चित्तौड़गढ़ जिले की सम्पूर्ण जानकारी | Chittorgarh District GK in Hindi | चित्तौड़गढ़ जिला
राजस्थान का चित्तौड़गढ़ जिला लंबे समय तक मेवाड़ की राजधानी रहा है। चित्तौड़गढ़ में चित्रकूट दुर्ग (जिसे वर्तमान में चित्तौड़गढ़ का किला कहा जाता है) का निर्माण मौर्य शासक चित्रांगद मौर्य ने करवाया था। यह दुर्ग गंभीरी एवं बेड़च नदियों के संगम के पास पर्वत शिखर पर स्थित है। यहां पर बप्पा रावल (मूल नाम कालभोज/मालभोज) ने गुहिल वंश का शासन स्थापित किया था। यहां के शासकों ने बाहरी आक्रमणों का डटकर मुकाबला किया था। चित्तौड़गढ़ प्रारंभ से ही शौर्य एवं वीरता की क्रीड़ास्थली तथा त्याग एवं बलिदान व स्वामीभक्ति का पावन तीर्थ रहा है। यहां पर स्वतंत्रता प्राप्ति तक सिसोदिया राजवंश का शासन रहा तथा मेवाड़ शासक महाराणा भूपाल सिंह को राजस्थान के एकीकरण के बाद नवगठित राजस्थान का महाराज प्रमुख बनाया गया।
चित्तौड़गढ़ जिले के उपनाम |चित्तौड़गढ़ के उपनाम/प्राचीन नाम
- खिज्राबाद
- राजस्थान का गौरव
- शक्ति एवं भक्ति का नगर
चित्तौड़गढ़ का सामान्य परिचय | Chittorgarh Ki Jankari Hindi Me
- चित्तौड़गढ़ का क्षेत्रफल : 10856 वर्ग किलोमीटर।
- चित्तौड़गढ़ में तहसीलें : 10
- चित्तौड़गढ़ में उप तहसीलें : 4
- चित्तौड़गढ़ में उपखंड : 7
- चित्तौड़गढ़ में पंचायत समितियां : 11
- चित्तौड़गढ़ में ग्राम पंचायत : 288
चित्तौड़गढ़ जिले की मानचित्र में स्थिति | स्थिति एवं विस्तार
✍ अक्षांशीय स्थिति : 23 डिग्री 32 मिनट उत्तरी अक्षांश से 25 डिग्री 13 मिनट उत्तरी अक्षांश तक।
✍ देशांतरीय स्थिति : 74 डिग्री 12 मिनट पूर्वी देशांतर से 75 डिग्री 49 मिनट पूर्वी देशांतर तक।
✍ देशांतरीय स्थिति : 74 डिग्री 12 मिनट पूर्वी देशांतर से 75 डिग्री 49 मिनट पूर्वी देशांतर तक।
चित्तौड़गढ़ जिले के विधानसभा क्षेत्र | Chittorgarh Me Vidhansabha क्षेत्र
चित्तौड़गढ़ जिले में कुल 5 विधानसभा क्षेत्र हैं, जिनके नाम निम्नानुसार है:-
- चित्तौड़गढ़
- निंबाहेड़ा
- बेंगू
- बड़ी सादड़ी
- कपासन
2011 की जनगणना के अनुसार चित्तौड़गढ़ जिले की जनसंख्या/घनत्व/लिंगानुपात/साक्षरता के आंकड़े
- चित्तौड़गढ़ की कुल जनसंख्या : 15,44,338
- चित्तौड़गढ़ का लिंगानुपात : 972
- चित्तौड़गढ़ में जनसंख्या घनत्व : 197
- चित्तौड़गढ़ की साक्षरता दर : 61.7%
- चित्तौड़गढ़ की पुरुष साक्षरता दर : 76. 6%
- चित्तौड़गढ़ की महिला साक्षरता दर : 46.5%
चित्तौड़गढ़ के प्रमुख मेले और त्यौहार | Chittorgarh Jile ke Mele
राम रावण मेला | बड़ी सादड़ी | |
सांवलियाजी का मेला (जलझूलनी एकादशी का मेला ) | मण्डफिया | |
जौहर मेला | दुर्ग चित्तौड़गढ़ | |
मातृकुण्डिया का मेला | राशमी, हरनाथपुरा | |
मीरा महोत्सव | चित्तौड़गढ़ | |
राज्य स्तरीय मेवाड़ उद्योग उत्सव | चित्तौड़गढ़ |
चित्तौड़गढ़ के प्रमुख मंदिर | चित्तौड़गढ़ के शीर्ष मंदिर
✍ समिद्धेश्वर मंदिर
