भारतीय स्वतंत्रता संग्राम
ब्रिटिश शासन को भारतीय चुनौती-
- इस समय गवर्नर जनरल लार्ड केनिंग था।
- विद्रोह का आरम्भ 10 मई, 1857 को मेरठ में पैदल टुकड़ी से हुआ। इससे पहले 29 मार्च, 1857 को बैरकपुर (प. बंगाल) के 34वीं एन. आई. रेजीमेंट के सैनिक मंगल पांडे ने अपने सार्जेन्ट की हत्या कर दी, परिणामस्वरूप 34वीं एन.आई. को भंग कर दिया गया।
- 11 मई को विद्रोही सैनिकों ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया तथा 12 मई को बहादुरशाह को दिल्ली का सम्राट घोषित कर दिया। परन्तु वास्तविक नेतृत्व सैनिक नेता जनरल बख्त खाँ के हाथों में था।
- अंग्रेजों ने पंजाब से सेना बुलाकर 21 सितम्बर, 1857 को दिल्ली पर कब्जा कर लिया। लेफ्टिनेंट हडसन ने धोखे से बहादुरशाह-द्वितीय के दो पुत्रों एवं एक पोते को गोली मार दी।
- कानपुर में तात्या टोपे तथा नाना साहेब ने विद्रोहियों का नेतृत्व किया। तात्या टोपे को सिंधिया के सामन्त मान सिंह ने धोखे से पकड़वा दिया। 1859 में उन्हें फांसी दे दी गई। नाना साहेब, बेगम हजरत महल एवं खान बहादुर खान नेपाल भागने में सफल हुए। जनरल बख्त खाँ मई, 1859 में लड़ते-लड़ते शहीद हो गए।
- जुलाई, 1858 तक विद्रोह लगभग दबा दिया गया।
1857 का विद्रोह
विद्रोह | नेता | विद्रोही दमन |
दिल्ली | बहादुरशाह द्वितीय | निकोलसन लारेंस |
लखनऊ | बेगम हजरत महल | कैम्पवेल |
कानपुर | नाना साहब | कैम्पवेल |
झाँसी | रानी लक्ष्मीबाई | ह्यूरोज |
इलाहाबाद | लियाकत अली | कर्नल नील |
बिहार | कुंवर सिंह | विलियम टेलर |
फतेहपुर | अजीमुल्ला | जनरल रेनर्ड |
फैजाबाद | मौलवी | अहमद-उल्ला |
बरेली | खान बहादुर खाँ |
विद्रोह के कारण :-
- डलहौजी की गोद निषेधा की नीति, कुशासन के आधार पर अवध तथा हैदराबाद का विलय, भारतीय लघु एवं कुटीर उद्योग, दस्तकारी तथा कृषि का विनाश, सामाजिक विश्वासों में हस्तक्षेप, धार्मिक कार्य़ों में हस्तक्षेप आदि।
सैन्य कारण :-
- 1854 ई. से सैनिकों को निःशुल्क डाक सुविधा समाप्त, 1856 का सामान्य सेना भर्ती अधिनियम, जिसके अंतर्गत सैनिकों को बाहर भी भेजा जाने लगा।
तात्कालिक कारण :-
- 1856 ई. में सरकार ने नवीन एनफील्ड राइफल में प्रयुक्त कारतूस मुँह से काटना पड़ता था, जिसमें गाय तथा सुअर की चर्बी का प्रयोग होता था। हिन्दू और मुसलमान दोनों सिपाहियों ने इसके प्रयोग से इंकार किया। यही चर्बी वाला कारतूस 1857 के विद्रोह का तात्कालिक कारण था।
असफलता के कारण :-
- विद्रोह स्थानीय, असंगठित था, राष्ट्रीय भावना का अभाव था, भारतीय समाज के सभी वर्ग़ों का सहयोग विद्रोहियों को नहीं मिला, शिक्षित एवं मध्यम वर्ग उदासीन रहा।
- सैन्य दुर्बलता तथा सैन्य नेतृत्व क्षमता की कमी, विद्रोहियों में योजना का अभाव आदि।
- बम्बई एवं मद्रास की सेनाएँ ग्वालियर, इंदौर, हैदराबाद, जोधपुर, पटियाला, कश्मीर, नामा, जींद तथा नेपाल के शासकों ने विद्रोह को दबाने में अंग्रेजों के साथ सहयोग किया।
परिणाम :-
- 1858ई. में ईस्ट इंडिया कम्पनी का शासन समाप्त हो गया और भारत पर शासन का अधिकार महारानी के हाथों में आ गया।
- इंग्लैंड में भारत राज्य सचिव की नियुक्ति हुई। भारत में गवर्नर जनरल का पद समाप्त कर, वायसराय (क्राउन का प्रतिनिधि) की नियुक्ति हुई।
- हिन्दू मुस्लिम एकता की भावना का विकास हुआ।
- 1861 ई. में भारतीय परिषद् अधिनियम पारित किया गया।
- भारतीय यूरोपीय सैनिकों का अनुपात 2 : 1 कर दिया गया तथा तोपखाने पर पूर्णतः यूरोपीय सैनिकों का अधिकार स्थापित कर दिया गया।
1857 के विद्रोह के संबंध में विभिन्न मत
यह पूर्णतया सिपाही विद्रोह था | सर जॉन लारेंस व सीले |
यह स्वतंत्रता संग्राम था | डा. ईश्वरी प्रसाद |
यह राष्ट्रीय विद्रोह था | डिजरैली |
अंग्रेजों के विरुद्ध, हिन्दू मुस्लिम षड्यंत्र था | जेम्स आउट्रम, डब्लू टेलर |
ईसाई धर्म के विरुद्ध एक धर्मयुद्ध था | एल. आर. रीज |
सभ्यता एवं बर्बरता का संघर्ष | टी. आर. होम्स |
यह विद्रोह राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए, सुनियोजित युद्ध था | वीर सावरकर, अशोक मेहता |
1857 का विद्रोह स्वतंत्रता संग्राम नहीं था | आर. सी. मजूमदार |
प्रमुख नागरिक विद्रोह
संन्यासी विद्रोह (1763-1800 ई.) :-
- संन्यासी विद्रोह की स्पष्ट जानकारी बंकिम चन्द्र चटर्जी के उपन्यास ’आनन्दमठ‘ से मिलती है, इस विद्रोह को कुचलने के लिए वारेन हेस्टिंग्स को कठोर कार्यवाही करनी पड़ी थी। अंग्रेजों द्वारा बंगाल के आर्थिक शोषण से जमींदार, कृषक तथा शिल्पी सभी नष्ट हो गए। 1770 ई. में भीषण अकाल पड़ा। तीर्थ-स्थानों पर आने जाने पर लगे प्रतिबंधों से संन्यासी लोग बहुत क्षुब्ध हुए।
चुआर विद्रोह (1766-72 ई., 1795-1816 ई.) :-
- अकाल तथा बढ़े हुए भूमि कर तथा अन्य आर्थिक संकटों के कारण मिदनापुर जिले की आदिम जाति के चुआर लोगों ने हथियार उठा लिए।
रमोसी विद्रोह :-
- पश्चिम घाट के निवासी रमोसी जाति के लोगों ने अंग्रेजी प्रशासन पद्धति तथा शासन से अप्रसन्न होकर 1822 ई. , 1825-26 ई. और 1829 ई. में विद्रोह कर दिया तथा सतारा के आस-पास का प्रदेश लूट लिया।
कोल्हापुर तथा सावन्तवाड़ी विद्रोह :-
- 1844 ई. में कोल्हापुर राज्य के प्रशासनिक पुनगर्ठन होने के कारण गाड़कारी सैनिकों की छंटनी कर दी गई। बेकारी का प्रश्न सम्मुख देखकर गाड़कारियों ने विद्रोह कर दिया। इसी प्रकार सावन्तवाड़ी में भी विद्रोह हुआ।
पागल पंथी विद्रोह (1840, 1850 ई.) :-
- य ह अर्द्धधार्मिक सम्प्रदाय था, जिसको उत्तर बंगाल के करम शाह और उसके बाद उसके पुत्र टीपू ने आगे बढ़ाया। ये राजनीतिक तथा धार्मिक विचारों से प्रभावित थे।
फरैजी विद्रोह (1838-1857 ई.) :-
- फरैजी लोग धार्मिक, सामाजिक तथा राजनैतिक परिवर्तनों के प्रतिपादक थे तथा शरीयतुल्ला द्वारा चलाए गए सम्प्रदाय के अनुयायी थी। शरीयतुल्ला के पुत्र दादू मियां ने बंगाल से अंग्रेजों को निकालने की योजना बनाई। यह विद्रोह जमींदारों के अत्याचारों के विरोध में 1838 ई. से 1857 ई. तक चलता रहा।
