मौर्यकाल


मौर्य साम्राज्य


  •  मगध के विकास के साथ मौर्य साम्राज्य का उदय हुआ। मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य का शासन पश्चिम में अफगानिस्तान और बलूचिस्तान तक विस्तृत था।

मौर्यकालीन इतिहास के स्रोत :

  •  मौर्य इतिहास का उल्लेख करने वाले अन्य साहित्यिक स्रोत में चाणक्य का अर्थशात्र, क्षेमेन्द्र की 'वृहत‌्‌कथा मंजरी', कल्हण की राजतरंगिणी, विशाखदत्त का 'मुद्राराक्षस' तथा सोमदेव का 'कथासरित्सागर' आता है।
  •  धार्मिक साहित्यिक स्रोत में पुराणों से मौर्यकालीन इतिहास की जानकारी मिलती है।
  •  बौद्ध ग्रंथों में जातक, दीर्घनिकाय, दीपवंश, महावंश, वंशथपकासिनी तथा दिव्यावदान से मौर्यकाल के विषय में महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। जैन ग्रंथों में भद्रबाहु के कल्पसूत्र एवं हेमचन्द्र के परिशिष्टपर्वन से मौर्यकालीन जानकारी प्राप्त होती है।
  •  अशोक के वृहत् शिलालेख, लघु शिलालेख, स्तभंलेख, गुहा लेख आदि।
  •  रुद्रदामन का गिरनार अभिलेख भी मौर्यकाल के विषय में जानकारी प्रदान करता है।

मौर्यों की उत्पत्ति :

  •  ब्राह्मण परम्परा के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य की माता शूद्र जाति की मुरा नामक स्त्री थी। बौद्ध परम्परा के अनुसार मौर्य 'क्षत्रिय कुल' से संबंधित थे। महापरिनिब्बानसुत्त के अनुसार मौर्य पिपलिवन का शासक तथा क्षत्रिय वंश से संबंधित थे।

अर्थशास्त्र :-

  •  अर्थशास्त्र, कौटिल्य या चाणक्य (चौथी शताब्दी ईसा पूर्व) द्वारा रचित संस्कृत का एक ग्रन्थ है। इसमें राज्यव्यवस्था, कृषि, न्याय एवं राजनीति आदि के विभिन्न पहलुओं पर विचार किया गया है। अपने तरह का (राज्य-प्रबन्धन विषयक) यह प्राचीनतम ग्रन्थ है। इसकी शैली उपदेशात्मक और सलाहात्मक (instructional) है।
  •  यह प्राचीन भारतीय राजनीति का प्रसिद्ध ग्रंथ है। इसके रचनाकार का व्यक्तिनाम विष्णुगुप्त, गोत्रनाम कौटिल्य (कुटिल से व्युत्पत्र) और स्थानीय नाम चाणक्य (पिता का नाम चणक होने से) था।
  •  चाणक्य सम्राट् चंद्रगुप्त मौर्य (321-298 ई.पू.) के महामंत्री थे। उन्होंने चंद्रगुप्त के प्रशासकीय उपयोग के लिए इस ग्रंथ की रचना की थी। यह मुख्यत: सूत्रशैली में लिखा हुआ है और संस्कृत के सूत्रसाहित्य के काल और परंपरा में रखा जा सकता है। यह शास्त्र अनावश्यक विस्तार से रहित, समझने और ग्रहण करने में सरल एवं कौटिल्य द्वारा उन शब्दों में रचा गया है जिनका अर्थ सुनिश्चित हो चुका है।
  •  अर्थशास्त्र में समसामयिक राजनीति, अर्थनीति, विधि, समाजनीति, तथा धर्मादि पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। इस विषय के जितने ग्रंथ अभी तक उपलब्ध हैं उनमें से वास्तविक जीवन का चित्रण करने के कारण यह सबसे अधिक मूल्यवान् है। इस शास्त्र के प्रकाश में न केवल धर्म, अर्थ और काम का प्रणयन और पालन होता है अपितु अधर्म, अनर्थ तथा अवांछनीय का शमन भी होता है।
  •  इसकी खोज 1905 तंजौर के एक ब्राह्मण ”भट्ट स्वामी” हस्तलिखित पांडुलिपि के रूप में की थी, इन्होंने इसे 1906-1909 के दौरान इसका संस्कृत भाषा में प्रकाशन करवाया तथा मद्रास के पुस्तकालय अध्यक्ष प्रो.श्याम शास्त्री को यह पांडुलिपि भेंट की।      

