भारत की प्राकृतिक वनस्पति


भारत की प्राकृतिक वनस्पति

  • भारत में जलवायु की दृष्टि से काफी विविधता पाई जाती है, फलस्वरूप भारत के विभिन्न जलवायु प्रदेशों में विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक वनस्पति का विकास हुआ है। सामान्यतः ऐसा कहा जा सकता है कि भारत की प्राकृतिक वनस्पति वर्षा का अनुसरण करती है।
  • हिमालय की प्राकृतिक वनस्पति पर ऊँचाई के कारण तापमान में होने वाली कमी का काफी अधिक प्रभाव पड़ा है।
  • इस प्रकार भारत की वनस्पति के विकास पर जलवायु एवं उच्चावच दोनों का ही प्रभाव पड़ा हैं। सामान्यतः भारत में पाई जाने वाली प्राकृतिक वनस्पति को निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किया जा सकता हैं :

(1) उष्ण कटिबन्धीय सदाहरित वनस्पति

  • यह वनस्पति वैसे क्षेत्रों में पाई जाती है, जहाँ वार्षिक वर्षा 200 से.मी. से अधिक होती है। तापमान वर्ष भर ऊँचा (वार्षिक औसत तापमान 22°C) एवं वायु में आर्द्रता 70% से अधिक होती है।

वितरण

  1. उत्तर-पूर्वी भारत
  2. पश्चिमी घाट पर्वत का पश्चिमी ढाल
  3. अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह तथा लक्षद्वीप

विशेषताएँ

  • अधिक वर्षा के कारण वृक्ष काफी सघन एवं सदाहरित रहते हैं।
  • वृक्षों की लंबाई 30 से 60 मीटर तक होती हैं।
  • वृक्षों की लकड़ियाँ काफी कड़ी होती हैं।
  • विभिन्न प्रकार की लताओं, गुल्मों, झाड़ियों आदि को अधिकता के कारण ऐसे वन प्रायः दुर्गम होते हैं।
  • इस प्रकार के वनों में वनस्पतियों एवं जन्तुओं की विविधता काफी अधिक होती हैं।
  • लकड़ियाँ कड़ी होने के कारण ये वन आर्थिक दृष्टि से ज्यादा महत्त्व नहीं रखते हैं।
  • इनका उपयोग जलावन के कार्य में होता है। परंतु यह प्राकृतिक वनस्पति, जैव विविधता एवं पारिस्थितिक दृष्टि से पर्याप्त महत्त्व रखती हैं।
  • रबड़, महोगनी, आबनूस (Ebony), लौह-काष्ठ (Iron wood) ताड़, बाँस, बेंत, सिनकोना आदि के वृक्ष यहाँ पाए जाते हैं।
  • भारत में इस प्राकृतिक वनस्पति का समुचित विदोहन नहीं हुआ है। इसके कई कारण हैं, जैसे - अत्यधिक सघन होना, मिश्रित वृक्षों का पाया जाना, परिवहन सुविधा का अभाव आदि।

(2) उष्ण कटिबंधीय आर्द्र मानसूनी वनस्पति

  • इस वनस्पति का विकास उन क्षेत्रों में हुआ है, जहाँ वर्षा की मात्रा 100 से 200 से.मी. के बीच होती है।
  • इसे पतझड़ का वन भी कहा जाता है।

वितरण

  1. पश्चिमी घाट पर्वत का पूर्वी ढाल
  2. हिमालय की तराई का क्षेत्र
  3. बिहार, उत्तर प्रदेश, आडिशा, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु एवं केरल।
  • शुष्क गर्मी की ऋतु में आर्द्रता की कमी के कारण वृक्ष अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं, ताकि उनकी नमी नष्ट न हो सके।
  • इस वनस्पति प्रदेश में वृक्षों की औसत ऊँचाई सामान्यतः 20 से 45 मीटर होती है।
  • वृक्षों के नीचे झाड़ियाँ, लताओं आदि का अभाव होता हैं।
  • मानसूनी वन आर्थिक दृष्टि से काफी अधिक महत्त्व रखते हैं।
  • इन वनों में सागवान, साल, चंदन, शहतूत, महुआ, आँवला, जामुन कुसुम, शीशम, सबई घास आदि पाए जाते हैं।
  • हाल ही के वर्षों में कृषि फार्मों के विस्तार हेतु इन वनों की काफी कटाई की गई हैं।

(3)  उष्ण कटिबंधीय शुष्क मानसूनी वनस्पति

  • यह वनस्पति उन क्षेत्रों में पाई जाती है। जहाँ वार्षिक वर्षा 70 से 100 से.मी. के बीच होती है।

वितरण : यह वनस्पति मुख्यतः पूर्वी राजस्थान, उत्तरी गुजरात, पश्चिमी मध्य प्रदेश, दक्षिण-पश्चिम उत्तर-प्रदेश, दक्षिणी पंजाब, हरियाणा एवं पश्चिमी घाट पर्वत के वृष्टि छाया प्रदेश में पाई जाती है।