इस मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी में मालवा के परमार राजा भोज ने करवाया था। यहां प्राप्त शिलालेख के अनुसार इसका जीर्णोद्धार सूत्रधार जेता के निर्देशन में महाराणा मोकल ने 1428 में करवाया था। इसलिए इस मंदिर को मोकल जी का मंदिर भी कहते हैं। यह मंदिर नागर शैली में बना हुआ है।
✍ मीरा मंदिर
मेवाड़ के राणा सांगा के द्वितीय पुत्र भोज की पत्नी मीराबाई के इस मंदिर में मीरा की प्रतिमा के स्थान पर केवल एक तस्वीर लगी हुई हैं। इसके सामने उनके गुरु संत रैदास की छतरी है। यह मंदिर चित्तौड़गढ़ दुर्ग में इंडो-आर्य शैली में निर्मित है। मीराबाई श्री कृष्ण की परम भक्त थी।
✍ मातृकुंडिया, राशमी (चित्तौड़गढ़)
चित्तौड़गढ़ जिले के राशमी पंचायत समिति क्षेत्र में हरनाथपुरा गांव के पास बहने वाली बनास एवं चंद्रभागा नदी के किनारे यह तीर्थ स्थल स्थित है। इसे मेवाड़ का हरिद्वार/मेवाड़ का प्रयाग भी कहा जाता है। यहां पर जल में अस्थियां प्रवाहित की जाती हैं। यहां पर लक्ष्मण झूला भी स्थित है।
✍ श्रृंगार चंवरी
शांतिनाथ जैन मंदिर जिसका निर्माण महाराणा कुंभा के कोषाधिपति के पुत्र वेल्का ने चित्तौड़गढ़ किले में करवाया था। यह मंदिर राजपूत व जैन स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना है। यहां कुंभा की पुत्री रमाबाई की चवरी बनी हुई है।
शांतिनाथ जैन मंदिर जिसका निर्माण महाराणा कुंभा के कोषाधिपति के पुत्र वेल्का ने चित्तौड़गढ़ किले में करवाया था। यह मंदिर राजपूत व जैन स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना है। यहां कुंभा की पुत्री रमाबाई की चवरी बनी हुई है।
✍सांवलिया जी मंदिर, मंडफिया
सांवलिया जी का यह विश्व विख्यात मंदिर चित्तौड़गढ़ के मंडफिया गांव में स्थित है। यहां पर श्री कृष्णजी की काले पत्थर की मूर्ति विराजमान है। भक्त लोग इन्हें सांवलिया सेठ भी कहते हैं।
✍ सतबीसी जैन मंदिर
चित्तौड़गढ़ दुर्ग के अंदर 11 वीं सदी में बना एक भव्य जैन मंदिर, जिसमें 27 देवरिया (27 छोटे-छोटे मंदिर) होने के कारण इस मंदिर को सतबीस देवरी भी कहते हैं।
चित्तौड़गढ़ दुर्ग के अंदर 11 वीं सदी में बना एक भव्य जैन मंदिर, जिसमें 27 देवरिया (27 छोटे-छोटे मंदिर) होने के कारण इस मंदिर को सतबीस देवरी भी कहते हैं।
✍ तुलजा भवानी मंदिर
तुलजा भवानी माता के इस मंदिर का निर्माण उड़ना राजकुमार पृथ्वीराज के दासी पुत्र बनवीर ने चित्तौड़गढ़ दुर्ग के अंतिम द्वार रामपोल से दक्षिण की ओर करवाया था। इसी मंदिर के पास पुरोहित जी की हवेली भी स्थित है। यह छत्रपति शिवाजी की आराध्य देवी थी।
✍ बाडोली के शिव मंदिर
इस मंदिर का निर्माण परमार राजा हुन ने करवाया था। यह मंदिर चंबल नदी और बामणी नदी के संगम क्षेत्र में राणा प्रताप सागर बांध के पास भैंसरोडगढ़ (चित्तौड़गढ़) में स्थित है। यह 9 मंदिरों का समूह है। इसमें से सबसे प्रमुख मंदिर घोटेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध है। यह मंदिर गुर्जर प्रतिहार कला का उत्कृष्ट नमूना है।