आदिवासी विद्रोह
कोल विद्रोह (1820-1836 ई.) :-
- छोटा नागपुर के कोलों ने अपना क्रोध उस समय प्रकट किया, जब उनकी भूमि उनके मुखिया मुण्डों से छीनकर मुस्लिम कृषकों तथा सिक्खों को दे दी गई। 1831 ई. में कोलों ने लगभग 1000 विदेशी अथवा बाहरी लोगों को या तो जला दिया या उनकी हत्या कर दी। एक दीर्घकालीन तथा विस्तृत सैन्य अभियान के पश्चात् ही अशांतग्रस्त इलाके यथा-रांची, सिंहभूमि, हजारीबाग, पलामू आदि क्षेत्रों में शान्ति स्थापित हो सकी।
संथाल विद्रोह (1855 ई.) :-
- राजमहल जिले के संथाल लोगों ने भूमिकर अधिकारियों के हाथों दुर्व्यवहार, पुलिस के दमन तथा जमींदारों एवं साहूकारों की वसूलियों के विरुद्ध अपना रोष प्रकट किया। इन लोगों ने सिद्धू, कान्हू के नेतृत्व में कम्पनी के शासन को अन्त करने की घोषणा कर अपने आपको स्वतंत्र घोषित कर दिया। पृथक संथाल परगना का निर्माण एवं विस्तृत सैन्य कार्यवाही के पश्चात् ही 1856 ई. में स्थिति नियंत्रण में आई।
अहोम विद्रोह (1828-1830 ई.) :-
- अंग्रेजों ने अहोम प्रदेश को भी अपने प्रदेशों में सम्मिलित करने का प्रयास किया। परिणामस्वरूप अहोम लोगों ने गोमधर कुँवर को अपना राजा घोषित कर 1828 ई. में रंगपुर पर चढ़ाई करने की योजना बनाई। 1830 ई. में दूसरे विद्रोह की योजना बनी। कम्पनी के अच्छे सैन्य बल और शांतिमय नीति के कारण इस विद्रोह को असफल बनाया जा सका।
खासी विद्रोह (1833 ई.) :-
- अंग्रेजों ने जयंतिया तथा गारो पहाड़ियों के क्षेत्र पर अधिकार करने के बाद ब्रह्मपुत्र घाटी तथा सिल्हट को जोड़ने के लिए एक सैनिक मार्ग के निर्माण हेतु योजना बनाई। नक्सलों के राजा तीरत सिंह ने खाम्पटी तथा सिंहपों लोगों की सहायता से अंग्रेज विरोधी आन्दोलन की मुहिम छेड़ दी। 1833 ई. में सैन्य बल से ही अंग्रेज इस आन्दोलन को दबा सके।
कोल विद्रोह :-
- भीलों की तरफ कोलों ने भी अंग्रेजी शासन से उत्पन्न बेकारी के कारण 1829 ई., 1839 ई. तथा पुनः 1844 ई., 1848 ई. तक विद्रोह किए। ये भीलों के पड़ोसी थे।
कच्छ का विद्रोह :-
- 1819 ई. में कच्छ के राजा भारमल को अंग्रेजों ने हटाकर वहाँ का वास्तविक शासन एक अंग्रेज रेजिडेंट के अधीन प्रतिशासक परिषद् को दिया। इस परिषद् द्वारा किए गए परिवर्तनों तथा अत्यधिक भूमि कर लगाने के कारण लोगों ने विद्रोह कर दिया, अंग्रेजों को चिरकाल तक सैनिक कार्यवाही करनी पड़ी पुनः यहाँ 1831 ई. में विद्रोह हो गया।
मुंडा विद्रोह (1899-1900 ई.) :-
- मुंडा जाति में सामूहिक खेती का प्रचलन था, लेकिन जागीरदारों, ठेकेदारों, बनियों और सूदखोरों ने सामूहिक खेती की परम्परा पर हमला बोल दिया। इसके विरोध में आदिवासियों ने बिरसा मुंडा के नेतृत्व में 1899 ई. में विद्रोह का ऐलान किया। लगभग छह हजार मुंडाओं ने तीर-तलवार, कुल्हाड़ी व अन्य हथियारों से लेस होकर 6 पुलिस थाना क्षेत्रों पर तीर चलाए और चर्च़ों को जलाने का प्रयास किया। लेकिन फरवरी, 1900 के शुरू में बिरसा को गिरफ्तार कर लिया गया और जेल में ही उसकी मृत्यु हो गई।
भारत में कृषक आन्दोलन
बंगाल में नील कृषकों की हड़ताल :-
- नील विद्रोह का वर्णन ’दीनबन्धु‘ मित्र ने अपनी पुस्तक नीलदर्पण में किया है। इस आन्दोलन की शुरुआत दिगम्बर व विष्णु विश्वास ने की। 1858 ई. से 1860 ई. तक चला यह आन्दोलन अंग्रेज भूमिपतियों के विरुद्ध किया गया। कम्पनी के कुछ अवकाश प्राप्त अधिकारी बंगाल तथा बिहार के जमींदारों से भूमि प्राप्त कर नील की खेती करवाते थे। वे किसानों पर अत्याचार करते थे। अप्रैल, 1860 मे पाबना और नादिया जिलों के समस्त कृषकों ने भारतीय इतिहास की प्रथम कृषक हड़ताल की।
चम्पारन सत्याग्रह :-
- उत्तर भारत के चम्पारन (बिहार) जिले यूरोपीय नील उत्पादक बिहारी नील कृषकों का शोषण करते थे। गाँधी जी ने वर्ष 1917 में बाबू राजेन्द्र प्रसाद की सहायता से कृषकों को अहिंसात्मक असहयोग करने की प्रेरणा दी और सत्याग्रह किया।
खेड़ा (केरा) आन्दोलन :-
- यह आन्दोलन मुख्यतः बम्बई सरकार के विरुद्ध था। वर्ष 1918 में सूखे के कारण फसलें नष्ट हो गई, जिससे कृषक कर देने में असमर्थ थे। परन्तु सरकार बिना किसी छूट से भू-कर पूरा वसूलना चाहती थी। फलस्वरुप किसानों ने गाँधी जी के नेतृत्व में सत्याग्रह किया, जो जून, 1918 तक चलता रहा।
अन्य कृषक आन्दोलन :-
- बंगाल का तेभागा आन्दोलन, दक्कन का तेलगांना आन्दोलन पश्चिमी भारत में वर्ली विद्रोह आदि।
ब्रिटिश प्रशासनिक संगठन
- भारत में नागरिक सेवा का जन्मदाता 'लार्ड कार्नवालिस' था।
- 1800 ई. में लार्ड वेलेजली ने नागरिक सेवा में आने वाले युवा लोगों के प्रशिक्षण के लिए कलकत्ता में 'फोर्ट विलियम कॉलेज' खोला।
- 1833 में चार्टर एक्ट ने राज्य के उच्चतम पदों पर भारतीयों की नियुक्ति को कानूनी बना दिया, किन्तु 1793 ई. के कानून की धाराओं के रद्द न किए जाने के कारण यह व्यवहार में नहीं लाया जा सका।
- प्रारम्भ में नागरिक सेवा में प्रवेश की अधिकतम आयु 23 वर्ष थी, 1859 ई. में 22 वर्ष, 1866 ई. में 21 वर्ष तथा 1878 ई. में 19 वर्ष कर दी गई।
- 1863 ई. में इस परीक्षा में उत्तीर्ण होने वाले प्रथम भारतीय रवीन्द्रनाथ ठाकुर के बड़े भाई सत्येन्द्रनाथ ठाकुर थे।
- 1912 में भारतीय लोक सेवाओं पर लार्ड आइलिंगटन की अध्यक्षता वाले 'राजकीय आयोग' ने आईसीएस की परीक्षा भारत में भी लिये जाने की सिफारिश की।
- 1924 में ली कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर 'इंडियन सिविल सर्विस' इंडियन पुलिस सर्विस, इंजीनियर्स सर्विस की सिंचाई शाखा और इंडियन फोरेस्ट सर्विस के अखिल भारतीय अफसरों की नियुक्ति को पहले की तरह सेक्रेटरी ऑफ स्टेट इन काउंसिल द्वारा नियुक्त किए जाने एवं हस्तांतरित विभागों की नौकरियों को प्रान्तीय सरकारों द्वारा नियंत्रित किए जाने की सिफारिश की गई।