  • वृक्षों की ऊँचाई सामान्यतः 6 से 9 मीटर तक होती है।
  • वृक्षों की जड़ें काफी लंबी होती हैं ताकि वे गहराई से जल प्राप्त कर सकें।
  • अनेक वृक्षों की छाल मोटी, पत्ते मोटे एवं कांटेदार होते हैं, जिससे कि वाष्पीकरण की गति को धीमा किया जा सके।
  • इन वनों में महुआ, बबूल, पलाश, तेंदू, खैर, कीकर, बेर, रीठा, बरगद  पीपल आदि वृक्ष पाए जाते हैं।

(4)  मरुस्थलीय व अर्द्ध-मरुस्थलीय वनस्पति

  • इस प्रकार की वनस्पति 50 से.मी. से कम वर्षा वाले भागों में पाई जाती है।
  • ये वृक्ष, छोटी-छोटी झाड़ियों के रूप में होते हैं। सामान्यतः वृक्षों की अधिकतम ऊँचाई 6 मीटर तक होती है।
  • वृक्षों की जड़े लंबी, पत्तियाँ मोटी एवं कंटीली होती हैं।

वितरण

  1. पश्चिमी राजस्थान, उत्तरी गुजरात
  2. पश्चिमी घाट पर्वत का वृष्टिछाया प्रदेश
  • खेजड़ी, खजूर, नागफनी, बबूल इनके मुख्य वृक्ष हैं।

(5) ज्वारीय वनस्पति

  • इस प्रकार की वनस्पति समुद्री तट एवं निम्न डेल्टाई भागों में पाई जाती है, जहाँ ज्वार के कारण नमकीन जल का फैलाव होता है।
  • भारत में इसका सर्वाधिक विस्तार प. बंगाल में है।
  • यहाँ की मिट्टी दलदली होती है, वृक्षों की जड़े जटा की तरह होती हैं एवं तना को उपर उठाकर रखती हैं।
  • वृक्षों की ऊँचाई 30 मीटर तक होती है एवं वे सदैव हरे-भरे रहते हैं।

वितरण

  1. गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा एवं महानदी, कृष्णा, गोदावरी, कावेरी आदि नदियों के डेल्टाई भाग में
  2. पूर्वी एवं पश्चिमी तट
  • नारियल, ताड़, बेंत, बाँस, सुन्दरी, सोनेरीटा, फोनिक्स आदि वृक्ष यहाँ पाए जाते हैं।
  • सुन्दरी वृक्षों की अधिकता के कारण ही गंगा ब्रह्मपुत्र डेल्टा के मैंग्रोव वन को सुन्दरवन कहा जाता है।
  • तमिलनाडु के तट पर ताड़ एवं केरल के तट पर नारियल के वृक्षों की प्रधानता हैं।

ऊँचाई और वर्षा के वितरण के आधार पर दो प्रकार की वनस्पतियाँ और देखने को मिलती हैं:-

(1) हिमालय क्षेत्र की वनस्पति

  • हिमालय क्षेत्र में वनस्पति के वितरण पर ऊँचाई का महत्त्वपूर्ण प्रभाव है, क्योंकि ऊँचाई बढ़ने के साथ-साथ तापमान में कमी आती है।
  • अतः यहाँ उष्ण कटिबंधीय वनस्पति से लेकर टुंड्रा वनस्पति की पेटियाँ पाई जाती हैं।
  • हिमालय का पूर्वी भाग कर्क रेखा एवं समुद्र के अधिक निकट है, साथ ही इस भाग में वर्षा अधिक होती है।
  • हिमालय का पश्चिमी भाग न केवल कर्क रेखा से अधिक उत्तर है, बल्कि यहाँ महाद्वीपीय जलवायु का भी प्रभाव है।
  • इस भाग में वर्षा की मात्रा भी कम है।
  • यही कारण है कि इन दोनों भागों की वनस्पति की पेट्टियों की ऊँचाई एवं सघनता में अंतर देखने को मिलता हैं।

(2) आर्द्र उपोष्ण पहाड़ी वनस्पति

  • इन वनस्पति प्रायद्वीपीय भारत में 1070 से 1500 मीटर की ऊँचाई पर पाई जाती है।
  • यह वनस्पति सदाबहार होती है।
  • वृक्षों की लकड़ियाँ लगभग मुलायम होती हैं।
  • वितरण : पश्चिमी घाट, पूर्वी घाट, सतपुड़ा, महादेव एवं मैकाल, नीलगिरी, कार्डामम एवं अन्नामलाई की पहाड़ियों पर इस प्रकार की वनस्पति का विस्तार हैं।
  • इन वनों को ‘शोलास’ (Sholas) के नाम से जाना जाता हैं।
  • मैग्नोलिया, लारेल, यूक्लिप्टस, एल्म आदि वृक्ष पाए जाते हैं।

(3) अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह

क्षेत्रीय आधार पर हिमालय की वनस्पतियों का विभाजन :-

(1) पूर्वी हिमालय क्षेत्र की वनस्पति

(क) उष्ण कटिबंधीय आर्द्र पर्णपाती वन

  • यह वनस्पति 900 मीटर की ऊँचाई तक पाई जाती है। 
  • साल, शीशम, सागवान, बाँस एवं सबई घास आदि महत्त्वपूर्ण वनस्पतियाँ हैं।

