आद्य इतिहास
पाषाण युग की समाप्ति के बाद धातुओं के युग का प्रारम्भ हुआ। इसी युग को आद्य ऐतिहासिक काल या धातु काल कहा जाता है।
हड़प्पा संस्कृति तथा वैदिक संस्कृति की गणना इस काल से की जाती है।
अब तक विश्व की चार सभ्यताएँ प्रकाश में आई हैं जो निम्न हैं-
सभ्यता नाम - नदी
1. मेसोपोटामिया - दजला व फराज
2. मिस्र - नील
3. भारत - सिन्धु
4. चीन - ह्वांग-हो (पीली नदी)
सिंधु घाटी सभ्यता
- सैन्धव सभ्यता की लिपि भावचित्रात्मक थी।
- इस लिपि की पहली line – दाएँ से बाएँ, दूसरी line – बाएँ से दाएँ लिखी जाती है।
- इसके अन्य नाम:-
- सर्पिलाकार लिपि
- गोमूत्री लिपि
- ब्रस्टोफेदन/फेदस/फेदम
- सिन्धु घाटी सभ्यता की लिपि को सर्वप्रथम पढ़ने का प्रयास ‘वेडेन महोदय’ ने किया था। इस लिपि को पढ़ने का
- प्रयास करने वाले प्रथम भारतीय व्यक्ति ‘नटवर झा’ थे, परन्तु पढ़ने में असफल रहे।
- इस लिपि में 64 मूल चिह्न हैं जबकि 250-400 तक चित्राक्षर हैं।
- सर्वाधिक इस लिपि के चित्राक्षर उल्टे यू (Π) के आकार के हैं।
- लिपि के साक्ष्य हड़प्पा के कब्रिस्तान से मिलते हैं।
सिन्धु का अतीत -
- सर्वप्रथम 1826 ई. में चार्ल्स मैसन ने (1842 ई.) में प्रकाशित एक लेख के द्वारा भारत में एक प्राचीनतम नगर हड़प्पा के होने की बात कही थी।
- 1834 ई. बर्नेश ने किसी नदी के किनारे ध्वस्त किले के होने की बात कही थी।
- 1851-53 ई. में अलेक्जेण्डर कनिंघम ने हड़प्पा के टिले का सर्वेक्षण किया था।
- 1856 ई. में पहली बार A. कनिंघम ने हड़प्पा का मानचित्र जारी किया था।
हड़प्पा संस्कृति का विस्तार :-
• सैंधव सभ्यता का भौगोलिक विस्तार उत्तर में मांडा (जम्मू) से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी के मुहाने तक तथा पश्चिम में सुत्कागेंडोर से लेकर पूर्व में आलमीगीरपुर (मेरठ) तक है।
• यह सभ्यता उत्तर से दक्षिण लगभग 1400 किमी. तक तथा पूर्व से पश्चिम लगभग 1600 किमी. तक फैली हुई थी। अभी तक उत्खनन तथा अनुसंधान द्वारा करीब 2800 स्थल ज्ञात किए गए हैं।
• वर्तमान में नवीन स्थल प्रकाश में आने के कारण अब इसका आकार – विषमकोणीय चतुर्भुज है।
• 1856 ई. में कराची से लाहौर रेलवे लाईन बिछाते समय जॅान बर्टन व विलियम बर्टन के आदेशों से पहली बार हड़प्पा के टीले से कुछ ईंटे निकाली गई थी।
NOTE- इस समय भारत के गर्वनर जनरल लार्ड डलहौजी थे। डलहौजी को भारत में रेलवे का जनक कहा जाता है। भारत में पहली बार रेल 16 अप्रैल, 1853 को बम्बई से थाणे के मध्य 33 किमी. (लगभग) चलाई गई।
• 1881 ई. में एक बार पुन: एलेक्जेण्डर कनिंघम हड़प्पा के टीले पर गए तथा वहाँ से कुछ मोहरें प्राप्त की।