इस मंदिर का निर्माण परमार राजा हुन ने करवाया था। यह मंदिर चंबल नदी और बामणी नदी के संगम क्षेत्र में राणा प्रताप सागर बांध के पास भैंसरोडगढ़ (चित्तौड़गढ़) में स्थित है। यह 9 मंदिरों का समूह है। इसमें से सबसे प्रमुख मंदिर घोटेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध है। यह मंदिर गुर्जर प्रतिहार कला का उत्कृष्ट नमूना है।
✍ चित्तौड़गढ़ का कुंभ, श्याम मंदिर
चित्तौड़गढ़ दुर्ग में कुंभ श्याम मंदिर व कालिका माता मंदिर (गुहिल वंश की इष्ट देवी ) का निर्माण आठवीं सदी में हुआ था। ये मंदिर प्रतिहारकालीन मंदिर है। ये दोनों मंदिर महामारू शैली के हैं। महाराणा कुंभा ने कुंभ श्याम मंदिर का जीर्णोद्धार 15वीं सदी में करवाया था।
चित्तौड़गढ़ दुर्ग में कुंभ श्याम मंदिर व कालिका माता मंदिर (गुहिल वंश की इष्ट देवी ) का निर्माण आठवीं सदी में हुआ था। ये मंदिर प्रतिहारकालीन मंदिर है। ये दोनों मंदिर महामारू शैली के हैं। महाराणा कुंभा ने कुंभ श्याम मंदिर का जीर्णोद्धार 15वीं सदी में करवाया था।
✍ असवारी माता का मंदिर
यहां पर लकवे के मरीजों का इलाज किया जाता है अर्थात ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर में आने से लकवे के मरीजों का इलाज हो जाता है। यहां स्थित दो तिबारियों में से बीमार बच्चे को निकला जाता है। यह मंदिर चित्तौड़गढ़ की भदेसर पंचायत समिति के निकट निकुंभ में स्थित है। इस मंदिर को असवारी माता का मंदिर (आवरी माता का मंदिर) कहा जाता है।
यहां पर लकवे के मरीजों का इलाज किया जाता है अर्थात ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर में आने से लकवे के मरीजों का इलाज हो जाता है। यहां स्थित दो तिबारियों में से बीमार बच्चे को निकला जाता है। यह मंदिर चित्तौड़गढ़ की भदेसर पंचायत समिति के निकट निकुंभ में स्थित है। इस मंदिर को असवारी माता का मंदिर (आवरी माता का मंदिर) कहा जाता है।
चित्तौड़गढ़ के दर्शनीय स्थल | चित्तौड़गढ़ के पर्यटन स्थल
✍ विजय स्तंभ
विजय स्तंभ का निर्माण महाराणा कुंभा द्वारा मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी के खिलाफ 1437 ईस्वी में सारंगपुर विजय के उपलक्ष में महान वास्तुशिल्पी मंडन के मार्गदर्शन में 1440 से 1448 के मध्य करवाया गया था। विजय स्तंभ को हिंदू मूर्तिकला का विश्वकोश/विक्ट्री टावर/मूर्तियों का अजायबघर/भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोश/विष्णु ध्वज आदि नामों से जाना जाता है। यह विजय स्तंभ 9 मंजिला है। इसकी आठवीं मंजिल पर "अल्लाह " शब्द खुदा हुआ है तथा इसकी तीसरी मंजिल पर 9 बार अल्लाह शब्द अरबी भाषा में लिखा हुआ है। यह डमरु के आकार का है। विजय स्तंभ का आधार 30 फीट है, ऊंचाई 122 फीट है, मंजिले 09, सीढ़ियां 157 है। कर्नल जेम्स टॉड ने इसके बारे में कहा - "यह क़ुतुब मीनार से भी बेहतरीन इमारत है" |
विजय स्तंभ के शिल्पकार - जेता और उसके पुत्र नापा, पूंजा और पोमा।