- ली कमीशन के रिपोर्ट के आधार पर वर्ष 1925 में एक 'लोक सेवा आयोग' की नियुक्ति दी गई। 1935 के अधिनियम में संघीय लोक सेवा आयोग तथा प्रान्तीय लोक सेवा आयोगों की व्यवस्था दी।
न्यायिक व्यवस्था :-
- 1772 ई. में प्रत्येक जिले में दीवानी एवं फौजदारी अदालतों की स्थापना की गई।
- अपीलीय अदालत के रूप में कलकत्ता में दो उच्च स्तरीय न्यायालयों की स्थापना की गई-सदर दीवानी अदालत एवं सदर निजामत अदालत।
- 1774 ई. में रेग्यूलेटिंग एक्ट के द्वारा कलकत्ता में एक सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना की गई।
- 1787 ई. में जिला न्यायालय पुनः कलेक्टर के अधीन कर दिये गए। ढाका, पटना एवं मुर्शिदाबाद को छोड़कर अब कलेक्टर राजस्व मामलों की देखरेख नहीं कर सकता था। क्योंकि अब यह अधिकार राजस्व परिषद् को हस्तांतरित कर दिया गया।
- 1790 से सदर निजामत अदालत का संचालन मुसलमान न्यायाधीश के स्थान पर गवर्नर जनरल एवं परिषद् द्वारा सीधे किया जाने लगा।
- 1790 में जिला फौजदारी अदालत समाप्त कर दिये गए और अब चार मुख्य फौजदारी न्यायालय कलकत्ता, मुर्शिदाबाद, ढाका एवं पटना में स्थापित किए गए।
- 1793 में 'कार्नवालिस संहिता' के अंतर्गत कलेक्टर सभी न्यायिक एवं दंडाधिकारों से वंचित कर दिये गए। ये अधिकार अब नये न्यायाधीशों को दिये गए। सबसे निचली अदालत मुंसिफ अदालत थी।
- 1833 के एक्ट द्वारा कानून बनाने के सारे अधिकार गवर्नर जनरल को हस्तांतरित कर दिये गए।
- 1861 में इंडियन हाईकोर्ट एक्ट पारित हुआ।
- 1865 में कलकत्ता, मद्रास एवं बम्बई में उच्च न्यायालय स्थापित किए गए।
- 1935 में संघीय न्यायालय की स्थापना की गई।
पुनर्जागरण तथा समाज सुधार आन्दोलन
आधुनिक शिक्षा तथा पाश्चात्य देशों के सम्पर्क से आधुनिक शिक्षा प्राप्त लोगों में सामाजिक चेतना जागी। उन्होंने अनुभव किया कि रूढ़िवादिता व अंधविश्वासों के कारण ही भारतीय समाज पिछड़ा हुआ है। इस जागृति के फलस्वरूप भारत में पुनर्जागरण की लहर चल पड़ी और समाज सुधार हेतु अनेक संगठनों ने आन्दोलन चलाए।
राजाराममोहन राय :-
- भारतीय पुनर्जागरण के जन्मदाता। इन्होंने जाति प्रथा, सती प्रथा, मूर्ति पूजा आदि का विरोध किया। ये भारत में पत्रकारिता के जन्मदाता कहे जाते हैं। 1828 ई. में इन्होंने ब्रह्म समाज की स्थापना की। इसका उद्देश्य शाश्वत सर्वाधार अपरिवर्त्य ईश्वर की पूजा थी, जो सारे विश्व का कर्त्ता और रक्षक है। 1833 ई. में ब्रिस्टल (इंग्लैंड) में इनकी मृत्यु हो गई। इस संस्था को 1842 ई. में महर्षि देवेन्द्र नाथ टैगोर ने नवजीवन प्रदान किया। केशव चन्द्रसेन ने आदि ब्रह्म समाज की स्थापना की।
प्रार्थना समाज :-
- 1867 ई. में केशव चन्द्र सेन की प्रेरणा से बम्बई में प्रार्थना समाज की स्थापना की गई। इसके प्रमुख नेता महादेव गोविन्द रानाडे तथा एन. जी. चद्रावरकर थे।
आर्य समाज (1875 ई.):-
- इसके संस्थापक स्वामी दयानन्द थे। स्वामी दयानन्द के गुरु स्वामी विरजानन्द थे। स्वामी दयानन्द तथा उनके गुरु दोनों ही शुद्ध वैदिक परम्परा में विश्वास करते थे। उन्होंने 'पुनः वेदों की ओर चलो' तथा 'हिन्दुओं के लिए भारत' नारा दिया। स्वामी दयानन्द का वास्तविक नाम मूलशंकर था। इनका जन्म 1824 ई. में गुजरात के मौरवी रियासत के निवासी एक ब्राह्मण कुल में हुआ। इन्होंने 1863 ई. में झूठे धर्म़ों की खण्डिनी पताका लहराई। 1875 ई. में प्राचीन वैदिक धर्म की पुनः स्थापना के लिए उन्होंने बम्बई में आर्य समाज की स्थापना की। इन्होंने 'सत्यार्थ प्रकाश' (हिन्दी) नामक पुस्तक लिखी, जिसे आर्य समाज की बाइबिल कहा जाता है। इनके अनुयायी स्वामी श्रद्धांनद ने शुद्धि आन्दोलन प्रारम्भ किया। स्वामी श्रद्धानन्द ने गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना (हरिद्वार) 1902 ई. में की। वैलेन्टाइन शिरोल ने आर्य समाज को भारतीय अशान्ति का जन्मदाता कहा है।
रामकृष्ण मिशन :-
- स्वामी विवेकानन्द ने अपने गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस की स्मृति में 1896 ई. बेलूर (कलकत्ता) में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। 1893 ई. में शिकागों में धर्म़ों की संसद में भाग लेकर इन्होंने पाश्चात्य जगत को भारतीय संस्कृति व दर्शन से अवगत कराया।
थीयोसोफिकल सोसायटी :-
- एक रूसी महिला, मेडम एच. पी. ब्लावेट्स्की (1831-91 ई.) तथा एक अमरीकन सैनिक अफसर कर्नल एच. एस आल्कॉट ने 1875 ई. में संयुक्त राज्य अमेरिका में थियोसोफिकल सोसायटी की स्थापना की। यह 1875 ई.में भारत आए और मद्रास के निकट में आड्यार में इसके मुख्य केन्द्र की स्थापना की। ऐनी बिसेंट ने 1886 ई. में इस सोसायटी में प्रवेश किया और चार साल बाद भारत में बस गई। ऐनी बेसेंट ने बनारस में सेन्ट्रल हिन्दू स्कूल की स्थापना की, जो बाद में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) के रूप में विकसित हुआ।
रहनुमाई माजदायान सभा :-
- पारसियों में धर्म सुधार के लिए 1851 ई. में रहनुमाई माजदायान सभा की स्थापना बम्बई में नौरोजी फरदोनजी, दादाभाई नौरोजी, एम.एस. बंगाली और अन्य लोगों ने की।
सिक्खों में सुधार :-
- उन्नीसवीं सदी के अंत में अमृतसर में खालसा कॉलेज की स्थापना यही से यह आन्दोलन आरम्भ हुआ। यह आंदोलन 1920 ई. में पंजाब में अकाली आन्दोलन से और तेज हो गए। इनका मुख्य उद्देश्य गुरुद्वारों के प्रबन्ध को स्वच्छ बनाना था। अकालियों ने 1922 ई. में नया सिख एक्ट बनाने को विवश किया।
अहमदिया आन्दोलन :-
- 19वीं शताब्दी का यह एक प्रसिद्ध मुस्लिम आन्दोलन था। इसके प्रवर्तक मिर्जा गुलाम अहमद (1839-1908 ई.) थे। यह आन्दोलन पंजाब के गुरुदासपुर जिले के अन्तर्गत कादियां नगर से हुआ।
सर सैयद अहमद :-