सप्तांग सिद्धांत:- राज्य को सुव्यवस्थित रूप से संचालित करने हेतु राज्य के सात अंग बताए गए हैं।

इण्डिका:-

  •  मेगस्थनीज सेल्युकस निकेटर द्वारा चंद्रगुप्त मौर्य की राज्य सभा में भेजा गया।यह यूनानी राजदूत था। इसके पूर्व वह आरकोसिया के क्षत्रप के दरबार में सेल्युकस का राजदूत रह चुका था। संभवतः वह ईसा पूर्व 304 से 299 के बीच किसी समय पाटलिपुत्र की सभा में उपस्थित हुआ था।
  •  मेगस्थनीज ने बहुत समय तक मौर्य दरबार में निवास किया। भारत में रहकर उसने जो कुछ भी देखा सुना उसे उसने इंडिका (Indica) नामक अपनी पुस्तक में लिपिबद्ध किया। दुर्भाग्यवश यह ग्रंथ अपने मूल रूप में आज प्राप्त नहीं है, तथापि उसके अंश उद्धरण रूप में बाद के अनेक यूनानी-रोमीय (Greco-Roman) लेखकों – एरियन, स्ट्रेबो, प्लिनी की रचनाओं में मिलते हैं।
  •  मेगस्थनीज के अनुसार सबसे बड़ा नगर ‘पाटलिपुत्र’ था जिसे उसने ‘पोलीब्रोथा’ कहा है। इण्डिका में मौर्य कालीन प्रशासन को छह समितियों द्वारा चलाने का विवरण है जिसमें प्रत्येक समिति में 5 सदस्य होते थे।
  •  मेगस्थनीज इण्डिका में “उत्तरापथ” का वर्णन करता है। उसके अनुसार मौर्य काल की सबसे लम्बी सड़क का निर्माण चन्द्रगुप्त मौर्य द्वारा करवाया गया था।
  •  मेगस्थनीज के अनुसार भारतीय लोग हेराक्लीन (कृष्ण) व डायनोसियस(शिव) की पूजा करते हैं।
  •  मेगस्थनीज की भ्रामक बातें:-
    (महास्थान व सहोगरा से प्राप्त ताम्रपत्राभिलेख से अकाल की जानकारी मिलती है।
    1. भारत में अकाल नहीं पड़ते हैं।

    2. भारतीय लोगों को लिखने का ज्ञान नहीं।
    3. भारत में दास प्रथा नहीं है। (भारत में यूनान के समान दास प्रथा नहीं थी)
    4. बौद्ध धर्म का उल्लेख नहीं मिलता है।
  •  मेगस्थनीज के अनुसार भारतीय समाज 7 जातियों में विभाजित था।
    I. दार्शनिक
    II. कृषक       
    III. शिकारी/पशुपालक
    IV. व्यापारी/शिल्पी
    V. यौद्धा
    VI. निरीक्षक (इंस्पेक्टर)
    VII. मंत्री

म्रुदाराक्षस:-

  •  मुद्राराक्षस संस्कृत का ऐतिहासिक नायिका विहीन नाटक है जिसके रचयिता विशाखदत्त हैं। इसकी रचना चौथी शताब्दी में हुई थी।
  •  इसमें चाणक्य और चन्द्रगुप्त मौर्य संबंधी ख्यात वृत्त के आधार पर चाणक्य की राजनीतिक सफलताओं का अपूर्व विश्लेषण मिलता है।
  •  इस कृति की रचना पूर्ववर्ती संस्कृत-नाट्य परंपरा से सर्वथा भिन्न रूप में हुई है- लेखक ने भावुकता, कल्पना आदि के स्थान पर जीवन-संघर्ष के यथार्थ अंकन पर बल दिया है। यह भारत का प्रथम जासूसी ग्रंथ माना जाता है
  •  इस महत्त्वपूर्ण नाटक को हिंदी में सर्वप्रथम अनूदित करने का श्रेय भारतेंदु हरिश्चंद्र को है।
  •  मुद्रा राक्षस से मौर्यवंश, गुप्तकाल व नंद वंश की जानकारी मिलती है।