(ख)  उपोष्ण वनस्पति

  • यह वनस्पति 900 से लेकर 1830 मीटर की ऊँचाई में पाई जाती है।
  • ओक, चेस्टनट आदि वृक्ष यहाँ पाए जाते हैं।

(ग)  शीतोष्ण वनस्पति

  • इस वनस्पति की पेटी का विस्तार 1830 मीटर से लेकर 2740 मीटर की ऊँचाई तक पाया जाता है।
  • इस पेटी में ओक, बर्च, मैपिल, मैग्नेलिया, एल्डर, लारेल जैसी चौड़ी पत्तियों के वन पाए जाते हैं।

(घ) शीत शीतोष्ण वनस्पति 

  • यह वनस्पति 2740 मीटर से लेकर 3660 मीटर की ऊँचाई तक पाई जाती है।
  • चीड़, स्प्रूस, देवदार जैसी नुकीली पत्तियों वाले वृक्ष इस पेटी में पाए जाते हैं।
  • यह शंकुधारी वनों की पेटी है।
  • इन वृक्षों की लकड़ियाँ मुलायम होती हैं। 

(ड़) अल्पाइन वनस्पति

  • यह वनस्पति 3660 मीटर से लेकर 4876 मीटर के बीच पाई जाती है।
  • इस पट्टी में सिल्वर, फर, जूनीपर आदि वृक्ष पाए जाते हैं।

(च) टुंड्रा वनस्पति

  • यह वनस्पति 4876 मीटर से लेकर 6100 मीटर की ऊँचाई तक पाई जाती है।
  • इस भाग में छोटी झाड़ियाँ, घास, काई एवं फूल वाले पौधे पाए जाते हैं।
  • ग्रीष्म ऋतु में बर्फ के पिघलने पर अल्पाइन झाड़ियों एवं अन्य पौधों में फूल निकल आते हैं एवं घास के उगने से चरागाह का विकास हो जाता है।

(2)  पश्चिमी हिमालय की वनस्पति

  • पश्चिमी हिमालय तुलनात्मक रूप से शुल्क एवं ठंडा होने के कारण पूर्वी हिमालय की वनस्पतियों से भिन्नता रखता है।
  • पूर्वी हिमालय के विपरीत पश्चिमी हिमालय में परजीवी पौधों एवं फर्न का अभाव पाया जाता है।
  • पर्वत पाद (Foot-hill) क्षेत्र में मुख्यतः शुष्क सवाना वनस्पति का विस्तार विशाल क्षेत्रों में देखने को मिलता है।

भारत वन स्थिति रिपोर्ट-2019

  • ब्रिटिश काल में भारत की पहली राष्ट्रीय वन नीति 1894 ई. में प्रकाशित हुई।
  • देश में कुल वन आवरण 7,12,249 वर्ग किमी. है जो भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 24.67 प्रतिशत है जिसमें से-

अत्यधिक सघन वन

3.02 प्रतिशत

मध्य सघन वन

9.39 प्रतिशत

खुले वन

9.26 प्रतिशत

कुल वन आवरण

21.67 प्रतिशत

झाड़ियाँ

1.41 प्रतिशत

वन रहित क्षेत्र

76.29 प्रतिशत

देश का कुल क्षेत्रफल

100 प्रतिशत

वन रिपोर्ट 2019 के मुख्य बिन्दु

  • सन् 1987 भारतीय वन सर्वेक्षण विभाग देहरादून द्वारा प्रत्येक 2 वर्षों में वन रिपोर्ट प्रकाशित की जाती है। इसी क्रम में 16 वीं वन रिपोर्ट 30 दिसम्बर, 2019 में प्रकाशित हुई।
  • भारत सरकार के पर्यावरण - वन जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के प्रभारी मंत्री प्रकाश जावड़ेकर द्वारा रिर्पोट प्रकाशित की गई। इस रिपोर्ट के अनुसार देश के 8.073 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर वन आवरण है जो देश के 24.56 प्रतिशत भाग पर है। वर्ष 2017 की तुलना में (5188 वर्ग किमी.) क्षेत्र पर वन वृद्धि हुई है। सर्वाधिक वन वृद्धि कर्नाटक (1025 वर्ग किमी.), आन्ध्रप्रदेश (990 वर्ग किमी.), केरल (823 वर्ग किमी.), जम्मू एवं कश्मीर (371 वर्ग किमी.), हिमालय प्रदेश (334 वर्ग किमी.) राज्यों में रही हैं।

क्षेत्रवार के अनुसार वनावरण की स्थिति

  राज्य

  क्षेत्रफल (किमी.)

  प्रतिशत %

 

2017

2019

2017

2019

मध्य प्रदेश

77,414

77482

25.11%

25.14%

अरुणाचल प्रदेश

66,964

66688

79.96%

79.63%

छत्तीसगढ़

55,547

55611

79.96%

41.13%

ओडिशा

50,682

51619

16.47:

41.13%

 

न्यूनतम वनावरण क्षेत्रफल

  राज्य

  क्षेत्रफल (किमी.)