- सैयद अहमद 1838 ई. में कम्पनी की नौकरी में आए तथा 1857 ई. के स्वामिभक्त बने रहे। 1857 के बाद उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य और मुसलमानों के बीच बेहतर संबंध बनाने का प्रयास किया। विदेश से लौटने के बाद इन्होंने मुस्लिम समाज की कुरीतियाँ त्याग कर पाश्चात्य शिक्षा ग्रहण करने के लिए प्रेरित किया। 1875 ई. में इन्होंने अलीगढ़ में ऐंग्लो मुस्लिम स्कूल की स्थापना की, जो बाद में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) के रूप में विख्यात हुआ।
अन्य सुधार आन्दोलन :-
- राजा राम मोहन राय ने विलियम बैंटिक के काल में 1829 ई. में अधिनियम द्वारा सती प्रथा को समाप्त कर दिया। बालिका शिशु हत्या को 1765 ई. के बंगाल रेगुलेशन संख्या 21 द्वारा अवैध घोषित कर दिया गया। 1856 ई. के हिन्दू विधवा पुर्नविवाह अधिनियम के द्वारा विधवा विवाह को कानूनी मान्यता दे दी गई। इसमें ईश्वर चन्द्र विद्यासागर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। महाराष्ट्र में केशव करवे ने महिलाओं के उत्थान के लिए बहुमूल्य प्रयास किए। 1899 ई. में पूणे में कर्वे ने एक हिन्दू विधवा गृह की स्थापना की थी। वर्ष 1916 में कर्वे ने बम्बई में एक भारतीय महिला विश्वविद्यालय की स्थापना की। वर्ष 1905 में भारतीय जनता के हितों की रक्षा के लिए गोपाल कृष्ण गोखले ने 'सर्वेन्ट्स ऑफ इंडियन सोसायटी' की स्थापना की। वर्ष 1911 में श्री नारायण राव मल्हार जोशी ने बम्बई में सामाजिक समस्याओं पर विचार के लिए सोशल सर्विस लीग (1910) की स्थापना की।
सत्यशोधाक समाज :-
- इसकी स्थापना ज्योतिबा फुले ने महाराष्ट्र में की। फूले ने मानव के अधिकारों पर एवं जाति प्रथा के उन्मूलन पर जोर दिया। 1851 ई. में पूना में अछूतों के एक स्कूल की स्थापना की गई। उन्होंने 1917 ई. में अब्राह्मणों के हितों के प्रसार के लिए जस्टिस (न्याय) नामक एक समाचार-पत्र प्रारम्भ किया। वर्ष 1932 में गाँधीजी ने अखिल भारतीय हरिजन संघ की स्थापना की।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
- 1876 ई. में स्थापित इण्डियन एशोसियेशन (सुरेन्द्र नाथ बनर्जी द्वारा) को भारत का कांग्रेस से पूर्व प्रथम महत्वपूर्ण राजनीतिक संगठन माना जाता है।
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना का श्रेय एक सेवानिवृत्त अंग्रेज प्रशासक ए.ओ.ह्यूम को दिया जाता है। तथा तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड डफरिन के सहयोग से दिसम्बर, 1885 में बम्बई के सर गोकुल दास तेजपाल भवन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का आयोजन किया गया। इसकी अध्यक्षता डब्ल्यू.सी. बनर्जी ने की तथा इसमें 72 प्रतिनिधि शासन थे। सचिव ए.ओ. ह्यूम थे।
कांग्रेस के अधिवेशन
सन् | स्थान | अध्यक्ष |
1885 | बम्बई | व्योमेश चन्द्र बनर्जी |
1886 | कलकत्ता | दादाभाई नौरोजी |
1887 | मद्रास | बदरूद्दीन तैयबजी |
1888 | इलाहाबाद | जार्ज यूले |
1889 | बम्बई | विलियम वेडरबर्न |
1890 | कलकत्ता | फिरोजशाह मेहता |
1891 | नागपुर | वी. आनन्द चार्लू |
1892 | इलाहाबाद | व्योमेश चन्द्र बनर्जी |
1893 | लाहौर | दादाभाई नौरोजी |
1894 | मद्रास | अल्फ्रेड वेव |
1895 | पूना | सुरेन्द्र नाथ बनर्जी |
1896 | कलकत्ता | रहीमतुल्ला सायानी |
1897 | अमरावती | शंकरन नायर |
1898 | मद्रास | आनन्द मोहन बसु |
1899 | लखनऊ | रमेशचन्द्र दत्त |
1900 | लाहौर | नारायण गणेश चंदावरकर |
1901 | कलकत्ता | दिनशा इदुलची वाचा |
1902 | अहमदाबाद | सुरेन्द्र नाथ बनर्जी |
1903 | मद्रास | लाल मोहन घोष |
1904 | बम्बई | सर हेनरी कॉटन |
1905 | बनारस | गोपाल कृष्ण गोखले |
1906 | कलकत्ता | दादाभाई नौरोजी |
1907 | सूरत (स्थागित) | रास बिहारी घोष |
1908 | मद्रास | रास बिहारी घोष |
1909 | लाहौर | मदन मोहन मालवीय |
1910 | इलाहाबाद | विलियम वेडर बर्न |
1911 | कलकत्ता | विशन नारायण दत्त |
1912 | बांकीपुर | रंगनाथ नृसिंह मुधोलकर |
1913 | करांची | नवाब सैयद मुहम्मद बहादुर |
1914 | मद्रास | भूपेन्द्र नाथ बसु |
1915 | बम्बई | सत्येन्द्र प्रसाद सिन्हा |
1916 | लखनऊ | अम्बिका चरण मजूमदार |
1917 | कलकत्ता | ऐनी बेसेंट |
1918 | बम्बई | सैयद इमाम हसन |
1918 | दिल्ली | मदन मोहन मालवीय |
1919 | अमृतसर | मोती लाल नेहरू |
1920 | नागपुर | चक्रवर्ती विजय राघवाचार्य |
1920 | कलकत्ता | लाला लाजपत राय |
1921 | अहमदाबाद | अजमल खाँ |
1922 | गया | चितरंजन दास |
1923 | काकोनाड़ा | मोहम्म्द अली |
1923 | दिल्ली | अबुल कलाम आजाद |
1924 | बेलगाँव | महात्मा गाँधी |
1925 | कानपुर | सरोजनी नायडू |
1926 | गुवाहाटी | श्रीनिवास अयंगर |
1927 | मद्रास | डॉ. अन्सारी |
1928 | कलकत्ता | मोती लाल नेहरू |
1929 | लाहौर | जवाहर लाल |
1931 | कराँची | सरदार पटेल |
1932 | दिल्ली | रणछोड़मल अमृतलाल |
1933 | कलकत्ता | नैल्ली सेन गुप्ता |
1934 | बम्बई | राजेन्द्र प्रसाद |
1936 | लखनऊ | जवाहर लाल नेहरू |
1937 | फैजपुर | जवाहर लाल नेहरू |
1938 | हरिपुरा | सुभाषचन्द्र बोस |
1939 | त्रिपुरा | सुभाषचन्द्र बोस |
1940 | रामगढ़ | अबुल कलाम आजाद |
1946 | मेरठ | जे. बी. कृपलानी |
उदारवादी चरण (1885-1905 ई.)
- इस चरण में कांग्रेस की मुख्य भूमिका भारतीय राजनीतिज्ञों को एकता व प्रशिक्षण के लिए एक मंच प्रदान करने के रूप में थी।
- इस युग में कांग्रेस पर दादाभाई नौरोजी, फिरोज शाह मेहता, दिनशा वाचा, व्योमेश चन्द्र बनर्जी, गोपाल कृष्ण गोखले आदि लोगों का वर्चस्व था।
प्रमुख उपलब्धियां :-
- जनता में राष्ट्रीयता की भावना जगायी, लोकतंत्र एवं राष्ट्रवाद की भावना को लोकप्रियता, ब्रिटिश साम्राज्यवाद शोषक चरित्र का खुलासा, राष्ट्रीय स्तर पर समान राजनीतिक आर्थिक कार्यक्रम, इंडियन कौंसिल एक्ट 1892 पारित आदि।
अनुदारवादी चरण (1905-1919 ई.)