विजय स्तंभ के शिल्पकार - जेता और उसके पुत्र नापा, पूंजा और पोमा।
✍ चित्तौड़गढ़ किला
इस दुर्ग के लिए एक कथन बहुत प्रचलित है - "गढ़ तो चित्तौड़गढ़ बाकि सब गढ़ैया" | चित्तौड़गढ़ किले को 'राजस्थान का गौरव/गढ़ों का सिरमौर/मालवा का प्रवेश द्वार/चित्रकूट दुर्ग/खिज्राबाद/वॉटर फोर्ट/राजस्थान का गौरव/राजस्थान का दक्षिणी प्रवेश द्वार/' आदि नामों से भी जाना जाता है। इस अभेद्य दुर्ग का निर्माण मौर्य शासक चित्रांगद मौर्य ने मेसा के पठार पर करवाया था। गुहिलों ने नागदा के विनाश के बाद इसे अपनी राजधानी बनाया था। इस दुर्ग में विजय स्तंभ, कुंभ श्याम मंदिर, तुलजा भवानी का मंदिर, भीम कुंड, रानी पद्मिनी का महल, मीराबाई का मंदिर आदि स्थित है। रास्ते में उदय सिंह के वीर सेनापति जयमल एवं पता की छतरियां स्थित है। यह दुर्ग व्हेल मछली के आकार में बना हुआ है। यह दुर्ग राजस्थान का सबसे बड़ा लिविंग फोर्ट है। इस दुर्ग में गौमुख कुंड के पास रानी पद्मिनी का जौहर स्थल स्थित है। चित्तौड़गढ़ दुर्ग में नौगजा पीर की कब्र भी स्थित है। यह दुर्ग बेड़च व गंभीरी नदियों के संगम के पास पहाड़ी पर स्थित है। इस दुर्ग पर जाने के लिए सात प्रवेश द्वारों से गुजरना पड़ता है।
चित्तौड़गढ़ के किले के सात दरवाजे - भैरवपोल, गणेशपोल, पाडनपोल, हनुमानगढ़, जोडलापोल, रामपोल एवं लक्ष्मणपोल है। यह राजस्थान का एकमात्र ऐसा दुर्ग है जिसमें खेती की जाती है।
चित्तौड़गढ़ के किले के सात दरवाजे - भैरवपोल, गणेशपोल, पाडनपोल, हनुमानगढ़, जोडलापोल, रामपोल एवं लक्ष्मणपोल है। यह राजस्थान का एकमात्र ऐसा दुर्ग है जिसमें खेती की जाती है।
✍ फतेहप्रकाश महल
फतेहप्रकाश महल को अब राजकीय म्यूजिक में बदल दिया गया है। इसके निकट चतुर्भुजनाथ का मंदिर स्थित है। यह महल कुंभा महल के प्रमुख प्रवेश द्वार 'बड़ी पोल' से बाहर निकलते ही स्थित है।
फतेहप्रकाश महल को अब राजकीय म्यूजिक में बदल दिया गया है। इसके निकट चतुर्भुजनाथ का मंदिर स्थित है। यह महल कुंभा महल के प्रमुख प्रवेश द्वार 'बड़ी पोल' से बाहर निकलते ही स्थित है।
✍ भैंसरोडगढ़ दुर्ग
इस दुर्ग का निर्माण भैंसाशाह व रोड़ा चारण ने करवाया था। यह दुर्ग चंबल व बामनी नदियों के संगम स्थल पर स्थित है। इसे राजस्थान का वेल्लोर व जल दुर्ग के उपनाम से जानते हैं।
इस दुर्ग का निर्माण भैंसाशाह व रोड़ा चारण ने करवाया था। यह दुर्ग चंबल व बामनी नदियों के संगम स्थल पर स्थित है। इसे राजस्थान का वेल्लोर व जल दुर्ग के उपनाम से जानते हैं।
✍ जैन कीर्ति स्तंभ
जैन कीर्ति स्तंभ का निर्माण दिगंबर जैन महाजन जीजाक द्वारा करवाया गया था। जैन कीर्ति स्तंभ जैन धर्म के प्रथम जैन तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित है। यह चित्तौड़गढ़ दुर्ग में स्थित है। यह सात मंजिला है। कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति की शुरुआत अत्रि ने की तथा समाप्त उसके पुत्र महेश भट्ट ने की।