  प्रतिशत %

 

2017

2019

2017

2019

हरियाणा

1588

1602

3.59%

3.62%

पंजाब

1837

1849

3.65%

3.67%

गोवा

2229

2237

60.21%

60.43%

सिक्किम

3344

3342

47.13%

47.10%

बिहार

7299

7306

7.75%

7.76%

  •    जबकि सर्वाधिक वन क्षेत्र मध्यप्रदेश (77482 वर्ग किमी.), अरुणाचल प्रदेश (66688 वर्ग किमी.) छत्तीसगढ़ (55611 वर्ग किमी.), ओडिशा (51619 वर्ग किमी.), तथा सर्वाधिक वन प्रतिशत लक्षद्वीप (90.33%), मिजोरम (85.41%), अण्डमान निकोबार (81.74%), अरुणाचल प्रदेश (79.63%), मेघालय (76.33%) प्रमुख राज्य हैं।
  • भारत में मेंग्रोव वन क्षेत्र 2019 में 4975 वर्ग किमी. का विस्तार हुआ है। जो 2017 की तुलना में 54 किमी. बढ़ा है।
  • स्वतंत्र भारत की पहली राष्ट्रीय वन नीति वर्ष 1952 में प्रकाशित की गई।

प्रशासनिक आधार पर वनों का वर्गीकरण -

  1. सुरक्षित वन (Reserved Forest) - इन वनों को काटना हानिकारक होता है इसलिए इन वनों के काटने पर रोक लगा दी जाती है।
  2. संरक्षित वन (Protected Forest) - पशुओं को चराने व लकड़ी काटने की सुविधा किन्तु कड़ा नियंत्रण ताकि वनों को नुकसान न हो।
  3. अवर्गीकृत वन - (Unclassified forests) - इनमें लकड़ी काटने व पशु चराने पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं रहता है।
  • टिम्बर रेखा - वह सीमा है जिसके आगे किसी क्षेत्र में वृक्षों का विकास नहीं हो सकता है। अक्षांश में वृद्धि के साथ टिम्बर रेखा की ऊँचाई में कमी आती है। किसी पर्वत के सूर्याभिमुख ढाल की तुलना में सूर्य विमुख ढाल पर टिम्बर रेखा की ऊँचाई कम होती है।
  • भारत में साल के वन - हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा से लेकर असम के नवेगाँव जिले में हिमालय के निचले ढालों व तराई प्रदेश में विस्तृत रूप से पाए जाते हैं इसके अलावा झारखण्ड, छत्तीसगढ़, आडिशा व उत्तरी तमिलनाडु में भी पाए जाते हैं। भारत में ये 106500 वर्ग किमी. क्षेत्र में फैले हैं।

(i) वन सम्पदा

  • एक अनुमान के अनुसार भारत में पौधों की 45,000 प्रजातियाँ पाई जाती हैं, इनमें से 5000 प्रजातियाँ ऐसी हैं जो केवल भारत में ही पाई जाती हैं।
  • भारत में जीव-जंतुओं की 75,000 प्रजातियाँ पाई जाती हैं। पक्षियों के प्रजातियों की संख्या लगभग 2000 हैं।
  • भारत में पाए जाने वाले वनों में 3% शंकुधारी व 97% चौड़ी पत्ती वाले हैं।
  • सुरक्षित वनों में लकड़ी काटना या पशु चराना वर्जित होता है।
  • संरक्षित वनों में कुछ नियंत्रणों के अधीन लकड़ी काटने एवं पशु चराने की अनुमति होती है।

भारत में भौगोलिक प्रदेशों के आधार पर वनों का वितरण -

भौगोलिक प्रदेश  

  1. हिमालय प्रदेश  
  2. विशाल मैदान   
  3. प्रायद्वीपीय पहाड़ियाँ एवं पठार 
  4. पश्चिमी घाट एवं तटीय प्रदेश
  5. पूर्वी घाट एवं तटीय प्रदेश  

 कुल  24.39% लेकिन

  • पारिस्थितिकी की दृष्टि से भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के 33% भाग पर वनों का होना आवश्यक है।
  • इसके लिए पर्वतीय क्षेत्रों में 60% भूमि पर एवं मैदानी क्षेत्रों में 20% भूमि पर वन अनिवार्य हैं।
  • भारत में वनों का वितरण काफी असंतुलित है। एक और अंडमान निकोबार द्वीप समूह में 80% से भी अधिक भू-भाग पर वन पाए जाते हैं, तो दूसरी और हरियाणा में 4% से भी कम भू-भाग पर वनों का विस्तार है।
    उ. पू. भारत में 21%
    उ. प. भारत में 11%
    दक्षिणी भारत में 19%
    मध्यवर्ती भारत में 30% भू-भाग पर वन पाए जाते हैं।
  • भारत के वनों में एक प्रकार के वृक्ष एक समूह में नहीं मिलते हैं, अतः उनके विदोहन में समस्या आती है। इसके अलावा भारत के करीब 25% वन पहुँच के बाहर हैं।

भारतीय वनों से प्राप्त होने वाली वस्तुएँ

(1) मुख्य उपजें : वर्तमान समय में भारत में औद्योगिक एवं ईंधन की लकड़ियों को मिलाकर प्रति वर्ष 30 अरब प्राप्त होते हैं। वन उत्पादों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण गोल-काष्ठ (Timber) है। इसके पश्चात जलावन की लकड़ी का स्थान आता है।