राजतंरगीणी:-

  •  राजतरंगिणीकल्हण द्वारा रचित एक संस्कृत ग्रन्थ है। 'राजतरंगिणी' का शाब्दिक अर्थ है - राजाओं की नदी, जिसका भावार्थ है - 'राजाओं का इतिहास या समय-प्रवाह'। यह कविता के रूप में है।
  •  इसमें कश्मीर का इतिहास वर्णित है जो महाभारत काल से आरम्भ होता है। इसका रचना काल 1147 ई. से 1149 ई. तक बताया जाता है । इस पुस्तक के अनुसार कश्मीर का नाम "कश्यपमेरु" था जो ब्रह्मा के पुत्र ऋषि मरीचि के पुत्र थे।
  •  राजतरंगिणी में अशोक द्वारा झेलम नदी के किनारे “श्रीनगर” नामक नवीन नगर बसाने का उल्लेख मिलता है।
  •  इसमें कश्मीर का प्रथम मौर्य शासक जालौक को बताया गया है।

मौर्य साम्राज्य की स्थापना:-
चद्रगुप्त मौर्य : (322 ई.पू.-298 ई.पू.)

  •  चन्द्रगुप्त 25 वर्ष की आयु में चाणक्य की सहायता से अंतिम नन्द शासक घनानंद को पराजित कर पाटलिपुत्र के सिंहासन पर बैठा।
  •  विलियम जोन्स पहले विद्वान थे, जिन्होंने 'सेंड्रोकोट्स' की पहचान भारतीय ग्रंथों में वर्णित चन्द्रगुप्त से की।
  •  304-5 ई.पू. या उसके आसपास बैक्ट्रिया के शासक सेल्युकस तथा चन्द्रगुप्त के बीच उत्तर - पश्चिमी भारत पर आधिपत्य के लिए एक भीषण युद्ध हुआ जिसमें सेल्युकस की हार हुई। युद्ध का निर्णय मौर्यों के पक्ष में रहा और इसकी समाप्ति के बाद दोनों के मध्य एक संधि हुई।
  •  संधि की शर्तों का उल्लेख स्ट्रेबो ने किया है। सेल्युकस ने चन्द्रगुप्त को चार प्रान्त एरिया (हेरात), अराकोसिया (कंधार), जेड्रोसिया (मकरान) तथा पेरिपेनिसदई (काबुल) दिए।
  •  सेल्युकस और चन्द्रगुप्त के बीच वैवाहिक संबंध स्थापित हुआ।
  •  चन्द्रगुप्त ने सेल्युकस को 500 हाथी उपहार में दिए।
  •  सेल्युकस ने चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में अपना एक राजदूत मेगस्थनीज भेजा।
  •  चन्द्रगुप्त ने अपने साम्राज्य पर राजधानी पाटलिपुत्र से शासन किया, जिसे यूनानी और लैटिन लेखकों ने पालिबोथ्रा, पालिबोत्रा एवं पालिमबोथ्रा नामों से उल्लिखित किया है।
  •  जैन परम्परा के अनुसार अपने जीवन के अंतिम दिनों में चन्द्रगुप्त ने जैन धर्म स्वीकार कर लिया और अपने पुत्र बिन्दुसार के पक्ष में सिंहासन छोड़ दिया। जैन संत भद्रबाहु के साथ वह मैसूर के निकट श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) चला गया जहाँ एक सच्चे जैन मुनि की तरह उपवास के द्वारा शरीर त्याग दिया।
  •  चन्द्रगुप्त मौर्य के जीवन के अंतिम समय में मगध में 12 वर्षों तक भीषण अकाल पड़ा।       

बिन्दुसार :(298 ई.पू.-273 ई.पू.)