• सन् 1899-1905 के दौरान लार्ड कर्जन भारत में G.G. & वायसराय बनकर आए तथा इन्होंने 1904 ई. में भारतीय पुरातत्व एवं सर्वेक्षण विभाग की स्थापना की तथा भारत में प्राचीन इमारतों व नगरों के संरक्षण व सर्वेक्षण का आदेश पारित किया।
• इसी के शासनकाल में जॉन मार्शल नए निदेशक के रूप में भारत आए और उन्होनें 5 सदस्यों की एक कमेटी बनाई जिसमें-
o रायबहादुर दयाराम साहनी
o राखालदास बनर्जी
o अर्नेस्ट मैके
o माधवस्वरूप वत्स
o मार्टिन विलर
• इन सभी लोगों को भारत में प्राचीन नगर व सभ्यता का पता लगाने का आदेश दिया गया।
• 1921 ई. में रायबहादुर दयाराम साहनी ने हड़प्पा की खोज की थी।
• 1922 ई. में राखालदास बनर्जी ने मोहनजोदड़ो की खोज की थी।
• हड़प्पा सभ्यता कांस्ययुगीन सभ्यता है।
• हड़प्पा सभ्यता के अंतर्गत पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान, अफगानिस्तान, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के भाग आते हैं।
• जॉन मार्शल ’सिंधु सभ्यता’ नाम का प्रयोग करने वाले पहले पुरातत्वविद् थे।
• अमलानन्द घोष ने ’सोथी संस्कृति‘ का हड़प्पा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान माना है।
• मोहनजोदडो की बहुंख्यक जनता भूमध्यसागरीय प्रजाति की थी।
• सिन्धु सभ्यता के नवीनतम स्थल-थार का मरुस्थल –वैंगीकोट व गुजरात में करीमशाही खोजे गए हैं।
सिंधु घाटी सभ्यता की नगर योजना :
• सिंधु घाटी सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता अद्भुत नगर नियोजन व्यवस्था तथा जल निकासी प्रणाली थी।
• बस्तियाँ दो भागों में विभाजित थी। जिन्हें क्रमश: दुर्ग और निचला शहर नाम दिया गया है।
• दुर्ग में शासक वर्ग निवास करता था तथा दुर्ग चारों और दीवार से घिरा हुआ। इसे निचले शहर से अलग किया गया था।
• दूसरा भाग जिसमें नगर के साक्ष्य मिले हैं, यहाँ सामान्य नागरिक, व्यापारी, शिल्पकार, कारीगर, श्रमिक वर्ग निवास करते थे। निचला शहर भी दीवार से गिरा था।
• सड़कें एक दूसरे को समकोण पर काटती थी। सड़कों के किनारे सुव्यवस्थित नालियाँ बनी थी। यह नालियाँ ऊपर से ढकी हुई होती थी। इनमें घरो से निकलने वाला गंदा पानी छोटी नालियों से होते हुए मुख्य सड़क पर बड़े नाले में मिल जाता था। हड़प्पा व मोहनजोदड़ों की नगर योजना लगभग समान थी।
· भवन निर्माण में पक्की एवं कच्ची दोनों तरह की ईंटों का प्रयोग होता था। भवन में सजावट आदि का अभाव था। प्रत्येक मकान में स्नानागार, कुएं एवं गंदे जल की निकासी के लिए नालियों का प्रबंध था। मकानों के दरवाजे मध्य में न होकर एक किनारे पर होते थे।
हड़प्पा सभ्यता के प्रमुख स्थल:-
स्थल | नदी/सागर तट | उत्खननकर्ता |
हड़प्पा | रावी नदी | दयाराम साहनी |
मोहनजोदड़ो | सिंधु नदी | राखालदास बनर्जी |
लोथल | भोगवा नदी | एस. आर. राव |
