राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियाँ (प्रावधान एवं उनके प्रभाव)
बिन्दु | राष्ट्रीय आपातकाल | राष्ट्रपति शासन | वित्तीय आपातकाल |
अनुच्छेद | अनुच्छेद-352 | अनुच्छेद-356 | अनुच्छेद-360 |
क्षेत्र | देश का सम्पूर्ण या कुछ भाग | संबंधित राज्य या कई राज्यों में एक साथ | देश का सम्पूर्ण या कुछ भाग |
आवश्यक परिस्थितियाँ | युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह (44वें संशोधन से) की परिस्थिति उत्पन्न होने पर या उत्पन्न होने की आशंका होने पर | जब राष्ट्रपति को यह आभास हो जाए कि किसी राज्य की शासन व्यवस्था संविधान के अनुसार नहीं चलाई जा सकती अर्थात् राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल हो जाने पर। अनुच्छेद-365 के अंतर्गत राज्यों द्वारा संघ के निर्देश का पालन न करने की स्थिति में। | जब राष्ट्रपति को यह आभास हो जाए कि भारत या उसके किसी भाग के वित्तीय स्थायित्व या साख को खतरा पैदा हो गया है। |
घोषणा का प्रभाव | 1. इसकी घोषणा के लागू रहने के समय में अनुच्छेद-19 द्वारा प्रदत्त स्वतंत्रताएँ स्थगित हो जाएंगी, किंतु 44वें संविधान संशोधन के बाद सशस्त्र विद्रोह की स्थिति में इनके स्थगित न होने का प्रावधान रखा गया है। | 1. राष्ट्रपति यह घोषित कर सकता है कि किसी राज्य की विधायिका शक्ति का प्रयोग केन्द्रीय संसद करेगी। संसद ऐसे व्यवस्थापन की शक्ति राष्ट्रपति को प्रदान कर सकती है या उसको यह अधिकार दे सकती है कि वह यह शक्ति किसी और अधिकारी को प्रदान कर दे। | 1. आपात की अवधि में राष्ट्रपति को अधिकार होगा कि वह आर्थिक दृष्टिकोण से किसी राज्य सरकार को आदेश दे सकता है। |
2. प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के अतिरिक्त अन्य अधिकारों की रक्षा के लिए नागरिक न्यायालय की शरण नहीं ले सकेंगे। | 2. राष्ट्रपति किसी भी राज्याधिकारी को कार्यकारिणी शक्तियों को हस्तगत कर सकता है। | 2. संघ तथा राज्य सरकारों के अधिकारियों के वेतनों में, जिनमें उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश भी शामिल होंगे, आवश्यक कमी की जा सकती है। | |
3. संसद को राज्यसूची के किसी भी विषय पर कानून बनाने का अधिकार प्राप्त हो जाता है। (अनु.-250) | 3. राष्ट्रपति उदघोषणा के उद्देश्य की पूर्ति के लिए उच्च न्यायालय की शक्ति को छोड़कर अन्य समस्त शक्तियाँ अपने हाथ में ले सकता है। | 3. राष्ट्रपति राज्य सरकारों को इस बात के लिए बाध्य कर सकता है कि राज्य के समस्त वित्त-विधेयक उसकी स्वीकृति के लिए प्रस्तुत किए जाएं। | |
4. संघ की कार्यपालिका को यह शक्ति मिल जाती है कि वह राज्यों की कार्यपालिका को निर्देश दे सके कि वे अपनी कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग किस प्रकार करें। | 4. जब लोकसभा की बैठकें नहीं हो रही हों, उस समय राष्ट्रपति राज्य की संचित निधि से व्यय के लिए आदेश दे सकता है। | 4. संघ की कार्यकारिणी राज्य की कार्यकारिणी को शासन संबंधी आवश्यक आदेश दे सकती है। | |
5. राष्ट्रपति आदेश द्वारा यह निर्देश दे सकता है कि संघ और राज्यों के बीच आय-वितरण संबंधी सभी या कोई भी उपबंध चालू वित्तीय वर्ष में उसके निर्देशानुसार संशोधित रहेंगे, परन्तु ऐसा आदेश यथाशीघ्र संसद के दोनों सदनों के सामने रखा जाएगा। |
| 5. राष्ट्रपति केन्द्र और राज्यों में धन संबंधी बँटवारे के प्रावधानों में आवश्यक संशोधन कर सकता है। | |
6. अनुच्छेद-353 में संशोधन के बाद नया परन्तु जोड़कर संसद को यह अधिकार दिया गया कि वह किसी ऐसे राज्य पर भी आपात संबंधी कानून लागू कर सके जो उस राज्य से भिन्न हैं जिसमें आपात उदघोषणा प्रवर्तन में है, यदि उस भाग की गतिविधियों से भारत के किसी भाग की सुरक्षा संकट में है। |