  •  चन्द्रगुप्त मौर्य की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र बिन्दुसार उसका उत्तराधिकारी हुआ।
  •  बिन्दुसार ने अपने बड़े पुत्र सुसीम को तक्षशिला का तथा अशोक को उज्जयिनी का राज्यपाल नियुक्त किया था।
  •  दिव्यावदान के अनुसार उत्तरापथ की राजधानी तक्षशिला (पाकिस्तान) में विद्रोह हुआ, जिसे शांत करने के लिए बिन्दुसार ने अपने पुत्र अशोक को भेजा था।
  •  यूनानी शासक एण्टियोकस ने बिन्दुसार के दरबार में डाइमेकस नामक राजदूत भेजा था।
  •  मिस्र के राजा टालेमी द्वितीय फिलाडेल्कस ने डाइनोसियस को बिन्दुसार के दरबार में भेजा था।
  •  बिन्दुसार आजीवक सम्प्रदाय का अनुयायी था।

अशोक (273 ई.पू.-232 ई.पू.):

  •  अशोक के प्रारम्भिक जीवन के बारे में अभिलेखों से कोई जानकारी नहीं मिलती है। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार उसकी माता का नाम सुभद्रांगी था। जैन ग्रंथों के अनुसार अशोक ने बिन्दुसार की इच्छा के विरुद्ध मगध के शासन पर  अधिकार किया था, पुराणों में अशोक को ‘अशोकवर्धन’ तथा दीपवंश में ‘करमोली’ कहा गया है।
  •  कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ के अनुसार अशोक का राज्य कश्मीर तक फैला था।
  •  अशोक की धम्म नीति:- अशोक ने प्रजा के नैतिक उत्थान हेतु राजत्व के नये नियमों की संहिता बनायी थी जिसे इसके अभिलेखों में ‘धम्म’ कहा गया है। अशोक पाँचवें अभिलेख में पता चलाता है कि उसने धम्म के प्रचार हेतु रज्जुकों, प्रादेशिकों, युक्तों एवं धम्म महामात्रकों की नियुक्ति की थी।

धम्म प्रचारक

नाम

क्षेत्र

महेन्द्र तथा संघमित्र

श्रीलंका

मजफान्तिक

कश्मीर एवं गंधार

मज्झिम

हिमालय

महाधर्मरक्षित

महाराष्ट्र

रक्षित

वनवासी

सोन तथा उत्तरा

सुवर्ण भूमि

 अशोक के अभिलेख:-

  •  अभिलेख उन्हें कहते हैं जो पत्थर, धातु या मिट्टी के बर्तन जैसी कठोर सतह पर खुदे होते हैं। अभिलेखों में उन लोगों की उपलब्धियाँ, क्रियाकलाप या विचार लिखे जाते हैं जो उन्हें बनवाते हैं। इनमें राजाओं के क्रियाकलापों तथा महिलाओं और पुरुषों द्वारा धार्मिक संस्थाओं को दिए गए दान का ब्योरा होता है। 
  •  अशोक ने भारतीय उपमहाद्वीप में सर्वप्रथम शिलालेखों का प्रचलन किया था। शिलालेखों के माध्यम से राज्यादेश तथा उपलब्धियों को संकलित किया गया था जिनमें वह जनता को संबोधित करता है।
  •  सर्वप्रथम 1750 ई. में टीफेन्थैलर महोदय ने दिल्ली में अशोक के स्तम्भ का पता लगाया था।
  •  सर्वप्रथम जेम्स प्रिंसेप को 1837 ई. में अशोक के अभिलेखों को पढ़ने में सफलता प्राप्त हुई।
  •  अशोक के अभिलेख आरमाइक, खरोष्ठी एवं ब्राह्मी तीनों लिपियों में पाए गए हैं। लघमान लेख आरमाइक लिपि में हैं। मानसेहरा एवं शाहबाजगढ़ी से खरोष्ठी लिपि के शिलालेख प्राप्त हुए हैं।
  •  अशोक के अभिलेख को तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है- शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख।
  •  शिलालेखों की संख्या 14 है, जो आठ भिन्न - भिन्न स्थानों से प्राप्त किए गए हैं।