कालीबंगा | घग्घर नदी | अमलानन्द घोष |
रोपड़ | सतलज नदी | यज्ञदत्त शर्मा |
कोटदीजी | सिंधु नदी | फजल अहमद खां |
चन्हुदड़ो | सिंधु नदी | एन. जी. मजूमदार |
रंगपुर | मादर नदी | एम.एस. वत्स |
आलमगीरपुर | हिन्डन नदी | यज्ञदत्त शर्मा |
सुत्कागेडोर | दाश्क नदी | ऑरेल स्टाइन |
बनावाली | सरस्वती नदी | रवीन्द्र सिंह विस्ट |
रेडियो कार्बन पद्धति:-
- खोज- बिलियर्डस F.Libbi के द्वारा संसार की प्रत्येक वस्तु में कार्बन के 2 अणु C12 व C14 पाए जाते हैं, जब तक यह सजीव अवस्था में होते हैं, तब तक उनमें इन दोनों अणुओं की मात्रा समान रहती है, परन्तु जैसे ही कोई वस्तु मृत अवस्था में जाती है तो C12 की मात्रा स्थिर हो जाती है तथा C14 की मात्रा में कमी होना प्रारंभ हो जाती है।
- लगभग 5730 वर्ष बाद C14 की मात्रा घटकर आधी (½) रह जाती है।
- इसी आधार पर किसी भी वस्तु की आयु ज्ञात कर ली जाती है।
- रेडियो कार्बन (C-14) पद्धति के अनुसार हड़प्पा सभ्यता का सर्वमान्य काल 2350 ई. पू. से 1750 ई. पू. को माना जाता है।
प्रमुख स्थल तथा विशेषताएं :-
हड़प्पा :-
- हड़प्पा पश्चिमी पंजाब प्रान्त के मोंटगोमरी जिले में रावी नदी के बाएँ तट पर स्थित है।
- स्टुअर्ट पिग्गट के अनुसार यह अर्द्ध-औद्योगिक नगर था। यहाँ के निवासियों का एक बड़ा भाग व्यापार, तकनीकी उत्पाद और धर्म के कार्यों में संलग्न था।
- इसकी खोज दयाराम साहनी ने वर्ष 1921 में की थी।
- इस का उत्खनन – दो बार हुआ था-
हड़प्पा से प्राप्त अन्य अवशेष :-
- हड़प्पा से स्त्री के गर्भ से निकलते हुए एक पौधे की मृण्मूर्ति प्राप्त हुई है, जिसे हड़प्पा वासियों ने उर्वरा देवी या पृथ्वी देवी कहा है।
- यहां से नरक बंध प्रस्तर (बिना धड़ की पाषाण मूर्ति) प्राप्त हुई।
- काँसे का दर्पण।
- प्रसाधन मंजूषा (शृंगार पेटी)।
- मानव के साथ बकरे के शवादान के साक्ष्य।
- सर्वाधिक अलंकृत मोहरें (हड़प्पा जग की सर्वाधिक मोहरें मोहनजोदड़ो से) प्राप्त हुई है।
- सैंधव सभ्यता की मोहरें सेलखड़ी (स्टेटाइड) से निर्मित होती थी।
मुहरें 3 प्रकार की होती थी-
- 1. आयताकार 2. वृत्ताकार 3. वृगाकार (सर्वाधिक)
- इन मोहरों पर एक श्रृंगी बैल या हिरण, कूबड़दार बैल, मातृदेवी, व्याघ्र, पशुपतिनाथ व भैंसा आदि का अंकन मिलता है।
मोहनजोदडो :-
- मोहनजोदड़ो सिंधु नदी के दाहिने किनारे पर अवस्थित था जो वर्तमान में पाकिस्तान के सिंध प्रान्त के लरकाना जिले में स्थित है। इसकी खोज राखालदास बनर्जी ने वर्ष 1922 में की थी। इसे सिंध का नखलिस्तान भी कहा जाता है।
- यह नगर 8 बार उजड़कर 9 बार बसा था। जिसके 7 क्रमिक स्तर मिले है। (यहाँ से मिट्टी की गाद मिली है)