- इस चरण के मध्य कांग्रेस में नए लोगों का प्रवेश हुआ, जिसमें लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, विपिन चन्द्रपाल, अरविंद घोष तथा लाला लाजपत राय आदि प्रमुख थे। इन्होंने सरकार के समक्ष स्वराज्य की मांग रखी।
- उनका मत था, कि भारतीयों को मुक्ति स्वयं अपने प्रयासों से प्राप्त करनी होगी। नरमपंथियों की इस मान्यता को भारत अंग्रेजों के कृपापूर्ण मार्गदर्शन और नियंत्रण में ही प्रगति कर सकता है मानने से इंकार कर दिया।
सूरत अधिवेशन (1907 ई.) :-
- 1907 ई. में कांग्रेस के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस नरमपंथी और गरमपंथी दो अलग-अलग गुटों में विभक्त हो गया।
बंगाल विभाजन (1905 ई.) :-
- वायसराय लार्ड कर्जन ने देशभक्ति के उफनते सैलाब को रोकने के लिए राष्ट्रीय गतिविधियों के केन्द्र बंगाल को 20 जुलाई, 1905 ई. को दो प्रान्तों पश्चिम बंगाल (बिहार, उड़ीसा) व पूर्वी बंगाल में विभाजन का निर्णय लिया।
स्वदेशी तथा बहिष्कार आन्दोलन (1905 ई.) :-
- इस आन्दोलन के दौरान लोगों ने सामूहिक रूप से विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना प्रारम्भ कर दिया। विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई। लोगों ने विदेशी पदवियों आदि का त्याग कर दिया।
- कड़े विरोध के कारण 1911 ई. में सरकार को बग-भंग का आदेश वापस लेना पड़ा। यह निर्णय जार्ज पंचम के दिल्ली दरबार (1911 ई.) में लिया गया, जो 1912 ई. में लागू हो गया।
मुस्लिम लीग (1906 ई.) :-
- 30 दिसम्बर, 1906 को ढ़ाका में भारतीय मुसलमानों में अंग्रेजी सरकार के प्रति वफादारी लाने के उद्देश्य से ब्रिटिश समर्थक मुसलमानों ने नवाब की अध्यक्षता में मुस्लिम लीग की स्थापना की।
- वर्ष 1908 में आगा खाँ को मुस्लिम लीग का स्थायी अध्यक्ष बनाया गया।
- 1916 ई. में लखनऊ समझौते के पश्चात् कांग्रेस व मुस्लिम लीग ने एक ही मंच पर कार्य करने का निर्णय किया।
दिल्ली दरबार (1911 ई.) :-
- तत्कालीन वायसराय लॉर्ड हार्डिंग ने 1911 ई. में सम्राट जार्ज पंचम तथा महारानी मेरी को भारत बुलाया और दिल्ली में भव्य दरबार का आयोजन करवाया। इसी दरबार में बंगाल विभाजन को रद्द करने तथा राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानान्तरित करने (1912 ई.) की घोषणा की गई।
- पश्चिमी तथा पूर्वी बंगाल को फिर से एक करने का बिहार और उड़ीसा नाम के प्रान्त के निर्माण की घोषणा भी हुई।
लखनऊ समझौता (1916 ई.) :-
- कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में महात्मा गाँधी, सरोजिनी नायडू, अबुल कलाम आजाद आदि नेताओं के प्रयासों से कांग्रेस और मुस्लिम लीग में समझौता हो गया।
होमरूल आन्दोलन (1916 ई.) :-
- एनी बेसेंट द्वारा आयरिश होमरूल लीग के आधार पर भारत में होमरूल आन्दोलन आरम्भ किया गया।
- अप्रैल,1916 में तिलक ने बेलगाँव (महाराष्ट्र) में होमरूल लीग का गठन किया। इसकी गतिविधियां मध्य प्रान्त, महाराष्ट्र (बम्बई को छोड़कर), कर्नाटक एवं बरार तक सीमित थी।
- सितम्बर, 1916 में एनीबेसेंट ने मद्रास में अपना होमरूल लीग आरम्भ किया।
- होमरूल आन्दोलन का उद्देश्य था, कि जनता को शिक्षित किया जाए और कांग्रेस को अपने आन्दोलन तथा एकमात्र उद्देश्य के लिए आधार बनाने में सहायता दी जाए। इनका उद्देश्य सरकार पर दबाव डालकर भारत को स्वशासन दिलाना था।
रॉलेक्ट एक्ट एवं जालियावाला बाग हत्याकांड :-
- वर्ष 1919 में देश में फैल रही राष्ट्रीयता की भावना एवं क्रांतिकारी गतिविधियां को कुचलने के लिए ब्रिटेन को पुनः शक्ति की आवश्यकता थी। इस संदर्भ में सर सिडनी रॉलेट को नियुक्त किया गया।
- इस रॉलेट बिल को जनता ने काला कानून नाम दिया था।
- इसके विरोध में गाँधीजी ने 30 मार्च और 6 अप्रैल, 1919 को देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया। बम्बई में सत्याग्रह सभा का गठन किया गया और सत्याग्रह नामक गैरकानूनी पत्र का प्रकाशन आरम्भ हो गया।
- रॉलेट एक्ट विरोधी जनसभाओं में पंजाब के जनप्रिय नेताओं सत्यपाल एवं सैफुद्दीन किचलू को भाषण देने की मनाही सरकार ने कर दी और 10 अप्रैल, 1919 को इन्हें गिरफ्तार भी कर लिया गया।
- भारतीय नेताओं की गिरफ्तारी के विरुद्ध 13 अप्रैल, 1919 की दोपहर को जलियावाला बाग में एक सभा का आयोजन किया गया।
- जनरल डायर 150 सशत्र सैनिकों समेत वहाँ पहुँचा। डायर ने सैनिकों को वहाँ एकत्र भीड़ पर गोली चलाने का आदेश दिया।
- इस गोलीकांड में हजारों लोग मारे गए। इस हत्याकांड के विरोध में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रदान की गई ‘नाइटहुड’ की उपाधि लौटा दी।
- कांग्रेस के बार-बार आग्रह और सर्वव्यापी असंतोष को देखे हुए इस हत्याकांड की जांच के लिए अक्टूबर, 1919 में सरकार ने हंटर कमेटी के गठन की घोषणा की। इस कमेटी के अनुसार इस कांड में सरकार का कोई दोष नहीं था।
क्रांतिकारी आन्दोलन
- यूरोपियों की प्रथम राजनैतिक हत्या 22 जून, 1897 को पूना में हुई इसमें प्लेग समिति के प्रधान श्री रैंड तथा लेफ्टिनेंट एयर्स्ट की हत्या चापेकर बंधुओं (दामोदर और बालकृष्ण) ने कर दी। इन दोनों को सरकार ने फांसी की सजा दी।
- इसी कांड के पक्ष में लेख लिखने के कारण तिलक को 18 माह के कारावास की सजा भी दी गई थी। जून, 1908 में पुनः राजद्रोह के आरोप में तिलक को छः वर्ष की सजा दी गई।
- वर्ष 1908 मुजफ्फरपुर के एक जज पर प्रफुल्ल चाकी और खुदीराम बोस ने बम से हमला किया। प्रफुल्ल चाकी ने आत्महत्या कर ली तथा खुदीराम बोस को फांसी दे दी गई।
- वर्ष 1912 में वायसराय लार्ड हार्डिंग पर बम फेंका गया। इस कांड के पीछे रास बिहारी बोस की योजना थी। इस कांड में अमीरचंद, अवध बिहारी तथा बसंत कुमार विश्वास को फांसी दी गई।
- वर्ष 1924 में समस्त क्रांतिकारी दलों का कानपुर में एक सम्मेलन बुलाया गया। चन्द्रशेखर आजाद की अध्यक्षता में हिन्दुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन की स्थापना हुई।
- अगस्त, 1925 में क्रांतिकारियों ने सहारनपुर-लखनऊ लाइन पर काकोरी जाने वाली ट्रेन को लूट ली, काकोरी कांड में रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खाँ, राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी और रोशन सिंह को फांसी की सजा दी गई।
- भगत सिंह के नेतृत्व में नवम्बर, 1928 में पुलिस अधिकारी सांडर्स की हत्या कर दी गई। सांडर्स द्वारा किये गए लाठीचार्ज में लाला लाजपतराय की मृत्यु हुई थी।
- 8 अप्रैल, 1929 को सरदार भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त ने सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेम्बली में बहरी ब्रिटिश सरकार को जन आकांक्षाओं से परिचित कराने के लिए बम फेंका। सांडर्स हत्याकांड तथा लाहौर षड्यंत्र के तहत 23 मार्च, 1931 को भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरू को फांसी दे दी गई।
- बंगाल में अप्रैल, 1930 में मास्टर सूर्यसेन ने चटगाँव शास्त्रागार पर धावा बोला तथा अपने को प्रान्तीय स्वतंत्र भारत सरकार का प्रधान घोषित कर दिया। वर्ष 1933 में उन्हें भी फांसी पर लटका दिया गया।