(i) सागवान

  • यह मुख्य रूप से मध्य प्रदेश के पश्चिमी एवं मध्यवर्ती भाग (जबलपुर, होशंगाबाद); महाराष्ट्र के उत्तरी कनारा, चांदा एवं खानदेश, राजस्थान के बाँसवाड़ा में पाया जाता है। इसके अलावा यह तमिलनाडु, ओडिशा, बिहार एवं असम में भी पाया जाता है। सागवान का सर्वाधिक क्षेत्रफल म.प्र. में है।
  • इस लकड़ी की कठोरता औसत एवं वजन मध्यम होता है। यह काफी टिकाऊ लकड़ी है जिसके रेशे सुंदर होते हैं।
  • इसका उपयोग फर्नीचर, जहाजरानी आदि उद्योगों में होता हैं।

(ii)   साल

  • साल का सर्वाधिक क्षेत्रफल मध्य प्रदेश में है।
  • इसके अलावा साल के वन संपूर्ण तराई क्षेत्र में पाए जाते हैं।
  • इसकी लकड़ी कठोर एवं टिकाऊ होती है, जिसका प्रयोग रेलवे स्लीपर, इमारती लकड़ी के रूप में होता है।

(iii) आबनूस (Ebony)

  • यह काले रंग की मजबूत, कठोर एवं टिकाऊ लकड़ी है।
  • यह मुख्यतः पश्चिमी घाट क्षेत्र में पाई जाती है।
  • इसके अधिकांश भाग का निर्यात कर दिया जाता है।

(iv) शीशम

  • यह मुख्यतः उत्तर प्रदेश, बिहार, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश एवं पश्चिम बंगाल में पाई जाती है।
  • यह कठोर लकड़ी है, जिसका प्रयोग फर्नीचर, रेलगाड़ी के डिब्बे, दरवाजे, खिड़की बनाने में होता हैं।

(v) चंदन

  • यह मुख्यतः दक्षिण भारत (कर्नाटक एवं तमिलनाडु) में पाया जाता है।
  • इसकी लकड़ी कठोर एवं सुगंधित होती है। इसका धार्मिक महत्त्व है। इससे तेल निकाला जाता है। चन्दन की लकड़ी का उपयोग सजावट की सामग्री व अगरबत्ती आदि बनाने में किया जाता है।

(vi) देवदार

  • यह हिमालय क्षेत्र में 1700 से 2500 मीटर की ऊँचाई पर पाया जाता है।
  • इसकी लकड़ी कठोर, सुगंधित एवं टिकाऊ होती है। इसकी लकड़ी से तेल भी निकाला जाता है।

(vii) चीड़

  • इस पेड़ की लकड़ी हल्की होती है जिसका उपयोग चाय की पेटी, नाव, पैकिंग के डिब्बे आदि बनाने में किया जाता हैं।
  • इस पेड़ से तारपीन का तेल एवं रेजीन प्राप्त किया जाता है।

गौण उपजें : भारतीय वनों से 3000 से भी अधिक प्रकार की गौण वस्तुएँ प्राप्त की जाती हैं, जिनका मूल्य 9 अरब से भी अधिक हैं।

  • भारत विश्व में लाख का सबसे बड़ा उत्पादक है। बिहार भारत का सबसे बड़ा लाख उत्पादक राज्य है।
  • भारत के कुल राष्ट्रीय आय में वनों का योगदान मात्र 2% है।
  • मैंग्रोव के वन समुद्र के फैलाव को रोकने में महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं।

भारत के जैव भौगोलिक प्रदेश

  • भारत को 10 जैव भौगोलिक क्षेत्रों में विभाजित किया गया हैं।

(ii) वन्य जीव व पारिस्थितिकी

वर्ग  

  • जैव - मंडल   
  • राष्ट्रीय उद्यान   
  • अभयारण्य 
  • जैविक उद्यान   
  • टाइगर रिजर्व

जैव-मंडल

  • भारत में जैविक विविधता के संरक्षण हेतु 18 जीव मंडल आरक्षित क्षेत्र स्थापित किए जा चुके हैं।
  • सर्वप्रथम वर्ष 1986 में तमिलनाडु कर्नाटक, केरल में संयुक्त रूप से नीलगिरि क्षेत्र में जीव आरक्षित क्षेत्र स्थापित किया गया।
  1. नीलगिरि (तमिलनाडु-केरल)
  2. नंदादेवी (उत्तराखंड) 1986
  3. नोकरेक (मेघालय) 1988
  4. सुन्दरवन (पश्चिमी बंगाल)
  5. मन्नार की खाड़ी (तमिलनाडु)
  6. ग्रेट निकोबार (अंडमान-निकोबार)
  7. पंचमढ़ी (मध्यप्रदेश)
  8. कंचनजंघा (सिक्किम)
  9. अगस्तमलाई (केरल-तमिलनाडु-कर्नाटक)
  10. डिब्रू-साइखोवा (असम)
  11. देहांग-देबांग (अरुणाचल प्रदेश)
  12. सिमलीपाल (मयूरभंज-ओडिशा)
  13. काजीरंगा (असम)
  14. मानस  (असम)
  15. अचनकमार-अमरकंटक (मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़)
  16. कोल्ड डेजर्ट (हिमाचल प्रदेश) में जीवमंडल आरक्षित क्षेत्र स्थापित किए जा चुके हैं।
  17. शेषाचलम - (आंध्रप्रदेश)
  18. पन्ना - मध्यप्रदेश

