसलमानों को छूट दिए जाने को उन्होंने स्वीकृति नहीं दी। हटाए गए सैनिक स्वाभाविक रूप से अपनी नौकरियों को खोने के बाद खुश नहीं थे। महाराजा दलीप सिंह की पदच्युत प्रतिशासक, रानी जिंदन को षड्यंत्र के आरोप में चुनार निर्वासित किए जाने की घटना ने भी आग में ईंधन का काम किया। लॉर्ड डलहौज़ी पंजाब को अधिगृहीत किए जाने के अवसर का इंतज़ार कर रहा था। उसको यह अवसर उस समय मिला जब गवर्नर मूलराज द्वारा 'उत्तराधिकार शुल्क' चुकाने में असमर्थता के कारण मुल्तान में विद्रोह हुआ। इसी बीच 20 अप्रैल,1848 ई. को दो अंग्रेज़ अधिकारियों की हत्या कर दी गई। डलहौज़ी की राय में यह 'सिक्ख जाति का युद्ध के लिए आह्वान' था। इस प्रकार का 'विश्वास-भंग' होने पर द्वितीय आंग्ल-सिक्ख युद्ध (1848-1849 ई.) हुआ। कई लड़ाइयों के बाद अंततः 12 मार्च, 1849 को सिक्खों ने आत्मसमर्पण कर दिया। इसके सत्रह दिनों बाद पंजाब का ब्रिटिश साम्राज्य में अधिग्रहण कर लिया गया। महाराजा दलीप सिंह को इंग्लैंड निर्वासित कर दिया गया और पेंशन दी गई। प्रसिद्ध कोहेनूर हीरा कोहेनूर भी उससे लेकर महारानी विक्टोरिया के पास भेज दिया गया।
- द्वितीय आंग्ल-सिक्ख युद्ध उन युद्धों की श्रृंखला में अंतिम था, जिन्हें अंग्रेजों ने भारत की प्राकृतिक सीमाओं के अंदर अपने साम्राज्य विस्तार के लिए लड़ा था। लेकिन क्षेत्रों के अधिग्रहण के लिए केवल सामरिक विजय ही डलहौज़ी द्वारा अपनाया गया एक मात्र तरीका नहीं था। सतारा, जैतपुर, उदयपुर, संबलपुर, नागपुर, भगत और झाँसी के अधिग्रहण के लिए उसने 'विलय नीति' का प्रयोग किया। बरार और अवध का अधिग्रहण उसने कुप्रशासन का आरोप लगाकर किया। इसी प्रकार उसने शासकों की उपाधियों और पेंशनों को समाप्त करते हुए कर्नाटक और तंजौर का भी विलय कर लिया था।
- लॉर्ड डलहौज़ी द्वारा 'विलय नीति' को इस मान्यता पर लागू किया गया, कि इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में सर्वोच्च शक्ति थी। बिना कंपनी की अनुमति के आश्रित शासकों द्वारा गोद लिए गए पुत्रों को सत्ता हस्तांतरित नहीं की जा सकती थी।
- इन सभी कमियों के बावजूद भारत पर अंग्रेज़ों की विजय ने कम-से-कम एक उद्देश्य की पूर्ति की। इसने भारत के भौगोलिक क्षेत्र को अपेक्षित राजनीतिक एकता प्रदान की। जिस समय लॉर्ड डलहौज़ी ने भारत छोड़ा, उस समय ब्रिटिश साम्राज्य की सीमाएँ एक ओर हिंदुकुश तो दूसरी ओर बर्मा को छू रही थीं और इसके अंतर्गत हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक का संपूर्ण भू-भाग आ गया था। निस्संदेह, एक विदेशी शक्ति के अधीन राजनीतिक एकीकरण अपने साथ वृहद औपनिवेशिक शोषण लेकर आया था। साथ ही इसने भारतीयों को एक राष्ट्र के रूप में सजग होने, उपनिवेशवाद के खिलाफ लड़ने और स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु एक आधार प्रदान किया।
संधि | वर्ष | संधिकर्ता |
अलीनगर की संधि | 9 फरवरी, 1757 | बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच। इस संधि में अंग्रेजों के प्रतिनिधि के रूप में क्लाइव और वाटसन शामिल थे। |
अमृतसर की संधि | 28 अप्रैल, 1809 | महाराजा रणजीत सिंह और ईस्ट इण्डिया कंपनी के बीच। इस संधि के समय भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड मिन्टों थे जिन्होंने ईस्ट इण्डिया कंपनी की और से प्रतिनिधित्व किया था। |
इलाहाबाद की संधि | 1765 ई. | क्लाइव और मुगल बादशाह शाहआलम-II के बीच। |
उदयपुर की संधि | 1818 ई. | उदयपुर के राजा राणा और अंग्रेजों के बीच। |
गंडमक की संधि | 1879 ई. | वायसराय लॉर्ड लिटन और अफगानिस्तान के अपदस्थ अमीर शेर अली के बीच। |
देवगाँव की संधि | 17 दिसम्बर, 1803 ई. | रघुजी भोंसले और अंग्रेजों के बीच। |
पुरंदर की संधि | मार्च, 1776 ई. | मराठों और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच। |
पूना की संधि | 1817 ई. | पेशवा बाजीराव-II और अंग्रेजों के बीच। |
बड़गाँव की संधि | 1779 ई. | मराठों और कंपनी के बीच (प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध के समय )। इस संधि पर अंग्रेजों की ओर से कर्नल काकवर्न ने हस्ताक्षर किया था। |
बनारस की संधि | प्रथम संधि - 1773 ई. | अवध के नवाब शुजाउद्दौला और अंग्रेज ईस्ट इण्डिया कम्पनी के बीच। |
| द्वितीय संधि - 1776 ई. | काशी नरेश चैत सिंह और ईस्ट इण्डिया कंपनी के बीच। |
बसीन की संधि | 31 दिसम्बर, 1802 ई. | मराठा पेशवा बाजीराव-II और अंग्रेजों के बीच। |
सालबाई की संधि | 1782 ई. | महाराजा शिन्दे और ईस्ट इण्डिया कंपनी के बीच। |
सुर्जीअर्जन गाँव की संधि | 1803 ई. | अंग्रेजों और दौलत राव के बीच। |


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