अशोक के शिलालेखों की विषय-वस्तु:-

  • प्रथम शिलालेख की राजकीय पाकशाला में दो मयूरों एवं एक हिरण के अतिरिक्त सभी पशुओं की हत्या तथा सामाजिक उत्सवों पर प्रतिबंध की बात कही गयी है।
  • द्वितीय शिलालेख में समाज कल्याण से संबंधित कुछ कार्य जैसे मनुष्यों एवं पशुओं के लिए चिकित्सा, मार्ग निर्माण, कुआँ खुदवाना तथा वृक्षारोपण का उल्लेख है। चोल, चेर, पांड्य, सतियपुत्त तथा ताम्रपर्णि राष्ट्रों का उल्लेख भी इस शिलालेख में है।
  • तृतीय शिलालेख इसमें राजकीय अधिकारियों रज्जुक, प्रादेशिक और युक्त को हर प्रति पाँचवें वर्ष में राज्य का दौरा करने के आदेश दिए गए हैं।
  • चतुर्थ शिलालेख धर्माचरण के नैतिक नियम भेरीनाद द्वारा ‘धम्म’ की उद्‌घोषणा।
  • पंचम शिलालेख में धम्म के प्रचार - प्रसार के लिए धम्म महामात्रों की नियुक्ति का वर्णन है। इसमें मौर्यकालीन समाज व वर्ण व्यवस्था का भी उल्लेख है।
  • सप्तम शि ला लेख में सभी सम्प्रदायों के लिए सहिष्णुता की बात की गई है।
  • अष्टम् शि लालेख में अशोक की धर्मयात्राओं जिनमें उसके बोधगया भ्रमण का उल्लेख है।
  • ग्यारवें शिलालेख में अशोक की धम्म नीति का विस्तृत विवरण दिया गया है।
  • बारहवें शिलालेख में पुनः सम्प्रदायों के बीच सहिष्णुता बनाने का निवेदन किया गया है। इस शिलालेख में “धम्म” की नीति के बारे में बताया गया है और हर व्यक्ति को अपने से बड़ों के प्रति सम्मान व्यक्त करने हेतु जोर दिया गया है| साथ ही जानवरों की हत्या से परहेज़ करने एवं दोस्तों के प्रति उदारता व्यक्त करने के लिए कहा गया है।
  • तेरहवें शिलालेख में अशोक ने कलिंग युद्ध का वर्णन किया साथ ही पड़ोसी राज्यों के बारे में भी विवरण है। इसमें अपराध करने वाली सीमावर्ती आटविक जातियों को चेतावनी दी है। इस शिलालेख का सर्वोपरि महत्त्व यह है कि यह “अशोक के धम्म की नीति” को समझने में मदद करता है। इस शिलालेख में वर्णन किया गया है कि विजय का मार्ग “युद्ध के बजाय धम्म” है। यह शिलालेख पूरी तरह से “प्रथम शिलालेख” से शुरू हुई प्रक्रियाओं की तार्किक परिणति है।

अशोक के प्रमुख शिलालेख

शिलालेख

     स्था  न

लि पि

शाहबाजगढ़ी

पेशावर (पाक)

खरोष्ठी

मानसेहरा

मानसेहरा (हजारा जि.)

खरोष्ठी

कलसी

देहरादून (उत्तराखण्ल)

ब्राह्मी

गिरनार

जूनागढ़ (गुजरात)

ब्राह्मी

एर्रगुडी

कुर्नूल (आंध्र प्रदेश)

ब्राह्मी

धौली

पुरी (उड़ीसा)

ब्राह्मी

जौगढ़

गंजाम (आंध्र प्रदेश)

ब्राह्मी

सोपारा

थाणे (महाराष्ट्र)

ब्राह्मी

  •  अशोक की रानियों में महादेवी, तिष्यरक्षिता तथा करुवाकी का नाम आता है।
  •  सिंहली परम्परा के अनुसार अशोक के पुत्र महेन्द्र एवं पुत्री संघमित्र विदिशा के श्रेष्ठी पुत्री महादेवी से उत्पन्न हुए थे।
  •  अशोक के अभिलेख में उसकी एकमात्र पत्नी करुवाकी का उल्लेख मिलता है, जो तीवर की माता थी।
  •  सिंहली अनुश्रुति के अनुसार अशोक ने अपने 99 भाइयों की हत्या कर गद्दी प्राप्त की थी।
  •  अशोक का वास्तविक राज्याभिषेक 269 ई.पू. में हुआ, हालांकि उसने 273 ई.पू. में सत्ता पर कब्जा कर लिया था।
  •  कल्हण के अनुसार अशोक ने कश्मीर में 'श्रीनगर' नामक नगर की स्थापना की।
  •  अशोक के शासनकाल की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना 261 ई.पू. में कलिंग युद्ध था। कलिंग युद्ध के भीषण नरसंहार को देखकर अशोक इतना द्रवित हुआ कि उसने भविष्य में कभी युद्ध न करने का संकल्प लिया और दिग्विजय के स्थान पर 'धम्म विजय' की नीति को अपनाया। कलिंग युद्ध तथा उसके परिणामों के विषय में अशोक के तेरहवें अभिलेख से विस्तृत सूचना प्राप्त होती है।