विदेशों में क्रांतिकारी गतिविधियाँ :-
- 1905 ई. में लंदन में श्यामजी कृष्णवर्मा ने इंडियन होमरूल सोसायटी की स्थापना की। सावरकर, सरदार सिंह राणा तथा मदनलाल ढींगरा जैसे क्रांतिकारी इस संगठन से सम्बद्ध थे।
- सर विलियम कर्जन वायली की जून, 1909 में की गई हत्या के आरोप में मदनलाल ढींगरा को फांसी दे दी गई।
- सन् 1913 में लाला हरदयाल ने सैन फ्रांसिस्को (अमेरिका) में गदर पार्टी की स्थापना की।
- गुरुदीप सिंह द्वारा 376 यात्रियों को जलमार्ग द्वारा बैकूबर ले जाने पर कामागाटामारू घटना हुई (1914 ई.)। कामाकाटामारू जहाज का नाम था, जिसे कनाडा में रुकने नहीं दिया गया।
क्रांतिकारियों पर हुए मुकदमे
नासिक षड्यन्त्र केस | 1909 -10 ई. | विनायक सावरकार को निर्वासन, अन्य 26 को कारावास। |
अलीपुर या मानिकतल्ला षड्यंत्र केस। | 1908 ई. | अरिवंद घोष सहित कई व्यक्तियों पर चलाया |
हावड़ा षड्यंत्र केस - | 1910 ई. | जतीन मुखर्जी मुख्य अभियुक्त थे। |
ढ़ाका षड्यंत्र केस - | 1910 ई. | पुलिनदास को 7 वर्ष की सजा, मास्टर अमीन चन्द्र, अवध बिहारी एवं बाल मुकुन्द को फांसी। |
काकोरी षड्यंत्र केस - | 1925 ई. | राम प्रसाद बिस्मिल व अशफाक को फांसी। |
गाँधी युग
गाँधीजी का राष्ट्रीय आन्दोलन में प्रवेश :-
- महात्मा गाँधी (1894-1914 ई.) तक दक्षिण-अफ्रीका में रहने के बाद वर्ष 1915 में भारत आए।
- अहमदाबाद में साबरमती आश्रम की स्थापना की। 1917 ई. में चम्पारन (बिहार) में नील की खेती करने वाले किसानों के प्रति यूरोपियन अधिकारियों के अत्याचारों के विरोध में प्रथम सत्याग्रह किया।
- वर्ष 1920 में गाँधीजी की सलाह पर असहयोग आन्दोलन आरम्भ हुआ। इसके बाद से स्वतंत्रता प्राप्ति तक गाँधीजी राजनीतिक जीवन में बहुत सक्रिय रहे।
खिलाफत आन्दोलन:-
- मुसलमानों की निष्ठा खलीफा के राज्य तुर्की के प्रति थी। वर्ष 1914 में रूस इंग्लैंड और फ्रांस ने तुर्की के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी, जिसमें तुर्की की हार हुई।
- 1919 ई. में तुर्की खलीफा का पद समाप्त कर दिया गया। इससे भारतीय मुसलमानों को गहरा धक्का लगा, फलस्वरूप वर्ष 1919 में भारत में अली बंधुओं (मुहम्मद अली और शौकत अली) ने खिलाफत कमेटी का गठन कर खिलाफत आन्दोलन आरम्भ किया।
- हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित करने का उत्कृष्ट समय समझकर गाँधी जी के नेतृत्व में कांग्रेस ने इसका समर्थन किया।
- 1922 ई. में यह आन्दोलन उस समय स्वतः ही समाप्त हो गया जब मुस्तफा कमाल पाशा के नेतृत्व में तुर्की में खलीफा की सत्ता समाप्त कर दी गई और आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था की शुरुआत की गई।
असहयोग आन्दोलन – (1920-22 ई.) :-
- वर्ष 1920 में कलकत्ता में आयोजित कांग्रेस विशेष अधिवेशन में असहयोग आन्दोलन का निर्णय लिया गया। इसका नेतृत्व गाँधीजी ने किया।
- इस आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य यह था कि जो भी सरकारी, राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक संस्थाएं हैं, उन सबका बहिष्कार कर दिया जाए और इस प्रकार सरकारी मशीनरी को बिल्कुल ही ठप्प कर दिया जाए।
आन्दोलन के कार्यक्रम :-
- उपाधियों एवं प्रशस्ति-पत्रों का परित्याग, सरकारी शिक्षण संस्थाओं का बहिष्कार, कर की अदायगी नहीं करना, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, अदालतों का बहिष्कार आदि।
- 5 फरवरी, 1922 को चौरा-चौरी (जिला-गोरखपुर, उत्तरप्रदेश) नामक स्थान पर हिंसक भीड़ ने थाना जला दिया। इसमें 21 सिपाही जलकर मर गए। इस घटना के बाद महात्मा गाँधी ने 12 फरवरी, 1922 को असहयोग आन्दोलन वापस ले लिया।
स्वराज दल :-
- असहयोग आन्दोलन की वापसी से असंतुष्ट सी. आर. दास, मोतीलाल नेहरू, विट्ठल भाई पटेल आदि ने दिसम्बर, 1922 में स्वराज्य पार्टी बनाई। 1 जनवरी, 1923 को कांग्रेस खिलाफत स्वराज पार्टी की स्थापना हुई। इसे स्वराज दल भी कहा जाता है।
- स्वराज दल का उद्देश्य कौंसिल में प्रवेश कर सरकार के कार्य में अड़ंगा लगाना और अंदर से उसे नष्ट करना था।
- सितम्बर, 1923 में कांग्रेस ने इस दल को मान्यता दे दी।
- वर्ष 1925 में चितरंजन दास की मृत्यु के पश्चात् स्वराज दल कमजोर हो गया।
आन्दोलन का अंतिम चरण
भारत का विभाजन
साइमन कमीशन (1927 ई.) :-
- भारत में प्रशासनिक सुधार की जांच कर अपेक्षित सुधार के लिए रिपोर्ट देने के लिए 1919 के एक्ट के अनुसार 1927 ई. में सर जॉन साइमन की अध्यक्षता में 7 सदस्य (अध्यक्ष सहित) आयोग गठित किया गया, जिसमें कोई सदस्य भारतीय नहीं था।
- यह कमीशन 3 फरवरी, 1928 को बम्बई में आकर उतरा। जहाँ-जहाँ यह कमीशन गया, उसे काले झण्डे दिखाए गए।
- 1928 ई. में लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध प्रदर्शन में पुलिस की लाठी की चोट से घायल होने से ’शेरे पंजाब‘ (लाला लाजपतराय) की मृत्यु हो गई।
- वर्ष 1930 में कमीशन की रिपोर्ट प्रकाशित हुई।
कमीशन की सिफारिशें :-
- प्रान्तों की स्वायतत्ता, साम्प्रदायिक निर्वाचन की व्यवस्था जारी, भारत के लिए संघीय संविधान आदि।
नेहरू रिपोर्ट (1928 ई.) :-
- साइमन कमीशन का बहिष्कार करने पर लार्ड बर्कन हेड ने भारतीयों को संविधान बनाने की चुनौती दी।
- इस पर विचार हेतु 19 मई, 1928 को बम्बई में सर्वदलीय सम्मेलन हुआ। यहाँ पर मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में भारतीय संविधान के मसौदे तैयार करने के लिए एक आठ सदस्य समिति की नियुक्ति हुई।
- इस समिति की रिपोर्ट को ’नेहरू रिपोर्ट‘ के नाम से जाना जाता है।
- रिपोर्ट में ’डोमिनियन स्टेट्स‘ को पहला लक्ष्य तथा ’पूर्ण स्वराज‘ को दूसरा लक्ष्य घोषित किया गया।
जिन्ना फार्मूला (1929 ई.) :-
- नेहरू रिपोर्ट को मुहम्मद अली जिन्ना ने मुस्लिम विरोधी बताया और सितम्बर, 1929 में अपनी रिपोर्ट दी, जिसमें 14 शर्त़ें थी। इसे ही जिन्ना के 14 सूत्र कहा जाता है।
सविनय अवज्ञा आन्दोलन (1930-34 ई.) :-
- सविनय अवज्ञा आन्दोलन का आरम्भ 12 मार्च, 1930 को प्रसिद्ध ’दांडी मार्च‘ के साथ आरम्भ हुआ।
- 14 फरवरी, 1930 को साबरमती में कांग्रेस की एक बैठक में गाँधी जी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आन्दोलन चलाने का निश्चय किया।
दांडी मार्च (1930 ई.) :-
- 12 मार्च, 1930 को गाँधी जी अपने 78 सहयोगियों के साथ साबरमती आश्रम से 200 मील दूर समुद्र तट पर बसे दांडी गाँव में 6 अप्रेल को पहुँचकर नमक बनाया और नमक कानून का उल्लंघन किया।
- उत्तर पश्चिमी सीमा प्रान्त में खान अब्दुल गफ्फार खान के नेतृत्व में खुदई खिदमतगार आन्दोलन (लाल कुर्ती आन्दोलन) चला।
- सपू एवं जयकर के प्रयासों से गाँधी जी एवं इरबिन के मध्य 5 मार्च, 1931 को एक समझौता हुआ, जिसे गाँधी जी को यरवदा जेल से रिहा कर दिया गया।
- कांग्रेस द्वारा सरकार को आश्वासनः सविनय अवज्ञा आन्दोलन वापस, कांग्रेस द्वितीय गोलमेज में भाग लेगी।
- आन्दोलन वापस ले लिया गया परन्तु समझौते की असफलता के बाद आन्दोलन पुनः शुरू हो गया और वर्ष 1934 में अंतिम रूप से इसे समाप्त कर दिया गया।