✍ वीनौता की बावड़ी
चित्तौड़गढ़ जिले की बड़ी सादड़ी तहसील में स्थित इस वीनौता बावड़ी का निर्माण स्थानीय जागीरदार सूरजसिंह शक्तावत द्वारा करवाया गया था।
चित्तौड़गढ़ जिले की बड़ी सादड़ी तहसील में स्थित इस वीनौता बावड़ी का निर्माण स्थानीय जागीरदार सूरजसिंह शक्तावत द्वारा करवाया गया था।
चित्तौड़गढ़ दुर्ग के प्रमुख साके
- चित्तौड़गढ़ दुर्ग का प्रथम साका : अलाउद्दीन खिलजी ने 1303 ईस्वी में चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर आक्रमण किया। जिसमें रतनसिंह ने केसरिया किया था तथा उसकी उसकी रानी पद्मिनी ने 1600 महिलाओं के साथ जौहर किया था। इसमें रतनसिंह के सेनापति गौरा एवं बादल वीरगति को प्राप्त हुए। इसके बाद अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़गढ़ का नाम बदलकर अपने पुत्र के नाम पर खिज्राबाद रखा गया तथा अलाउद्दीन ने इस दुर्ग की जिम्मेदारी अपने पुत्र खिज्र खां को सौपी। यह मेवाड़ का प्रथम साका था।
- चित्तौड़गढ़ दुर्ग का द्वितीय साका : गुजरात के बहादुरशाह ने 1534-35 में चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर आक्रमण किया। उस समय वहां पर विक्रमादित्य का शासन था। रानी कर्मावती ने हुमायु को राखी भेजकर सहायता मांगी, परन्तु समय पर सहायता नहीं की। रानी कर्मावती ने दुर्ग की जिम्मेदारी बाघसिंह को सौपी। बाघसिंह ने केसरिया एवं रानी कर्मावती ने जौहर किया था।
- चित्तौड़गढ़ दुर्ग का तृतीय साका : अकबर ने 1568 चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर आक्रमण किया था। उस समय चित्तौड़गढ़ पर उदयसिंह का शासन था। उदयसिंह दुर्ग की जिम्मेदारी अपने दो सेनापति जयमल एवं फत्ता को सौपकर गोगुन्दा चले गए। इसमें जयमल, फत्ता एवं जयमल के भतीज कल्लाजी ( चार हाथ के लोकदेवता) ने केसरिया एवं फत्ता की पत्नी फूलकंवर ने जौहर किया था।
- चम्बल नदी (Chambal River) : चम्बल नदी का उद्गम मध्यप्रदेश के इंदौर जिले के महू के निकट जानापाव पहाड़ी से होता है। चम्बल नदी के उपनाम - "राजस्थान की कामधेनु/नित्यवाही नदी/चर्मण्वती नदी/बारहमासी नदी" | चम्बल नदी राजस्थान में चौरासीगढ़ (चित्तौड़गढ़) से प्रवेश करती है। राजस्थान का सबसे ऊँचा (18 मीटर) जलप्रपात "चूलिया जलप्रपात" चम्बल नदी पर भैंसरोड़गढ़ (चित्तौड़गढ़) में स्थित है। विश्व की एकमात्र नदी जिसके 100 किलोमीटर के दायरे में तीन बांध बनाये गए है। जिसमें से राणा प्रताप सागर बांध रावतभाटा (चित्तौड़गढ़) में स्थित है। यह बांध जल भराव की दृष्टि से राजस्थान का सबसे बड़ा बांध है।
- राणा प्रताप सागर बांध - यह बांध चम्बल नदी पर (चित्तौड़गढ़ में) चूलिया जलप्रपात के निकट बनाया गया है। यह राज्य का सर्वाधिक भराव क्षमता वाला बांध है।
- रूपारेल बांध, भूपालसागर बांध, ओराई बांध, सोनियाना बांध आदि चित्तौड़गढ़ में स्थित है।