  अशोक के लघु शिलालेख

लघु शिला लेख

स्था न

मास्की

रायचूर (आंध्रप्रदेश)

गुर्जरा

दतिया (मध्यप्रदेश)

ब्रह्मगिरी

ब्रह्मगिरी (कर्नाटक)

भाब्रू

जयपुर (राजस्थान)

अहरौरा

मिर्जापुर (उत्तरप्रदेश)

जटिंग रामेश्वर ब्रह्म

गिरि से 3 मी. दूर (कर्नाटक)

सासाराम

सासाराम (बिहार)

रूपनाथ

जबलपुर (मध्यप्रदेश)

पालकि गुण्डु

गोविन्दमठ से 4 मी. दूर

राजुल मंडिगिरि

कुर्नूल (आंध्रप्रदेश)

गोविमठ

गोविमठ (मैसूर कर्नाटक)

सिद्धपुर

ब्रह्मगिरि (कर्नाटक)

एर्रगुडी

कर्नूल (आंध्र प्रदेश)

अशोक के विभिन्न नाम एवं उपाधि

अशोक

व्यक्तिगत नाम, उल्लेख - मास्की, गुर्जरा, नेतुर एवं उडेगोलम अभिलेख में

देवानामपियं प्रियदर्शी

राजकीय उपाधि अधिकारिक नाम

अशोकवर्द्धन

पुराण में उल्लेख

  स्तम्भ लेख:-

 

  •  स्तम्भ लेख की संख्या 7 है जो 6 अलग-अलग स्थानों से मिले हैं।
  •  अशोक के 7 स्तंभलेख टोपरा (दिल्ली), मेरठ, इलाहाबाद, रामपूरवा, लौरिया अरराज (चंपारण), लौरिया नन्दगढ़ (चंपारण) में पाया गया है। लघु स्तंभलेख सांची, सारनाथ, रूम्मिनदेई, कौशाम्बी और निगाली सागर में पाया गया है।
  •  स्तंभलेख I: इस स्तंभलेख में लोगों की सुरक्षा के संबंध में अशोक के सिद्धांतों का वर्णन है।
  •  स्तंभलेख II: इस स्तंभलेख में “धम्म” को पापों की कम करनेवाला, सदाचार को बढ़ाने वाला एवं करूणा, उदारता, सच्चाई और पवित्रता को बढ़ानेवाला के रूप में परिभाषित किया गया है।
  •  स्तंभलेख III: इस स्तंभलेख में कठोरता, क्रूरता, क्रोध, अभिमान जैसे पापों को समाप्त करने पर बल दिया गया है।
  •  स्तंभलेख IV:  इस स्तंभलेख में “राजुक” के कार्यों का वर्णन किया गया है।
  •  स्तंभलेख V: इस स्तंभलेख में ऐसे जानवरों और पक्षियों की सूची है जिन्हें कुछ दिनों तक नहीं मारा जाना चाहिए। साथ ही ऐसे जानवरों की भी सूची दी गई है जिन्हें कभी भी नहीं मारना चाहिए। इस स्तंभलेख में अशोक द्वारा 25 कैदियों की रिहाई का भी वर्णन किया गया है।
  •  स्तंभलेख VI: इस स्तंभलेख में “धम्म” के सिद्धांतो का वर्णन किया गया है।
  •  स्तंभलेख VII: इस स्तंभलेख में अशोक द्वारा धम्म के सिद्धांतों से संबंधित किए गए कार्यों का वर्णन किया गया है। इस स्तंभलेख में कहा गया है कि सभी सम्प्रदायों की इच्छा “आत्म नियंत्रण” और “मन की पवित्रता” दोनों है।