प्रथम गोलमेज सम्मेलन :-
- 12 सितम्बर, 1930 को लंदन में सम्राट जार्ज पंचम द्वारा इस सम्मेलन का उद्घाटन, अध्यक्षता प्रधानमंत्री रैम्जे मैक्डोनाल्ड ने की।
- कांग्रेस ने इसमें भाग नहीं लिया।
द्वितीय गोलमेज सम्मेलन :-
- 7 सितम्बर, 1931 को प्रारम्भ, कांग्रेस की ओर से गाँधी जी ने भाग लिया।
- एनी बेसेंट और मदन मोहन मालवीय ने व्यक्तिगत रूप से इस सम्मेलन में भाग लिया।
- अल्पसंख्यकों के प्रश्न पर तथा साम्प्रदायिक निर्वाचन पद्धति पर सहमति के अभाव में यह सम्मेलन असफल रहा।
- फ्रांक मोरीस ने गाँधी जी के बारे में कहा, ’अर्द्धनंगे फकीर के ब्रिटिश प्रधानमंत्री से वार्ता हेतु सेण्ट जेम्स पैलेस की सीढ़ियां चढ़ने का दृश्य अपने आप में अनोखा एवं दिव्य प्रभाव उत्पन्न करने वाला था।‘
तृतीय गोलमेज सम्मेलन :-
- 17 नवम्बर, 1932 से प्रारम्भ।
- कांग्रेस के किसी प्रतिनिधि ने भाग नहीं लिया।
श्रम संघ आन्दोलन
- मजदूरों के हित एवं सुविधाओं के लिए प्रयास 1881 ई. (रिपन) में ही प्रारम्भ हो गए थे, जब प्रथम कारखाना कानून बनाया गया तथा दूसरा कारखाना कानून 1891 ई. में पारित हुआ। प्रथम नियमित टेड यूनियन 1918 ई. में मद्रास में टेक्सटाइल लेबर यूनियन के नाम से वी. पी. वाडिया द्वारा शुरू किया गया। 1920 ई. में अखिल भारतीय टेड यूनियन कांग्रेस की स्थापना की गई। इसका पहला सम्मेलन 31 अक्टूबर, 1920 को बम्बई में हुआ, जिसकी अध्यक्षता लाला लाजपतराय ने की।
- एन. एम. जोशी ने एक नए संगठन ऑल इंडिया टेड यूनियन फेडरेशन का गठन किया।
पूना समझौता
- वर्ष 1932 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैक्डोनाल्ड ने साम्प्रदायिक पुरस्कार की घोषणा की। इस घोषणा के तहत प्रत्येक अल्पसंख्यक समुदाय के लिए विधान मण्डल में कुछ सीटे आरक्षित की गई थी।
- इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात थी, कि दलित वर्गां को अल्पसंख्यक करार देकर उन्हें पृथक् निर्वाचन द्वारा प्रतिनिधि चुनने एवं साधारण निर्वाचन में मत देने का अधिकार मिला।
- इस निर्णय द्वारा अंग्रेजी सरकार भारतीय समाज में फूट डालना चाहती थी, इस कारण 20 सितम्बर, 1932 में गाँधी जी ने यरवदा जेल में आमरण अनशन किया।
- अंततोगत्वा मदनमोहन मालवीय तथा राजेन्द्र प्रसाद के प्रयासों से गाँधी जी एवं भीमराव अम्बेडकर के बीच समझौता हो गया। इसे ’पूना समझौता‘ के नाम से जाना जाता है।
कांग्रेस समाजवादी पार्टी :-
- 1933 ई. में नासिक जेल में कांग्रेस के अन्दर एक समाजवादी दबाव समूह बनाने का विचार आया। विचारकों में जय प्रकाश नारायण, अशोक मेहता, मीनू मसानी तथा अच्युत पटवर्द्धन आदि शामिल थे।
- मई, 1934 में ’कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी‘ की स्थापना हुई। आचार्य नरेन्द्र देव इसके प्रथम अध्यक्ष थे तथा पहला सम्मेलन पटना में हुआ।
1937 के चुनाव :-
- 1937 ई. के असेम्बली चुनाव में कांग्रेस ने बहुमत प्राप्त कर कई प्रान्तों में सरकार बनाई।
- भारत को द्वितीय विश्व युद्ध में बिना उद्देश्य बताए शामिल करने के विरोध में 1939 में कांग्रेसी मंत्रिमण्डल ने सामूहिक त्याग पत्र दे दिया।
- इससे मुस्लिम लीग को बहुत प्रसन्नता हुई और उसने 22 दिसम्बर को मुक्ति दिवस मनाया तथा 1940 के लाहौर अधिवेशन में मुसलमानों के लिए पृथक् राष्ट्र पाकिस्तान की मांग की।
- वर्ष 1930 में सर मुहम्मद इकबाल ने सर्वप्रथम द्वि-राष्ट्र सिद्धान्त की बात कही थी। परन्तु पाकिस्तान शब्द का सृजन कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के चौधरी रहमत अली ने किया था।
- ’सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा‘ नामक गीत की रचना मोहम्मद इकबाल ने की थी।
अगस्त प्रस्ताव (1940 ई.) :-
- संवैधानिक गतिरोध को दूर करने के लिए औपनिवेशक स्वराज्य संदर्भ में 8 अगस्त, 1940 को एक प्रस्ताव की घोषणा लार्ड लिनलिथगो ने भारतीयों के लिए की। जिसे अगस्त प्रस्ताव कहते हैं।
व्यक्तिगत सत्याग्रह :-
- द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान राष्ट्रीय आन्दोलन की स्थिरता को तोड़ने के लिए गाँधी जी ने 1940 में व्यक्तिगत सत्याग्रह आरम्भ किया।
- 17 अक्टूबर, 1940 को पवनार में बिनोवा भावे ने सत्याग्रह आरम्भ किया। यह प्रथम सत्याग्रही थे, तथा दूसरे सत्याग्राही जवाहरलाल नेहरू थे।
क्रिप्स मिशन (1942 ई.) :-
- द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारतीयों का सक्रिय सहयोग पाने के उद्देश्य से ब्रिटेन के प्रधानमंत्री चर्चिल ने ब्रिटिश संसद के सदस्य स्टेफोर्ड क्रिप्स की अध्यक्षता में एक मिशन बनाया।
- 23 मार्च, 1942 को क्रिप्स मिशन दिल्ली पहुँचा और 30 मार्च को अपनी योजना प्रस्तुत की।
- एम. एन. राय एवं ए. घोष ने इस योजना पर सकारात्मक प्रतिक्रियाएं व्यक्त की। गाँधी जी ने इसे ’पोस्ट डेटेड चेक’ की संज्ञा दी।
भारत छोड़ो आन्दोलन
- कांग्रेस ने 8 अगस्त, 1942 को ’भारत छोड़ो‘ प्रस्ताव पास किया। इससे पहले गाँधी जी के इस अहिंसक प्रस्ताव को जुलाई, 1942 में वर्धा में कांग्रेस कार्यकारिणी ने स्वीकृति प्रदान कर दी थी।
- गाँधी जी ने बम्बई के ग्वालिया टैंक मैदान में लोगों को ‘करो या मरो’ का नारा दिया।
- 9 अगस्त को सरकार ने कांग्रेस के सभी प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। अंग्रेजों ने इस कार्य को ’ऑपरेशन जीरो आवर‘ की संज्ञा दी।
- मुस्लिम लीग इस आन्दोलन से अलग रही। जिन्ना ने 23 मार्च, 1943 को ’पाकिस्तान दिवस‘ मानने का आह्वान किया।
- पूर्ण समर्थन के अभाव में तथा सरकारी दमन के कारण यह आन्दोलन असफल हो गया।
राजगोपालाचारी फार्मूला (1944 ई.) :-
- सी. राजगोपालाचारी ने 1944 में एक प्रस्ताव तैयार किया। यह प्रस्ताव सी. आर. फार्मूला के नाम से विख्यात है।
- सी. आर. फार्मूला की मुख्य बातें :- मुस्लिम लीग भारत की स्वतंत्रता की मांग का समर्थन करेगी तथा अस्थायी सरकार के गठन में कांग्रेस को सहयोग देगी।
- देश के बंटवारे की स्थिति में आवश्यक विषयों पर आपसी समझौता।
- जिन्ना ने इस प्रस्ताव को अमान्य कर दिया और कहा कि इसमें गाड़ी को घोड़े के आगे लगाया गया है।
वेवेल योजना (1945 ई.) :-
- गवर्नर जनरल लार्ड वेवेल ने ब्रिटिश सरकार से परामर्श के पश्चात्, भारतीय नेताओं के सामने भारतीय समस्या का नवीन हल प्रस्तुत किया। इसे ’वेवल योजना‘ के नाम से जाना जाता है। वर्ष 1945 में उन्होंने अपनी योजना प्रस्तुत की।
- मुख्य प्रावधानः गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी में भारतीय सदस्यों की नियुक्ति, विदेशी विभाग भारतीयों के हाथों में, ब्रिटिश हाई कमिश्नर की नियुक्ति, युद्धोपरान्त भारतीयों द्वारा संविधान का निर्माण, गवर्नर जनरल के निषेधाधिकार पर नियंत्रण आदि।
शिमला समझौता (1945 ई.) :-
- वेवेल योजना पर विचार करने के लिए जून, 1945 में शिमला में एक सम्मेलन का आयोजन किया गया। इसमें कांग्रेस, मुस्लिम लीग, केन्द्रीय विधानसभा यूरोपीयन दल आदि ने भाग लिया। परन्तु जिन्ना ने मुस्लिम लोगों को ही मुसलमानों की एक मात्र संस्था मानते हुए कोई भी समझौता करने से इंकार कर दिया। यह सम्मेलन असफल हो गया।