वन एवं वन्यजीव

बाघ-परियोजना

  • वर्ष 1969 में अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति एवं प्राकृतिक संघटन संरक्षण संघ (IUCN) के 10वें अधिवेशन में यह निर्णय लिया गया, कि बाघों को संपूर्ण सुरक्षा दी जाए।
  • भारत ने भी इसके पश्चात इस लुप्त होती प्रजाति की सुरक्षा व उसके संवर्द्धन के लिए 1 अप्रैल, 1973 को जिम कार्बेट (उत्तराखंड) राष्ट्रीय उद्यान में बाघ परियोजना की शुरुआत की। इसके लिए विश्व वन्य जीव कोष (WWF) से सहायता प्राप्त हो रही है।
  • जिम कार्बेट  (उत्तराखंड)   दूधवा (उत्तर प्रदेश)
    नामदाफा (अरुणाचल प्रदेश)  सरिस्का (राजस्थान)
    रणथंभौर (राजस्थान)    कान्हा किसली (मध्यप्रदेश)
    चद्रप्रभा (उत्तर प्रदेश)    नंदनकानन (ओडिशा)
    बांदीपुर (कर्नाटक)    शिवप्रभा (मिर्जापुर-उत्तर प्रदेश)
    पेरियार (केरल)   सुन्दरवन (पश्चिम बंगाल)
    सिमलीपाल (ओडिशा)  बांधवगढ़ (मध्य प्रदेश)
    पलामू (झारखंड)    नागार्जुन सागर (आन्धप्रदेश)
    पाकुई-बामेरी (अरुणाचल प्रदेश)  बोरी-सतपुड़ा (मध्यप्रदेश)
    भद्रावती (कर्नाटक)   पेंच (महाराष्ट्र)
  • नल्लामलाई श्रेणी में स्थित आन्ध्रप्रदेश का नागार्जुन सागर भारत का सबसे बड़ा एवं बाघ संरक्षण उद्यान है।
  • मध्यप्रदेश के वनविहार नेशनल पार्क में सफेद बाघ का संरक्षण किया जा रहा है।
  • मध्यप्रदेश के राष्ट्रीय उद्यानों में हर वर्ष नवम्बर माह में मोगली महोत्सव मनाया जाता है जिसका मकसद बच्चों में प्रकृति से सरोकार, स्नेह और अपनत्व की भावना विकसित करना है।
  • वर्तमान समय में यह बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान, पेंच टाइगर रिजर्व व पन्ना टाइगर रिजर्व में आयोजित किया गया है।
  • प्रोजेक्ट क्रोकोडाइल (Project Crocodile) की शुरुआत वर्ष 1976 में की गई। वर्तमान समय में घड़ियालों के संरक्षण हेतु 11 अभयारण्य की स्थापना की जा चुकी है। मध्य प्रदेश में स्थित राष्ट्रीय चम्बल अभयारण्य सबसे बड़ा अभयारण्य है।

कुछ खास जीव से संबंधित अभयारण्य :

  • कच्छ का छोटा रण (गुजरात)  - जंगली गधा
  • काजीरंगा (असम)    - एक सींग वाला गैंडा
  • जलदापाड़ा (असम)   - एक सींग वाला गैंडा
  • दाचीग्राम (जम्मू-कश्मीर)    - सफेद भालू
  • गिर (गुजरात)    - एशियाई सिंह
  • वनविहार नेशनल पार्क (मध्यप्रदेश)  - सफेद बाघ
  • रेगिस्तान राष्ट्रीय पार्क (राजस्थान)  - ऊँट

पक्षियों के आश्रय स्थल :

  • केवलादेव घाना (भरतपुर)   - राजस्थान
  • वेदाथांगल   - तमिलनाडु
  • रंगनाथिटु     - कर्नाटक
  • सलीम अली     - तमिलनाडु

कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय पार्क व अभयारण्य :

  • केबुललामजाओ राष्ट्रीय पार्क   - मणिपुर
  • लाओखोवा वन्य जीव अभयारण्य - असम
  • ग्रेट इंडियन बस्टर्ड अभयारण्य   - महाराष्ट्र
  • सबरीमाला नेशनल पार्क   - केरल
  • साइलेन्ट वैली नेशनल पार्क   - केरल
  • घाटप्रभा अभयारण्य   - कर्नाटक
  • हेमिस हाई अल्टीट्यूड नेशनल पार्क  - कश्मीर
  • मेरीन नेशनल पार्क   - अंडमान निकोबार
  • सैंडल पीक नेशनल पार्क   - अंडमान
  • रॉस आइलैंड राष्ट्रीय उद्यान  - रॉस द्वीप अंडमान निकोबार द्वीप
  • कोल्लेरु एक्वेयरी   - आंध्र प्रदेश
  • गौतम बुद्ध वन्य जीव अभयारण्य  - गया (बिहार)