| ||
7. आपात की उदघोषणा जब प्रवर्तन में है तब संसद विधि द्वारा लोकसभा की अवधि को एक वर्ष के लिए बढ़ा सकती है। यह अवधि एक बार में एक वर्ष से अधिक नहीं बढ़ाई जा सकती है और आपात उदघोषणा के समाप्त हो जाने के 6 माह बाद स्वत: समाप्त हो जाएगी। |
| ||
घोषणा का तरीका | राष्ट्रपति को मंत्रिमण्डल का विनिश्चय लिखित रूप में प्राप्त हो। | राष्ट्रपति को राज्यपाल के प्रतिवेदन पर या अन्य किसी प्रकार से समाधान हो जाने पर लागू किया जा सकता है। | राष्ट्रपति कार्यपालिका के सामान्य परामर्श पर ही आदेश जारी कर सकता है। |
लागू रखने का प्रावधान | 1. ऐसी प्रत्येक उदघोषणा संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष एक माह के भीतर रखना आवश्यक है। यह संकल्प दोनों सदनों की पृथक-पृथक बैठकों में सदन के बहुमत और उपस्थित तथा मत देने वाले सदस्यों के 2/3 बहुमत से पारित होना चाहिए। | 1. ऐसी उदघोषणा संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष दो माह के भीतर रखना आवश्यक है। यह संकल्प दोनों सदनों की पृथक-पृथक बैठकों में सदन के बहुमत और उपस्थित मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों के साधारण बहुमत से पारित हो। | 1. राष्ट्रपति शासन के समान |
2. यदि आपात उदघोषणा के समय लोकसभा विघटित हो तो राज्यसभा में यह संकल्प पारित करवाना होगा और नई लोकसभा के पुनर्गठन के 30 दिन की अवधि में यह संकल्प पारित करवाना आवश्यक है। | 2. राष्ट्रीय आपातकाल के समान | राष्ट्रीय आपातकाल के समान | |
3. दोनों सदनों में गतिरोध होने पर संयुक्त बैठक का कोई प्रावधान नहीं है। | 3.राष्ट्रीय आपातकाल के समान | 3. राष्ट्रीय आपातकाल के समान | |
| 4. जारी रखने हेतु संसद का सामान्य बहुमत | 4. राष्ट्रीय आपातकाल के समान | |
| 5. जारी रखने हेतु संसद द्वारा विशेष बहुमत से 6 माह पश्चातपुन: स्वीकृति प्रदान की जाए। |
| |
आपात की अवधि | 6 माह, किन्तु संसद द्वारा प्रति 6 माह पश्चातस्वीकृति प्रदान करते रहने पर अनिश्चित काल तक जारी रह सकता है। | 6 माह, किन्तु संसद द्वारा प्रति 6 माह पश्चातस्वीकृति देते रहने पर अधिकतम तीन वर्ष तक ही किन्तु एक वर्ष पश्चातराष्ट्रीय आपात अथवा निर्वाचन आयोग द्वारा प्रमाण-पत्र दिए जाने पर ही जारी। | 6 माह, किन्तु संसद द्वारा प्रति 6 माह पश्चातस्वीकृति प्रदान करते रहने पर अनिश्चित काल तक जारी रह सकता है। |
आपात की समाप्ति | उदघोषणा वापस लेने पर अथवा लोकसभा में साधारण बहुमत से एक प्रस्ताव पारित कर राष्ट्रीय आपातकाल के समापन पर बैठक बुलाना उस समय अनिवार्य हो जाता है जब लोकसभा के 1/10 सदस्य लिखित नोटिस से स्पीकर या राष्ट्रपति को सूचित करें। | उदघोषणा वापस लेने पर, संसद की स्वीकृति न मिलने पर, अधिकतम 3 वर्ष की अवधि पूर्ण हो जाने पर। | उदघोषणा वापस लेने पर, संसद द्वारा अनुमोदन न मिलने पर। |
व्यवहार में प्रयोग | तीन बार – 1. 26 अक्टूबर, 1962 से 10 नवम्बर, 1968 तक, 2. 3 दिसम्बर, 1971 से 27 मार्च, 1977 तक, 3. 25 जून, 1975 से 21 मार्च, 1977 तक | 130 से भी ज्यादा बार | व्यवहार में इसका प्रयोग अभी तक नहीं किया गया। |
न्यायिक दृष्टिकोण | न्यायालय में आपात घोषणा को चुनौती दी जा सकती है। (38वें संशोधन अधिनियम से इसे न्यायिक समीक्षा से बाहर किया गया, परन्तु 44वें संशोधन, 1978 के माध्यम से इसे फिर से न्यायिक समीक्षा के अंतर्गत शामिल कर दिया गया है।) | एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ वाद (1994) में उच्चतम न्यायालय ने माना कि अनु.-356 के अधीन जारी राष्ट्रपति की घोषणा न्यायिक पुनरावलोकन के अधीन है। | न्यायपालिका द्वारा इनकी समीक्षा की जा सकती है। |