आजाद हिन्द फौज
- जनवरी, 1941 को सुभाषचन्द्र बोस भारत से निकलकर अफगानिस्तान और इटली होते हुए जर्मनी पहुँचे। इसके बाद जापान गए।
- मार्च, 1942 में टोकियों में रह रहे रास बिहारी बोस ने ’इंडियन नेशनल आर्मी’ के गठन पर विचार के लिए सम्मेलन बुलाया। कैप्टन मोहन सिंह, रास बिहारी बोस एवं निरंजन मिल के सहयोग से ’इंडियन नेशनल आर्मी‘ का गठन किया गया।
- 4 जुलाई, 1943 को सुभाष चन्द्र बोस ने इंडियन लीग की कमान संभाली। सिंगापुर में उन्होंने ‘दिल्ली चलो’ का नारा दिया।
- 21 अक्टूबर को सुभाष चन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फौज और आजाद हिंद सरकार की स्थापना की।
- दूसरे विश्वयुद्ध में जापान की पराजय से आजाद हिन्द फौज को भी पराजित होना पड़ा और 1945 में अंग्रेजों ने इसके अधिकारियों को गिरफ्तार कर लिया।
- कर्नल सहगल, कर्नल ढिल्लो एवं मेजर शाहनवाज खाँ पर राजद्रोह का मुकदमा चला परन्तु लार्ड वेवेल ने अपने विशेषाधिकारों का प्रयोग करके इन्हें मृत्यु दंड से मुक्त कर दिया।
- इस मुकदमें के पक्ष में तेज बहादुर, जवाहर लाल नेहरू, भुलाभाई देसाई तथा के. एन. काटजू ने दलीलें दी।
नौसेना विद्रोह (1946 ई.) :-
- 18 फरवरी, 1946 ई. को बम्बई में नौसेना ने खुला विद्रोह कर ब्रिटिश सम्मान को गहरी चोट पहुंचाई। यह विद्रोह तलवार नामक जहाज से आरम्भ हुआ था। विद्रोह के प्रमुख नेता एम. एस. खान थे।
प्रमुख मांगे :-
- बेहतर भोजन, बेहतर जीवन, भेदभाव का अंत, आजाद हिन्द फौज के कैदियों की रिहाई आदि।
- 23 फरवरी, 1946 को पटेल ने जिन्ना की सहायता से नौ सैनिकों को समर्पण के लिए तैयार कर लिया।
कैबिनेट मिशन (1946 ई.) :-
- ब्रिटेन की एटली सरकार ने भारत को औपनिवेशिक स्वराज प्रदान करने के उद्देश्य से 19 फरवरी, 1946 को कैबिनेट मिशन भारत भेजने की घोषणा की।
- इस मिशन में भारत मंत्री लार्ड पैथिक लॉरेंस, सर स्टैफोर्ड क्रिप्स और ए. बी. अलेक्जेंडर शामिल थे।
कैबिनेट मिशन योजना के मुख्य तथ्य :-
- भारत एक संघ होगा, ब्रिटिश भारत और देशी रियासतों का एक संघ बने, जिसके हाथों में विदेश विभाग, रक्षा तथा यातायात संबंधी रखे अथवा प्रान्तों से।
- मिशन ने पाकिस्तान की मांग को स्वीकार नहीं किया।
- संविधान निर्माण से पूर्व एक अंतरिम सरकार का गठन।
माउन्टबेटन योजना (1947 ई.) :-
- माउण्ट बेटन योजना को ’बाल्कन योजना‘ के नाम से भी जाना जाता है।
- भारत की तत्कालीन स्थिति से चिंतित होकर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एटली ने 20 फरवरी, 1947 को यह घोषणा की कि अंग्रेजी सरकार जून, 1948 ई. के पूर्व सत्ता भारतीयों को सौंप देगी।
- इस घोषणा के तहत 24 मार्च, 1947 ई. को लार्ड माउन्टबेटन वायसराय बने।
- 3 जून, 1947 को उनकी योजना प्रकाशित हुई। इसी के तहत भारत-पाक विभाजन हुआ।
भारतीय स्वतंत्रता अधिनिमय (1947 ई.) :-
- ब्रिटिश पार्लियामेंट ने 4 जुलाई, 1947 को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम प्रस्तावित किया, जो 18 जुलाई, 1947 को स्वीकृत हो गया।
- 14 अगस्त को पाकिस्तान का निर्माण हुआ और ठीक 12 बजे रात्रि को 15 अगस्त, 1947 ई. को भारत स्वतंत्र हुआ। जिन्ना पाकिस्तान के गवर्नर जनरल और लियाकत अली प्रधानमंत्री बने। भारत के गवर्नर जनरल लार्ड माउन्टबेटन और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू बने।
देशी रजवाड़ों का विलय
- 15 अगस्त, 1947 तक कश्मीर, जूनागढ़ और हैदराबाद को छोड़कर सभी देशों रियासतें भारत के साथ (बहावलपुर पाकिस्तान के साथ) विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर के लिए सहमत हो गई थी। इस दस्तावेज में प्रतिरक्षा, विदेशी मामलों तथा संचार के क्षेत्र में केन्द्रीय सत्ता को स्वीकार किया गया था।
- सरदार वल्लभ भाई पटेल ने जुलाई, 1947 में राज्यों के विभाग का प्रमुख बनकर सभी रियासतों को विलय के लिए राजी किया। इसलिए उन्हें भारत का ‘बिस्मार्क’ भी कहा जाता है। इस कार्य में उनकी सहायता वी. पी. मेनन ने की।
- जनमत संग्रह के पश्चात् 20 फरवरी, 1949 को जूनागढ़ भारत में सम्मिलित हो गया। एक पुलिस कार्रवाई के पश्चात् 1 नवम्बर, 1948 को हैदराबाद शामिल हो गया।
- 20 मई, 1946 को कश्मीर के हिन्दू शासक महाराजा हरि सिंह के विरुद्ध कश्मीर छोड़ो आन्दोलन के दौरान ’नेशनल कांग्रेस‘ के नेता शेख अब्दुल्ला को गिरफ्तार कर लिया गया।
- 20 जून, 1946 को थोड़े समय के लिए कश्मीर में प्रवेश निषेध का उल्लंघन करने के आरोप में भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को भी गिरफ्तार कर लिया गया था।
- अक्टूबर, 1947 में पाक समर्थित सीमावर्ती कबालियों द्वारा कश्मीर पर आक्रमण करने के बाद महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्टूबर, 1947 को कश्मीर का भारत में विलय से संबंधित पत्र पर हस्ताक्षर कर दिये।
ब्रिटिशकालीन प्रमुख समाचार पत्र
पत्र-पत्रिका | प्रकाशन वर्ष | संस्थापक | संस्थान | भाषा |
बंगाल गजट | 1780 | जे.के. हिक्की | कलकत्ता | अंग्रेजी |
बंगाल गजट | 1816 | गंगाधार भट्टाचार्य | कलकत्ता | अंग्रेजी |
संवाद कौमुदी | 1821 | राजा राममोहनराय | कलकत्ता | बंगाली |
मिरातुल अखबार | 1822 | राजा राममोहनराय | कलकत्ता | फारसी |
हिन्दू पैट्रियाट | 1853 | गिरीश चंद्र घोष, हरिश्चन्द्र मुखर्जी | कलकत्ता | अंग्रेजी |
सोम प्रकाश | 1859 | ईश्वरचंद्र विद्यासागर | कलकत्ता | बंगाली |
इंडियन मिरर | 1861 | देवेन्द्र नाथ टैगोर, मनमोहन घोष | कलकत्ता | अंग्रेजी |
इन्दु प्रकाश | 1862 | रानाडे | मुम्बई | मराठी |
अमृत बाजार पत्रिका | 1868 | मोतीलाल घोष, शिशिर घोष | कलकत्ता | बंगाली |
बंग दर्शन | 1873 | बंकिम चन्द्र चटर्जी | कलकत्ता | बंगाली |
हिन्दी प्रदीप | 1877 | बालकृष्ण भट्ट | वाराणसी | हिन्दी |
मराठा | 1881 | आगरकर | मुम्बई | अंग्रेजी |
केसरी | 1881 | केलकर | मुम्बई | मराठी |
हिन्दुस्तान स्टैंडर्ड | 1899 | सच्चिदानन्द सिन्हा | दिल्ली | अंग्रेजी |
इंडियन रिव्यू | 1900 | जी.ए. नटेशन | मद्रास | अंग्रेजी |
इंडियन ओपिनियन | 1903 | महात्मा गाँधी | द. अफ्रीका | अंग्रेजी |
इंडियन सोशियोलॉजिस्ट | 1905 | श्यामजी कृष्णवर्मा | लन्दन | अंग्रेजी |
युगान्तर | 1906 | भूपेन्द्र दत्त,बारीन्द्र घोष | कलकत्ता | बंगाली |
प्रताप | 1910 | गणेश शंकर विद्यार्थी | कानपुर | हिन्दी |
अल हिलाल | 1912 | अबुल कलाम आजाद | कलकत्ता | उर्दू |
गदर | 1913 | लाला हरदयाल | सैनफ्रांसिस्को | अंग्रेजी |
कॉमन ह्वील | 1914 | एनी बेसेन्ट | मुम्बई | अंग्रेजी |
न्यू इंडिया | 1914 | एनी बेसेन्ट | अंग्रेजी | मुम्बई |
इंडिपेंडेन्ट | 1919 | मोतीलाल नेहरू | इलाहाबाद | अंग्रेजी |
नवजीवन | 1919 | महात्मा गाँधी | अहमदाबाद | गुजराती |
यंग इंडिया | 1922 | महात्मा गाँधी | अहमदाबाद | अंग्रेजी |
हिन्दुस्तान टाइम्स | 1922 | के.एम. पणिक्कर | मुम्बई | अंग्रेजी |
हरिजन | 1923 | महात्मा गाँधी | पूणे | हिन्दी |


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