अनुसंधान केन्द्र

  • पारिस्थितिकी से संबंधित अनेक अनुसंधान केन्द्र भी स्थापित किए गए हैं। इनमें निम्न प्रमुख हैं :-
  1. इंदिरा गाँधी फॉरेस्ट अकादमी, देहरादून।
  2. सेन्ट्रल एरिड जोन रिसर्च इंस्टीट्यूट, जोधपुर।
  3. इंडियन फॉरेस्ट मैनेजमेंट, भोपाल।
  4. राष्ट्रीय पतझड़ वन अनुसंधान केन्द्र, जबलपुर।
  5. वुड साइंस एंड टेक्नोलॉजी सेन्टर, बेंगलुरु।
  6. फॉरेस्ट जेनेटिक सेन्टर, कोयंबटूर।

राष्ट्रीय पार्क
(वन्य जीव संरक्षण अधिनियम-1972 के तहत गठित)

  1. काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान - असम - एक सींग वाले गैंडे के लिए प्रसिद्ध, उदबिलाव
  2. मानस राष्ट्रीय उद्यान - असम - सुनहरा लंगूर व बाघ, उदबिलाव, लाल पांडा
  3. दूधवा राष्ट्रीय उद्यान - उत्तरप्रदेश
  4. राजाजी राष्ट्रीय उद्यान - उत्तराखण्ड
  5. भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान - ओडिशा (लवणीय मगरमच्छ)
  6. बांदीपुर राष्ट्रीय उद्यान - कर्नाटक
  7. बन्नरघट्टा राष्ट्रीय उद्यान - कर्नाटक
  8. नागरहोल राष्ट्रीय उद्यान - कर्नाटक
  9. साइलैंट वैली राष्ट्रीय उद्यान - केरल
  10. पेरियार राष्ट्रीय उद्यान - केरल
  11. गिर राष्ट्रीय उद्यान - गुजरात (एशियाई शेर)
  12. मेरीन राष्ट्रीय उद्यान - गुजरात (जंगली गधा)
  13. भगवान महावीर राष्ट्रीय उद्यान - गोवा
  14. दाचीग्राम राष्ट्रीय उद्यान - जम्मू-कश्मीर
  15. किश्तवार राष्ट्रीय उद्यान - जम्मू-कश्मीर
  16. मेरीन राष्ट्रीय उद्यान -तमिलनाडु
  17. गुइंडी राष्ट्रीय उद्यान - तमिलनाडु
  18. सुंदरवन राष्ट्रीय उद्यान - पश्चिमी बंगाल
  19. कान्हा किसली राष्ट्रीय उद्यान - मध्यप्रदेश (गौर)
  20. बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान - मध्यप्रदेश
  21. पन्ना राष्ट्रीय उद्यान - मध्यप्रदेश
  22. वन विहार राष्ट्रीय उद्यान - मध्यप्रदेश
  23. संजय राष्ट्रीय उद्यान - मध्यप्रदेश
  24. संजय गाँधी राष्ट्रीय उद्यान - महाराष्ट्र
  25. केबुल लामजाओ राष्ट्रीय उद्यान - मणिपुर
  26. ब्लू माउंटेन राष्ट्रीय उद्यान - मिजोरम
  27. नोकरेक राष्ट्रीय उद्यान - मेघालय
  28. रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान - राजस्थान
  29. सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान - राजस्थान
  30. जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान - उत्तराखण्ड
  31. फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान - उत्तराखण्ड
  32. नंदादेवी राष्ट्रीय उद्यान - उत्तराखण्ड-हिम तेंदुआ
  33. नार्थ बटन व साउथ बटन राष्ट्रीय उद्यान-अण्डमान एण्ड निकोबार
  34. माउण्ट हेरियट राष्ट्रीय उद्यान - अण्डमान एण्ड निकोबार
  35. मेरीन राष्ट्रीय उद्यान - अण्डमान एण्ड निकोबार
  36. नामदफा अभयारण्य (अरुणाचल प्रदेश) - हुलॉक गिबन व लाल पांडा
  37.  मुंडन थराई अभयारण्य (तमिलनाडु) - शेर जैसी पूँछ वाला बंदर
  38. इंद्रावती राष्ट्रीय पार्क - छत्तीसगढ़ - गौर
  39. पिरोटन अभयारण्य - कच्छ की खाड़ी (गुजरात) - ऑक्टोपस व पपर फिस।

नोट -

  • सबसे पहले वन नीति 1894 ई. में अंग्रेजी सरकार द्वारा बनाई गई है।
  • आजादी के बाद पहली बार सन् 1952 में नई वन नीति बनाई गई।
  • बाघ परियोजना वर्ष 1972 में प्रारम्भ की गई।
  • हाथी परियोजना वर्ष 1991-92 में प्रारम्भ की गई।
  • लाल पाण्डा परियोजना वर्ष 1996 में प्रारम्भ की गई।

आर्द्रभूमियाँ या जलग्रस्त भूमि (Wet lands)

