वाक्यांश के लिए एक शब्द  : [कुल-50]



1.जंगल में फैलनेवाली आग - दावाग्नि

2.समुद्र में लगने वाली आग - बड़वानल

3.जो सपना दिन में देखा जाए - दिवास्वप्न

4.जिसे कठिनाई से जाना जा सके - दुर्ज्ञेय 

5.जो कठिनाई से समझ में आता हो - दुर्बोध

6.अर्द्धरात्रि का समय - निशीथ 

7.रंगमंच पर पर्दे के पीछे का स्थान - नेपथ्य 

8.आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लेने वाला - नैष्ठिक

9.नाटक का पर्दा गिरना - पटाक्षेप 

10.रंगमंच का पर्दा - यवनिका

11.जो उत्तर न दे सके - निरुत्तर

12.केवल दूध पर जीवित रहने वाला - पयोहारी

13.शरणागत की रक्षा करने वाला - प्रणतपाल

14.एक बार कही हुई बात को दोहराते रहना - पिष्टपेषण

15.जो पूछने योग्य हो - पृष्टव्य 

16.प्रमाण द्वारा सिद्ध करने योग्य - प्रमेय 

17.रात का भोजन - ब्यालू/ रात्रिभोज

18.जिसकी आंखें मगर जैसी हो - मकराक्ष

19.जिस स्त्री की आंखें मछली के समान हो - मीनाक्षी 

20.जिस पुरुष की आंखें मछली के समान हो - मीनाक्ष 

21.हरिण के नेत्रों-सी आंखों वाली - मृगनयनी

22.मोक्ष प्राप्त करने की इच्छा - मुमुक्षा 

23.मरने की इच्छा - मुमूर्षा

24.युद्ध करने की इच्छा - युयुत्सा

25.सृजन करने की इच्छा - सिसृक्षा

26.खुले हाथ से दान देने वाला - मुक्तहस्त

27.माता की हत्या करने वाला - मातृहन्ता

28.जिसने मृत्यु को जीत लिया हो - मृत्युंजय

29.वह कन्या जिसका विवाह करने का वचन दे दिया गया हो -  वाग्दत्ता

30.व्याकरण का ज्ञाता - वैयाकरण

31.शत्रु का नाश करने वाला - शत्रुघ्न

32.जिसका कोई आदि और अंत न हो - शाश्वत

33.जो सब कुछ जानता हो - सर्वज्ञ

34.सब कुछ पाने वाला - सर्वलब्ध 

35.जो गुप्त रूप से निवास करता हो - छद्मवासी

37.दिन और रात के बीच का समय - गोधूलि वेला

38.जिसका अर्थ स्वयं ही सिद्ध है - सिद्धार्थ

39.वह व्यक्ति जिसका ज्ञान अपने ही स्थान तक सीमित है - कूपमंडूक

40.भोजन करने के बाद का बचा हुआ अन्न/जूठन - उच्छिष्ट

41.जिसे सूँघा न जा सके - आघ्रेय

42.वह कवि जो तत्काल कविता कर सके - आशुकवि

43.जिसका कोई शत्रु न जन्मा हो - अजातशत्रु

44.जो इंद्रियों (गो) द्वारा न जाना जा सके - अगोचर

45.किसी बात को अत्यधिक बढाकर कहना - अतिशयोक्ति

46.जिसे बुलाया न गया हो - अनाहूत 

47.जो सबके मन की बात जनता हो - अंतर्यामी

48.जो मापा न जा सके - अपरिमेय

49. किसी वस्तु को प्राप्त करने की तीव्र इच्छा - अभीप्सा

50.आवश्यकता से अधिक धन का ग्रहण न करना - अपरिग्रह