- मोहनजोदड़ो की सबसे बड़ी इमारत अन्नागार थी तथा सबसे बड़ा सार्वजनिक स्थल ’विशाल स्नानागार’ था, इस स्नानागार का धार्मिक महत्त्व था। इसके चारो ओर जल भण्डारण हेतू बड़े-बड़े टैंक मिले है। इसे जॉन मार्शल ने तत्कालीन विश्व का आश्चर्यजनक निर्माण कहा साथ ही इसे विराट वस्तु की संज्ञा दी है।
- मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मोहन पर तीन मुख वाले एक देवता का अंकन किया गया है। जिसके चारों तरफ भैंसा, हाथी, गेंडा, व्याघ्र व नीचले भाग पर 2 हिरण व ऊपरी भाग पर मछली व 10 अक्षरों का अंकन मिलता है।
- जॉन मार्शल ने इसे पशुपतिनाथ की उपाधि प्रदान की साथ ही इसे ‘आद्यतम शिव’ की उपमा दी गई है।
- इस स्थल से मानव कंकाल (शायद नरसंहार) के साक्ष्य मिले हैं।
- यहाँ से कांसे की नृत्य करती हुई नर्तकी की मूर्ति प्राप्त हुई है। इसका निर्माण द्रवी-मोम विधि से हुआ है।
- हड़प्पावासी तांबे और टिन को मिलाकर कांसे का निमार्ण करते थे।
- मोहनजोदड़ो से प्राप्त मुहर पर एक योगी को ध्यान मुद्रा में एक टांग पर दूसरी टांग डाले बैठा दिखाया गया है।
लोथल :-
- यह औद्योगिक नगर था ।
- लोथल से मनके बनाने का कारखाना मिला है।
- माप-बाट-माप-तौल के लिए पैमाना/हाथी दाँत पैमाना होता था।
- यह सिन्धु सभ्यता का एक प्रमुख गोदीबाड़ा(डॉक यार्ड) बंदरगाह/पातन/पत्तन था।
- सिकोत्तरी माता- समुद्री देवी थी।
- 4 नाव के साक्ष्य से द. पूर्वी एशियाई देशों के साथ व्यापार का पता चलता है।
- संम्पूर्ण सैन्धव सभ्यता का सबसे बड़ा सार्वजनिक स्थल- लोथल का गोदीबाड़ा था। यहाँ से बंदरगाह के प्रमाण प्राप्त हुए हैं। लोथल उस समय पश्चिमी एशिया से व्यापार का प्रमुख स्थल था।
- यहाँ से खोपड़ी की शल्य चिकित्सा के साक्ष्य मिले है।
- तीन युगल शवादान (एक साथ दफनाए शव) मिले जिनका सिर उत्तर दिशा की तरफ तथा पैर दक्षिण दिशा की तरफ है।
- यहाँ से अग्निकुंड/अग्निवेदिकाएँ मिली है।
- लोथल की सबसे प्रसिद्ध कृति पक्की ईंटो का बना जहाजों का डॉकयार्ड था, जो त्रिभुजाकार था। यहाँ से मिली मोहरों में सबसे महत्वपूर्ण वे हैं, जो ईरान की खाड़ी में मिली मुहरों के अनुरूप हैं, जिनसे मेसोपोटामिया और फ़ारस (ईरान) के साथ व्यापारिक संबंधों का पता चलता है।
कालीबंगा :-
- कालीबंगा से हड़प्पा सभ्यता के साथ-साथ हड़प्पा पूर्व सभ्यता के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं।
- कालीबंगा राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में स्थित घग्घर नदी के किनारे स्थित है।
- कालीबंगा का अर्थ ‘काले रंग की मिट्टी की चूड़ियाँ’ होता है।
· कालीबंगा से प्राप्त साक्ष्य –
- ऊँट के प्रथम साक्ष्य
- हल की आकृति व जूते हुए खेत के साक्ष्य मिले हैं।
- कालीबंगा के लोग एक साथ 2 फसलें बोते थे।
- लकड़ी की नालियों के साक्ष्य।