अन्य स्तंभलेख

  •  रूम्मिनदेई स्तंभलेख: इस स्तंभलेख में अशोक की लुम्बिनी यात्रा और लुम्बिनी के लोगों को कर में दी गई छूट का वर्णन है।
  •  निगालीसागर स्तंभलेख: यह स्तंभलेख मूलतः “कपिलवस्तु” में स्थित था। इस स्तंभलेख में कहा गया है कि अशोक ने “कोनकमान बुद्ध” के स्तूप की ऊँचाई को बढ़ाकर दुगुना कर दिया था|
  •  अकबर ने कौशांबी में स्थित प्रयाग स्तम्भ लेख को इलाहाबाद के किले में स्थापित कराया।
  •  दिल्ली - टोपरा तथा दिल्ली - मेरठ स्तम्भ लेख फिरोजशाह तुगलक द्वारा दिल्ली लाया गया।

लघु स्तम्भ लेख :

  •  लघु स्तम्भ लेख पर अशोक की राजकीय घोषणाओं का उल्लेख है। सांची (रायसेन, मधयप्रदेश), कौशाम्बी (इलाहाबाद, उत्तरप्रदेश), सारनाथ (वाराणसी, उत्तरप्रदेश), रूम्मिनदेई (नेपाल), निग्लीवा (निगाली सागर, नेपाल) तथा इलाहाबाद से लघु स्तम्भ लेख मिले हैं।
  •  इलाहाबाद स्तम्भ लेख को ’रानी का लेख‘ भी कहा जाता है।

अशोक और बौद्ध धर्म :

  •  प्रारम्भ में अशोक ब्राह्मण धर्म में विश्वास करता था। अशोक के इष्टदेव शिव थे।
  •  अभिलेखों के अनुसार अशोक के बौद्ध धर्म में दीक्षित करने का श्रेय उपगुप्त को जाता है।
  •  भाब्रू शिलालेख में अशोक ने बौद्ध, संघ और धर्म में विश्वास व्यक्त किया है।
  •  अशोक का ‘धम्म’ बौद्ध धर्म नहीं था। तीसरे एवं सातवें स्तम्भ लेख में अशोक ने युक्त, रज्जुक तथा प्रादेशिक नामक पदाधिकारी को जनता के बीच धर्म एवं प्रचार का उपदेश करने का आदेश दिया।
  •  अनुश्रुतियों के अनुसार अशोक ने 84000 स्तूपों का निर्माण करवाया था। शासनकाल के 14 वर्ष बाद 'कनकमुनि' बौद्ध स्तूप को दुगुना करवाया था।
  •  बराबर पहाड़ी पर अशोक ने आजीवकों के लिए कर्ण, चोपार, सुदामा व विश्व झोपड़ी गुफा का निर्माण करवाया था।
  •  पुराणों के अनुसार अशोक ने कुल 37 वर्षों तक शासन किया तथा उसके बाद कुणाल गद्दी पर बैठा। दिव्यावदान में उसे 'धर्मविवर्धान' कहा गया है।
  •  बृहद्रथ मौर्य वंश का अंतिम शासक था

मौर्य प्रशासन :

  •  मौर्य प्रशासन तंत्र की झलक हमें प्रमुखतया मेगस्थनीज के इंडिका, कौटिल्य के अर्थशात्र और अशोक के अभिलेखों से मिलती है।
  •  इस काल में राजतंत्र का विकास हुआ तथा गणतंत्र का ह्रास हुआ।
  •  मौर्य प्रशासन केन्द्रीकृत प्रकृति का था यह लोक-कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पर आधारित था।
  •  कौटिल्य का अर्थशास्त्र मौर्यकालीन प्रशासनिक व्यवस्था को समझने का सबसे सरल स्त्रोत है। इसके अनुसार उच्चाधिकारी को ‘तीर्थ’ कहा जाता था जो वर्तमान में केन्द्रीय मंत्रियों के समकक्ष होते थे।

अधिकारी (तीर्थ)