  • जलग्रस्त भूमि वैसे दलदली या पानीवाले क्षेत्र हैं जहाँ सालोंभर या साल के एक हिस्से में प्राकृतिक या कृत्रिम रूप से शांत या बहता हुआ, मीठा या खारा पानी वाला, समुद्री या गैर-समुद्री ऐसा जलजमाव क्षेत्र हो जिसकी गहराई 6 मी. से अधिक नहीं हो।
  • अधिकांश जलग्रस्त भूमि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से गंगा, ब्रह्मपुत्र, नर्मदा कावेरी, ताप्ती, गोदावरी आदि जैसी बड़ी नदियों से जुड़ी हुई है।
  • 1971 ई. में जलग्रस्त भूमि के संरक्षण के लिए बहु-उद्देशीय समझौता हुआ था जिसे रामसर सम्मेलन (ईरान) के नाम से जाना जाता है।
  • भारत इसमें 1982 ई. में शामिल हुआ एवं पर्यावरण व वन मंत्रालय द्वारा इनके संरक्षण हेतु 1987 ई. से एक कार्यक्रम चलाया जा रहा है।

रामसर आर्द्रभूमि क्षेत्र (भारत में)

  1. Tsomorari – J & K – 120 वर्ग किमी.
  2. Nokrsar – J & K  – 13.75 वर्ग किमी.
  3. Surinsar Mansar Lake – J & K – 3.5 वर्ग किमी.
  4. Wular Lake – J & K – 189 वर्ग किमी.
  5. चंद्रताल - H.P. – 0.49 वर्ग किमी.
  6. पोंग बांध झील - H.P. – 156.62 वर्ग किमी.
  7. रेनुका झील - H.P. – 0.20 वर्ग किमी.
  8. रोपड़ - पंजाब - 13.65 वर्ग किमी.
  9. कंजली - पंजाब - 1.83 वर्ग किमी.
  10. हरिके - पंजाब - 41 वर्ग किमी.
  11. अपर गंगा नदी - U.P. - 265.9 वर्ग किमी.
  12. केवलादेव राष्ट्रीय पार्क - राजस्थान - 28.73 वर्ग किमी 1.10.81 को घोषित
  13. सांभर झील - राजस्थान - 240 वर्ग किमी.
  14. भोज - मध्यप्रदेश - 32 वर्ग किमी.
  15. भीतरकणिका - उड़ीसा - 650 वर्ग किमी.
  16. चिल्का झील - उड़ीसा - 1165 वर्ग किमी.-1.10.81 को घोषित
  17. पूर्वी कोलकाता - P.B. – 125 वर्ग किमी.
  18. Deepor Beel – Assam – 40 वर्ग किमी.
  19. अस्तमुड़ी - केरल - 614 वर्ग किमी.
  20. Sasthamkotta Lake – केरल - 3.73 वर्ग किमी.
  21. Vembnad Kol Lake – केरल - 1512.5 वर्ग किमी.
  22. नालसरोवर पक्षी अभ्यारण्य - गुजरात - 123 वर्ग किमी.
  23. लोकटक झील - मणिपुर - 266 वर्ग किमी.
  24. रूद्रसागर झील - त्रिपुरा - 2.4 वर्ग किमी.
  25. कोल्लेरू झील - आंध्रप्रदेश - 901 वर्ग किमी.
  26. पोइंट केलीमेर - तमिलनाडु - 385 वर्ग किमी.

कच्छ वनस्पतियाँ या मैंग्रोव (Mangrove)

  • ये उष्णकटिबंधीय और उपोष्ण कटिबंधीय प्रदेशों की समुद्र तटवर्ती पश्चजलों (Backwaters), मुहानों, क्षारीय दलदलों व दलदली मैदानों की विशिष्ट पारिस्थितिकी वाले क्षार-सह्य वानिकी क्षेत्र हैं।
  • राष्ट्रीय पर्यावरण नीति 2006 कच्छ (मैंग्रोव) वनस्पतियों और प्रवाल भित्तियों को महत्वपूर्ण तटीय पर्यावरण संसाधन मानता है।
  • उत्तरी अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, सुन्दरवन (प. बंगाल), भीतर-कणिका,  धमरा (उड़ीसा), कोरिंगा, गोदावरी डेल्टा, कृष्णा का मुहाना (आंधप्रदेश) महानदी डेल्टा (उड़ीसा), पिछावरम व कैलीमर प्वाइंट, काजूवेली, रामनद (तमिलनाडु), गोवा, कच्छ की खाड़ी (गुजरात), कुन्दापुर (कर्नाटक), अचरा रत्नगिरि, विव्ररौली, कुंडालिका रडाना, मालवन, श्रीवर्धन (महाराष्ट्र) और बेम्बानद (केरल) इनमें प्रमुख हैं।
  • दो कच्छ वनस्पतियां भारत में लुप्त होने के कगार पर हैं। इनमें से एक है तमिलनाडु के पिछावरम में पाई जाने वाली राइजोफोरा अन्नामलाय और दूसरी है उड़ीसा के भीतर-कणिका में पाई जाने वाली हेरीटेरिया कनिकेंसिस।
  • यूनेस्को के जीवमंडलीय के आरक्षित क्षेत्रों की विश्व सूची में पश्चिम बंगाल के सुन्दरवन को शामिल किया गया है।
  • यह देश का सबसे बड़ा कच्छ (मैंग्रोव) वनस्पति क्षेत्र है।