- खोपड़ी की शल्य चिकित्सा के साक्ष्य।
- यहाँ से प्राप्त एक खोपड़ी मे छेद किए हुए मिले हैं।
- कालीबंगा से 3 प्रकार के शवादान के साक्ष्य मिले हैं-
- आंशिक शवादान
- पूर्ण शवादान
- दाह संस्कार
- कालीबंगा से विश्व के प्रथम भूकम्प के साक्ष्य मिले, जो कि लगभग 2100 ई.पू. के आसपास आया होगा।
- अलंकृत फर्श, ईँट तथा बेलनाकार मोहरें व हवनकुण्ड के साक्ष्य।
नोट- डॉ. दशरथ शर्मा ने कालीबंगा को तीसरी राजधानी कहा।
- बेलनाकार मोहरें मेसोपोटामिया में भी प्रचलित थी, अत: यह कहा जा सकता है, कि संभवत: कालीबंगा के व्यापारिक संबंध मेसोपोटामिया के साथ रहे होंगे।
चन्हूदड़ो :
- चन्हूदड़ो, मोहनजोदड़ो से 130 किमी. दक्षिण में स्थित है। इसकी सर्वप्रथम खोज 1931 ई. में - नानी गोपाल मजूमदार (NG मजूमदार) ने की थी। उत्खनन :- 1935 में अर्नेस्ट मैके के द्वारा किया गया।
- चन्हूदड़ो सिंधु घाटी सभ्यता का एकमात्र पुरास्थल है, जहाँ से वक्राकार ईंटें मिली हैं।
- यह एक औद्योगिक केंद्र था। यहाँ से मनका बनाने का एक कारखाना प्राप्त हुआ है।
- यह एक औद्योगिक नगर था।
यहाँ से प्राप्त साक्ष्य:-
- मनके बनाने के कारखाने के साक्ष्य।
- सौंदर्य प्रसाधान सामग्री (जैसे- लिपिस्टिक) के अवशेष यहाँ मिले हैं।
- हाथी का खिलौना।
- पित्तल की इक्का गाड़ी।
- स्याही की दवात के साक्ष्य मिले हैं।
- चन्हूदड़ो से किसी भी प्रकार के दुर्ग के साक्ष्य नहीं मिलते हैं।
- यहाँ से बिल्ली के पीछे भागते हुए कुत्ते के पदचिह्न भी प्राप्त हुए हैं।
- सम्पूर्ण सिन्धु सभ्यता का एकमात्र सभ्यता स्थल जहाँ से ‘झुकर’ व ‘झांगर’ संस्कृति के अवशेष प्राप्त होते हैं।
बनावली :
- बनावली, हरियाणा के हिसार जिले में सरस्वती नदी के किनारे स्थित है।
- इस स्थल से जौ, तिल तथा सरसों के ढेर मिले हैं।
- बनावली में जल विकास प्रणाली का अभाव था।
रंगपुर :
- रंगपुर गुजरात के काठियावाड़ प्रायद्वीप में मादर नदी के समीप स्थित है।
- यहाँ पर पूर्वकालीन व उत्तरोतर हड़प्पा संस्कृति के अवशेष मिले हैं।
- इस स्थल से चावल की भूसी के प्रमाण मिले हैं।
सुरकोटदा :
- गुजरात राज्य के कच्छ क्षेत्र में यह स्थल स्थित है।
- इस स्थल की खोज वर्ष 1964 में जगपति जोशी ने की थी।
- यहाँ से घोड़े की हड्डी के अवशेष मिले हैं।
- कलश शवाधान के साक्ष्य यहाँ से मिले हैं।
- ऊपर से कब्र को पत्थर से ढकने के साक्ष्य यहाँ से मिले हैं।
धौलावीरा :

- गुजरात राज्य के कच्छ जिले के भचाऊ में धौलावीरा स्थित है।
- यह नगर हड़प्पा सभ्यता के सबसे बड़े नगरों में से है। यहाँ से सिंधु लिपि के 10 बड़े चिह्नों से बना शिलालेख समान नगर की बड़ी नामपट्टिका प्राप्त हुई है।
- धौलावीरा में जल संरक्षण से संबंधित उत्कृष्ट तकनीक का पता चलता है।