अब तक के राष्ट्रपति एवं उनका कार्यकाल
| नाम | कार्यकाल |
1. | डॉ. राजेन्द्र प्रसाद | 26 जनवरी,1950 से 13 मई,1962 तक |
2. | डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन | 1962 से 1967 तक |
3. | डॉ. जाकिर हुसैन | 1967 से 1969 तक |
4. | वी.वी. गिरी | 3 मई,1969 से 20 जुलाई,1969 तक |
5. | न्यायमूर्ति एम हिदायतुल्लाह | 20 जुलाई,1969 से 24 अगस्त,1969 तक |
6. | वी.वी. गिरी | 1969 से 1974 तक |
7. | फखरुद्दीन अली अहमद | 1974 से 1977 तक |
8. | बी.डी. जत्ती | 11 फवरी,1977 से 25 जुलाई,1977 तक |
9. | नीलम संजीव रेड्डी | 1977 से 1982 तक |
10. | ज्ञानी जैल सिंह | 1982 से 1987 तक |
11. | आर. वेंकटरमन | 1987 से 1992 तक |
12. | डॉ. शंकरदयाल शर्मा | 1992 से 1997 तक |
13. | डॉ. के.आर. नारायणन | 1997 से 2002 तक |
14. | डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम | 2002 से 2007 तक |
15. | प्रतिभा देवी सिंह पाटिल | 2007 से 2012 तक |
16. | प्रणव मुखर्जी | 2012 से 2017 तक |
17. | रामनाथ कोविंद | 25 जुलाई, 2017 से अब तक |
राष्ट्रपति विशेष तथ्य -
- भारत में अब तक 15 बार राष्ट्रपति के चुनाव हुए हैं, जिनमें से एक बार, अर्थात् 1977 में श्री नीलम संजीव रेड्डी निर्विरोध राष्ट्रपति चुने गये थे। शेष 12 राष्ट्रपति पद के चुनाव में एक से अधिक उम्मीदवार थे।
- अब तक केवल डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, फखरुद्दीन अली अहमद, नीलम संजीव रेड्डी तथा ज्ञानी जैल सिंह, अब्दुल कलाम, प्रतिभा पाटिल, प्रणव मुखर्जी, श्री रामनाथ कोविन्द को छोड़कर अन्य सभी राष्ट्रपति पूर्व में उपराष्ट्रपति के पद को संशोभित कर चुके थे।
- डॉ. एस. राधाकृष्णन लगातार दो बार उपराष्ट्रपति तथा एक बार राष्ट्रपति के पद पर आसीन हुए।
- डॉ. जाकिर हुसैन तथा फखरुद्दीन अली अहमद का कार्यकाल के दौरान निधन हो गया था।
- वी.वी. गिरी ने राष्ट्रपति उपराष्ट्रपति तथा प्रथम कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य किया। ये दूसरी वरीयता से चुने जाने वाले एकमात्र राष्ट्रपति हैं, जो निर्दलीय रूप से चुने गये थे।
- डॉ. फखरुद्दीन अली अहमद सर्वाधिक अध्यादेश जारी करने वाले राष्ट्रपति हैं।
- डॉ. राधाकृष्णन, डॉ. जाकिर हुसैन, वी.वी. गिरी, आर. वेंकटरमन, डॉ. शंकर दयालशर्मा तथा के.आर. नारायणन ऐसे राष्ट्रपति हैं जो पूर्व में उपराष्ट्रपति का पद धारण कर चुके हैं।
- नीलम संजीव रेड्डी एक मात्र ऐसे राष्ट्रपति हुए हैं जो एक बार चुनाव में पराजित हुए तथा बाद में निर्विरोध निर्वाचित हुए तथा ये लोकसभा के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।
- ज्ञानी जैल सिंह ने डाकघर बिल पर अपनी शक्ति पॉकेट वीटो का प्रयोग किया था।
- डॉ. शंकरदयाल शर्मा एकमात्र राष्ट्रपति हुए जिन्होंने सर्वाधिक प्रधानमंत्रियों के साथ काम किया था।
- के.आर. नारायणन भारत के प्रथम दलित राष्ट्रपति हुए।
- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, डॉ. राधाकृष्णन, डॉ. जाकिर हुसैन, वी.वी. गिरी, डॉ. ए.पी.जे. कलाम तथा प्रणव मुखर्जी भारत रत्न प्राप्त करने वाले राष्ट्रपति हैं।
- नव निर्वाचित राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविन्द को 25 जुलाई, 2017 को सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति जे.एस. खेहर द्वारा राष्ट्रपति के रूप में शपथ दिलाई गई थी।


0 Comments