- भैंसरोड़गढ़ वन्य जीव अभयारण्य - यह अभयारण्य भैंसरोड़गढ़ के आस पास के वन प्रदेश को मिलकर 05 फरवरी, 1983 को बनाया गया था। यह अभयारण्य रावतभाटा (चित्तौड़गढ़) में राणाप्रताप सागर बांध पर स्थित है। यह अभयारण्य एक लम्बी पट्टी के रूप में चम्बल एवं बामनी नदियों के सहारे-सहारे फैला हुआ है। यह घड़ियालों के लिए प्रसिद्ध है।
- बस्सी वन्य जीव अभयारण्य - इसे 29 अगस्त, 1988 को अभयारण्य घोषित किया गया। यह अभयारण्य जंगली बाघों के विचरण हेतु विश्व प्रसिद्ध है। इसमें से ओरई एवं ब्राह्मणी/बामनी नदी का उद्गम होता है।
- चित्तौड़गढ़ मृगवन - इसकी स्थापना 1969 में की गयी। यह चित्तौड़गढ़ के दक्षिणी छोर की दीवारों के सहारे-सहारे फैला हुआ है।
- दशहरा मेला - दशहरा मेला प्रतिवर्ष आसोज शुक्ल प्रतिपदा से दशमी तक निम्बाहेड़ा(चित्तौड़गढ़) में लगता है।
- हजरत दीवान शाह की दरगाह - कपासन, चित्तौड़गढ़ में है।
- गेरू पत्थर चित्तौड़गढ़ से प्राप्त होते हैं।
- राजस्थान अणु शक्ति संयंत्र - इसकी स्थापना 1973 में रावतभाटा (चित्तौड़गढ़) में कनाडा के सहयोग से की गयी थी। यह राजस्थान का प्रथम एवं देश का दूसरा अणु शक्ति संयत्र है। इसकी क्षमता 1300 मेगावाट की है।
- राजस्थान में सौर ऊर्जा पर आधारित प्रथम दूरदर्शन केंद्र रावतभाटा (चित्तौड़गढ़) में स्थित है।
- दी मेवाड़ शुगर मिल्स लिमिटेड - यह शुगर मिल राजस्थान की प्रथम चीनी मिल है। इसकी स्थापना 1932 ईस्वी में भोपालसागर (चित्तौड़गढ़) में निजी क्षेत्र में की गयी थी।
- राष्ट्रीय केमिकल्स एवं फर्टिलाइजर्स लिमिटेड - डाई अमोनियम फास्फेट (डीएपी) खाद का यह कारखाना कपासन गांव (चित्तौड़गढ़) में स्थापित है।
- जे. के. व्हाइट सीमेंट का कारखाना - इसकी स्थापना मांगरोल में की गयी थी। यह राजस्थान का सफ़ेद सीमेंट का तीसरा कारखाना है।
- जे. के. सीमेंट का कारखाना - इस कारखाने की स्थापना 1974 में निम्बाहेड़ा (चित्तौड़गढ़ ) में की गयी थी। यह राज्य में सबसे बड़ा सर्वाधिक सीमेंट उत्पादन का कारखाना है।
- बिड़ला जुट का कारखाना - इस कारखाना की स्थापना 1995 ईस्वी में की गई थी। यह कारखाना राजस्थान का तीसरा सीमेंट का कारखाना है।
- चित्तौड़गढ़ सीमेंट वर्क्स - इसकी स्थापना 1987 में की गयी थी। यहां पर चेतक छाप की सीमेंट मिलती है।
- आदित्य सीमेंट लिमिटेड - इसकी स्थापना 1995 ईस्वी में की गयी थी।
- जाजम प्रिंट/दाबू प्रिंट - छीपों का आकोला। आकोला के छपाई के घाघरे बहुत प्रसिद्ध है।
- तुर्रा कलंगी ख्याल - यह ख्याल सर्वाधिक चित्तौड़गढ़ में प्रचलित है। इस ख्याल के मूल प्रवर्तक तुर्रा (शिव) शाहअली एवं कलंगी (पार्वती) तुक नगीर दो संत पीर थे।
- चित्तौड़गढ़ दुर्ग में प्रमुख छतरियां - कल्लाजी की छतरी, जयमल राठौड़ की छतरी, मीरां के गुरु संत रैदास की छतरी, प्रतापगढ़ के रावत बाघसिंह की छतरी आदि।
- नगरी सभ्यता - इसका प्राचीन नाम मध्यमिका/मज्यमिका नगरी था। इसकी खुदाई डॉ. भंडारकर द्वारा की गयी थी। इसमें शिवि जनपद के सिक्के मिले है।

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