- यहाँ से सिंधु घाटी सभ्यता का एक मात्र स्टेडियम (खेल का मैदान) मिला है।
- अन्य हड़प्पाई स्थल के विपरीत धौलावीरा नगर तीन खंडों में विभाजित है।
सुत्कागेंडोर :
- पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रान्त में दाश्क नदी पर सुत्कागेंडोर स्थित है। यह सिंधु घाटी सभ्यता का सबसे पश्चिमी ज्ञात नगर है।
- यहाँ से बंदरगाह के अस्तित्व का पता चला है।
आलमगीरपुर :
- उत्तर प्रदेश राज्य के मेरठ जिले के हिंडन नदी के तट पर आलमगीरपुर स्थित है।
- यहाँ से एक भी मातृदेवी की मूर्ति और मुद्रा प्राप्त नहीं हुई है।
रोपड़ :
- यहाँ हड़प्पा पूर्व एवं हड़प्पाकालीन संस्कृतियों के अवशेष मिले हैं।
- शवों को अंडाकार गड्ड़ों में दफनाया जाता था।
- यहाँ से मानवीय कब्र के नीचे एक कुत्ते के शवादान मिले हैं।
कोटदीजी :
- यह स्थल हड़प्पा पूर्व और हड़प्पाकालीन दोनों समय अस्तित्व में था।
- यहाँ मकान कच्ची ईंटों से बने हैं परन्तु नीवों में पत्थर का प्रयोग हुआ है।
राखीगढ़ी :
- यह स्थल हरियाणा राज्य के जिंद जिले में स्थित है।
- इस स्थल की खोज प्रो. सूरजभान और आचार्य भगवानदेव ने की थी।
- भारत में हड़प्पा सभ्यता के विशालतम नगरों में राखीगढ़ी एक है।
सैन्धव सभ्यता का सामाजिक जीवन :-
- इस सभ्यता के लोग भोजन में गेहूं, जौ, खजूर एवं मांस खाते थे।
- सूती एवं ऊनी दोनों वस्त्रों का प्रयोग करते थे।
- मछली पकड़ना, शिकार करना, चौपड़, पासा खेलना आदि मनोरंजन के साधन थे।
- समाज की इकाई परम्परागत तौर पर परिवार थी।
- सिंधु घाटी सभ्यता के लोग साज-सज्जा पर भी ध्यान देते थे। खुदाई में स्त्री एवं पुरुष दोनों के आभूषण प्राप्त हुए है।
- इस सभ्यता के लोग शाकाहारी व मांसाहारी दोनों प्रकार का भोजन करते थे।
- सिंधु सभ्यता के लोग शांतिप्रिय थे। युद्ध का कोई साक्ष्य नहीं प्राप्त होता है, संभवत: उन्हें तलवार के बारे में पता नहीं था।
धार्मिक मान्यताएँ :-
- इस सभ्यता में कहीं से मंदिर के अवशेष नहीं मिले हैं।
- लिंग पूजा के पर्याप्त प्रमाण है जिन्हें बाद में शिव के साथ जोड़ा गया है। पत्थर की कई योनि आकृतियां भी प्राप्त हुर्ह हैं जिनकी पूजा जनन शक्ति के रूप में की जाती थी।
- इस सभ्यता के लोग पशुओं की भी पूजा करते थे।
- वृक्ष पूजा के रूप में पीपल के वृक्ष की पूजा की जाती थी।
- अग्निपूजा के प्रचलन के भी प्रमाण मिले हैं।
- हड़प्पा सभ्यता में शव विसर्जन के तीनों तरीके सम्पूर्ण शव को पृथ्वी में गाड़ना, पशु - पक्षियों के खाने के पश्चात् शव के बचे हुए भाग को गाड़ना तथा शव को दाहकर उसकी भस्म गाड़ना प्रचलित था।
राजनीतिक स्थिति :
- हड़प्पा सभ्यता व्यापार और वाणिज्य आधारित थी। इसलिए शासन व्यवस्था में भी व्यापारी वर्ग की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