संबंधित विभाग

समाहर्ता

राजस्व विभाग का प्रधानमंत्री

सेनापति

युद्ध विभाग का मंत्री

पुरोहित

प्रमुख धर्माधिकारी तथा प्रधानमंत्री

युवराज

राजा का उत्तराधिकारी

सन्निधता

राजकीय कोषाध्यक्ष

दौवारिक

राजमहलों की देख-रेख करने वाला प्रधान

नागरक

नगर का प्रमुख अधिकारी या नगर कोतवाल

दुर्गपाल

राजकीय दुर्ग रक्षकों का अध्यक्ष

अंतपाल

सीमावर्ती दुर्गों का रक्षक

आंतर्वेशिक

सम्राट की अंगरक्षक सेना का प्रधान अधिकारी

मंत्रिपरिषदाध्यक्ष

मंत्री परिषद् का अध्यक्ष

आटविक

वन विभाग का प्रधान अधिकारी

दंडपाल

सेना की सामग्री जुटाने वाला प्रमुख अधिकारी

व्यावहारिक

दीवानी न्यायालय का प्रमुख न्यायाधीश

नायक

सेना का संचालक अथना नगर रक्षा का अध्यक्ष

प्रदेष्टा

फौजदारी न्यायालय का न्यायाधीश(कमिश्नर)

कर्मांतिक

उद्योगों एवं कारखानों का प्रधान निरीक्षक

अशोक कालीन प्रान्त

प्रान्त

राजधानी

उत्तरापथ

तक्षशिला

अवन्ति राष्ट्र

उज्जयिनी

कलिंग प्रान्त

तोसली

दक्षिणापथ

सुवर्णगिरी

प्राशी या प्राची

पाटलिपुत्र

  •  अर्थशात्र में शीर्षस्थ अधिकारी के रूप में 18 'तीर्थों' का उल्लेख है।
  •  मौर्य साम्राज्य के अंतर्गत गुप्तचर 'महातात्यापसर्प' के अधीन काम करता था।
  •  गूढ़पुरुष अर्थशात्र में वर्णित गुप्तचर थे।
  •  पाटलिपुत्र में स्थित केन्द्रीय न्यायालय सर्वोच्च न्यायालय था। सम्राट सर्वोच्च न्यायाधीश होता था।
  •  मेगस्थनीज के अनुसार नगर प्रशासन 30 सदस्यों के एक मंडल द्वारा किया जाता था। यह मंडल 6 समितियों में विभाजित था तथा प्रत्येक समिति में 5 सदस्य होते थे।

सामाजिक स्थिति :

  •  कौटिल्य ने चतुवर्णीय सामाजिक व्यवस्था को सामाजिक संरचना का आधार माना है।
  •  कौटिल्य ने शूद्रों को आर्य कहा है और इन्हें मलेच्छों से भिन्न बतलाया है।
  •  मेगस्थनीज ने भारतीय समाज को सात वर्गों में विभाजित किया है-
  •  स्त्रियों को पुनर्विवाह तथा नियोग की अनुमति थी। स्त्रियां प्रायः घर के अंदर रहती थीं। ऐसी स्त्रियों को कौटिल्य ने अनिष्कासिनी कहा है।
  •  मेगस्थनीज ने उल्लेख किया है कि भारत में कोई दास नहीं है।

आर्थिक व्यवस्था :

  •  कृषि मौर्यकाल का प्रमुख व्यवसाय था।
  •  कृषि, पशुपालन एवं व्यापार को अर्थशात्र में सम्मिलित रूप से 'वार्ता' कहा गया है।
  •  सीता भूमि सरकारी भूमि होती थी।
  •  भूमि पर कर उपज का 1/4 भाग से 1/6 भाग तक होता थी।
  •  राज्य की ओर से सिंचाई का पूर्ण प्रबंध था जिसे सेतुबंध कहा गया है।
  •  सोहगौरा और महास्थन अभिलेख में दुर्भिक्ष के समय राज्य द्वारा अनाज वितरण का उल्लेख है।
  •  कौटिल्य ने अर्थशात्र में कर्षापण, पण या धारण (चाँदी निर्मित सिक्के), माषक तथा काकिणी (ताँबे से निर्मित सिक्कों) का उल्लेख किया है।

मौर्य साम्राज्य के पतन के कारण :

  •  दुर्बल व अयोग्य उत्तराधिकारी,
  •  साम्राज्य विभाजन,
  •  केन्द्रीकृत व्यवस्था,
  •  आर्थिक संकट व सांस्कृतिक समस्याएँ
  •  अशोक की धार्मिक नीति,
  •  अशोक की अतिशांतिवादिता नीति,
  •  नौकरशाही का अधिकाधिक अनुत्तरदायी होना,
  •  वित्तीय करो की अधिकता
  •  भौतिक संस्कृति पर प्रसार
  •  प्रांतीय शासकों की महत्त्वकांक्षाएँ