- पिगट और व्हीलर आदि विद्वानों का मत है कि सुमेर और अक्कद की भांति मोहनजोदड़ो और हड़प्पा में भी पुरोहित लोग शासन करते थे। ये शासक प्रजा के हित का पूरा ध्यान रखते थे। सम्भवत: मोहनजोदड़ो और हड़प्पा उनके राज्य की दो राजधानियां थी।
- हंटर के अनुसार, 'मोहनजोदड़ो का शासन राजतंत्रात्मक न होकर जनतंत्रात्मक था।'
आर्थिक जीवन :
- पुरातात्विक साक्ष्य से यह अनुमान लगाया गया है कि सिन्धु सभ्यता के लोग हल या कुदाल से खेती नहीं करते थे। यह सम्भव है कि ये लोग पत्थर की कुल्हाड़ियों से या लकड़ी के हल से भूमि को खोदकर खेती करते हों। इन लोगों के औज़ार बहुत अपरिष्कृत थे किन्तु ये किसान अपनी आवश्यकता से अधिक अन्न उगाते थे। अतिरिक्त अन्न का उपयोग व्यापार और वाणिज्य में होता था।
- सिन्धु घाटी के लोग खेती के अतिरिक्त बहुत-से उद्योग जानते थे। ये लोग कपास उगाना और कातना भली प्रकार जानते थे। यह संभव है कि कपास और सूती कपड़े का निर्यात किया जाता था। ये अनेक प्रकार के मिट्टी के बर्तन बनाते और कपड़ों को रंगते थे।
- सिन्धु घाटी के लोग अपनी वस्तुएं मिस्र भी भेजते थे। यहाँ से कुछ मनके व हाथी दाँत का निर्यात किया जाता था। मैसोपोटामिया के एक ग्रंथ से ज्ञात होता है कि अक्कद साम्राज्य के समय में मेलुहा (सिन्धु घाटी सभ्यता) से आबनूस, तांबे, सोने, लालमणि और हाथीदांत का निर्यात होता था।
- ये लोग बाटों का भी प्रयोग जानते थे। कुछ बाट घन के आकार के और कुछ गोलनुकिले हैं। उनकी तोल में 1, 2, 4, 8, 16, 32, 64 का अनुपात है। सबसे अधिक 16 इकाई का बाट प्रयोग में आता था।
कृषि :
- हड़प्पा संस्कृति की मुख्य फसलें गेहूँ और जौ थी। इसके अलावा वे राई, मटर, तिल, चना, कपास, खजूर, तरबूज आदि पैदा करते थे।
- चावल के उत्पादन का प्रमाण लोथल और रंगपुर से प्राप्त हुआ है।
पशुपालन :
- हड़प्पा सभ्यता में पाले जाने वाले मुख्य पशु - बैल, भेड़, बकरी, भैंस, सुअर, हाथी, कुत्ते, गधे आदि।
- हड़प्पा निवासियों को कूबड़वाला सांड विशेष प्रिय था।
- ऊंट, गैंडा, मछली, कछुए का चित्रण हड़प्पा संस्कृति की मुद्राओं पर हुआ है।
- हड़प्पा संस्कृति में घोड़े के अस्तित्व पर विवाद है।
- कालीबंगा से ऊंट की हड्डियां मिली हैं।
शिल्प एवं उद्योग धन्धें :
- धातुकर्मी तांबे के साथ टिन मिलाकर कांसा तैयार करते थे।
- मोहनजोदड़ो से बने हुए सूती कपड़े का एक टुकड़ा तथा कालीबंगा में मिट्टी के बर्तन पर सूती कपड़े की छाप मिली है।
- इस सभ्यता के लोगों को लोहे की जानकारी नहीं थी।
- कांस्य मूर्ति का निर्माण द्रवी - मोम विधि से हुआ है।
- मोहनजोदड़ो एवं हड़प्पा से प्राप्त मृण्मूर्तियों में पुरुषों की तुलना में नारी मृण्मूर्तियाँ अधिक हैं।
- हड़प्पा संस्कृति में पशु - मूर्तियाँ मानव - मूर्तियों से अधिक संख्या में पाई गयी है।
- हड़प्पा में कूबड़ वाले बैलों की मूर्तियाँ सर्वाधिक संख्या में मिली है।
- मनका उद्योग का केन्द्र लोथल एवं चन्हूदड़ों थे।
कला :
- कला के क्षेत्र में सिन्धु घाटी के लोगों ने बहुत उन्नति की थी। वे बर्तनों पर सुन्दर चित्र बनाते थे। मनुष्यों और पशुओं के चित्र बड़ी संख्या में मिलते हैं। मुहरों पर जो पशुओं के चित्र बने हैं, उनसे इन लोगों की कलात्मक अभिरुचि प्रकट होती है। ये चित्र बैल, हाथी, चीता, बारहसिंगा, घड़ियाल, गैंडा आदि पशुओं के हैं।
- हड़प्पा में दो मनुष्यों की मूर्तियां मिली हैं जिनसे प्रकट होता है कि ये लोग मनुष्यों की मूर्तियां बनाने में भी बहुत कुशल थे। ध्यान मुद्रा में योगी की पत्थर की मूर्ति और कांसे की नर्तकी की मूर्ति सिन्धु घाटी की कला के सुन्दर नमूने है।
व्यापार :
- हड़प्पा वासी राजस्थान, सौराष्ट्र, महाराष्ट्र, दक्षिण भारत तथा बिहार से व्यापार करते थे।
- मेसोपोटामिया, सुमेर तथा बहरीन से उनके व्यापारिक संबंध थे।
- 2350 ई. पू. के मेसोपोटामियाई अभिलेखों में मेलूहा (सिन्ध क्षेत्र का ही प्राचीन भाग) के साथ व्यापार संबंध होने के उल्लेख मिलते हैं।
मापतौल :
- मोहनजोदड़ो से सीप का तथा लोथल से एक हाथी - दांत का पैमाना मिला है।
- तौल पद्धति की एक शृंखला 1, 2, 4, 8 से 64 इत्यादि तथा 16 या उसके आवर्तकों का व्यवहार होता था जैसे -16, 64, 160, 320 और 640।
मुहरें एवं लिपि :
- मोहनजोदड़ो से सर्वाधिक संख्या में मुहरें प्राप्त हुई है।
- प्राप्त मुहरों में सर्वाधिक सेलखड़ी की बनी हैं।
- मुहरों पर एक शृंगी पशु की सर्वाधिक आकृति मिली है। लोथल और देसलपुर से तांबे की मुहरें मिली हैं।
- हड़प्पा लिपि वर्णात्मक नहीं, बल्कि मुख्यतः भाव चित्रात्मक है।
- इस लिपि की लिखावट समान्यतया दायीं से बायीं ओर है।
- हड़प्पाई लिपि को पढ़ने में अभी तक सफलता नहीं मिली है।

ताम्रपाषाणकालीन संस्कृतियाँ
- इस काल में मनुष्य पत्थर एवं तांबे के उपकरण/औज़ार प्रयोग करने लगा था, इसी कारण इस काल को 'ताम्रपाषाण काल' कहते हैं।
- लगभग 5000 ई.पू. में मनुष्य ने सर्वप्रथम जिस धातु का प्रयोग किया, वह तांबा था। ताम्रपाषाण संस्कृतियाँ कृषि आधारित ग्रामीण संस्कृतियाँ थी।
1. बनास या आहड़ संस्कृति
- प्रमुख स्थल- आहड़, बालाथल तथा गिलूण्ड (राजस्थान)।
2. कायथा संस्कृति
- प्रमख स्थल-कायथा तथा एरण (मध्य प्रदेश)।
3. मालवा संस्कृति
- प्रमुख स्थल – कायथा, एरण तथा नवदाटोली
4. जोरवे संस्कृति
- प्रमुख स्थल- जोरवे, नेवासा, दैमाबाद तथा इनामगाँव (महाराष्ट्र)।


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