राजस्थान की भाषा एवं बोलिया
- राजस्थानी भाषा असंवैधानिक भाषा है।
- राजस्थानी भाषा की लिपि- मूंडिया/महाजनी/बनियावणी
- भारत की राजभाषा हिन्दी है जिसकी लिपि- देवनागरी है।
- राजस्थानी भाषा दिवस- 24 फरवरी
- हिन्दी भाषा दिवस- 14 सितम्बर
- अनुच्छेद 343- भारत की राजभाषा हिन्दी होगी जबकि राष्ट्रीय लिपि देवनागरी होगी।
- अनुच्छेद 345 – प्रत्येक राज्य की अपनी एक राज्य भाषा हो सकेगी।
- भारतीय भाषा – आर्य भाषा – वैदिक संस्कृत
वैदिक संस्कृत की दो उपभाषा -
1. पालि
2. संस्कृत
पालि की तीन उपभाषा -
1. शौरसेनी प्राकृत
2. मागधी प्राकृत
3. महाराष्ट्री प्राकृत
शौरसेनी प्राकृत की 2 उपभाषा -
1. गुर्जरी अपभ्रंश
2. शौरसेनी अपभ्रंश
गुर्जरी अपभ्रंश की 2 उपभाषा -
1. राजस्थानी
2. गुजराती
शौरसेनी अपभ्रंश की 1 उपभाषा - हिन्दी भाषा है।
- राजस्थानी भाषा की उत्पत्ति – 1150 ई. (12 वही सदी)
- मोतीलाल मेनारिया एवं K.M. मुंशी के अनुसार राजस्थानी भाषा की उत्पत्ति गुर्जरी अपभ्रंश से हुई।
- जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने राजस्थानी भाषा की उत्पत्ति नागर अपभ्रंश से मानी है।
- डॉ. महावीर प्रसाद शर्मा के अनुसार राजस्थानी भाषा की उत्पत्ति शौरसेनी अपभ्रंश से हुई।
- डॉ.सुनीति चटर्जी ने राजस्थानी भाषा की उत्पत्ति सौराष्ट्री अपभ्रंश से मानी है।
- राजस्थानी- शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन द्वारा अपनी पुस्तक “लिगवेस्टिक सर्वे ऑफ इण्डिया(1912)” में किया गया।
- मरुभाषा- शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम 8वीं सदी में उद्दोतन सुरी द्वारा लिखित ग्रंथ कुवलयमाला में किया।
- कुवलयमाल ग्रंथ में 18 भाषाओं का वर्णन है।
- मारवाड़ी- शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग अबुल फजल द्वारा लिखित ग्रंथ “आइने अकबरी” एवं कुशलनाम द्वारा लिखित ग्रंथ “पिंगल शिरोमणि” में किया गया।
राजस्थान- शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग कर्नल जेम्स टॉड द्वारा लिखित पुस्तक “द एनाल्स एण्ड एण्टिकयुटिज ऑफ राजस्थान व द सेन्ट्रल वेस्टर्न स्टेट राजपूताना ऑफ इण्डिया(1829)” में किया गया।
राजस्थान भाषा का साहित्यक के रूप में-
1. डिंगल- पश्चिमी राजस्थान में चारण जाति से प्रभावित भाषा/साहित्य में प्रयोग। यह साहित्य सर्वाधिक पद्य भाग में लिखित है।
2. पिंगल – पूर्वी राजस्थान में भाट जाति से प्रभावित भाषा/साहित्य में प्रयोग। यह साहित्य गद्य व पद्य का मिश्रण है।
जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन के अनुसार-
1. मध्य राजस्थानी
2. दक्षिणी राजस्थानी
3. पूर्वी राजस्थानी
4. मध्यपूर्वी राजस्थानी
5. पश्चिमी राजस्थानी
मारवाड़ी:-
- उत्पत्ति गुर्जरी अपभ्रंश से हुई है।
- मारवाड़ी के लिए उद्योतन सूरी कृत ‘कुवलयमाला’ ग्रंथ में ‘मरुभाषा’ शब्द का उल्लेख मिलता है।
- क्षेत्रफल की दृष्टि से राजस्थान की सबसे बड़ी बोली।
- बोली का क्षेत्र – जोधपुर, पाली, नागौर, बाड़मेर
- जैन साहित्य एवं मीरा बाई का साहित्य मारवाड़ी में लिखित है।
- मारवाड़ी का सिरमौर जिला- जोधपुर।
- मारवाड़ी तथा पश्चिमी राजस्थानी का साहित्यिक रूप डिंगल कहलाता है।
डिंगल | पिंगल |
चारण जाति से प्रभावित एवं पश्चिमी राजस्थान का साहित्य | भाट जाति से प्रभावित एवं पूर्वी राजस्थान का साहित्य |
यह गीत रूप में लिखित | गद्य व पद्य दोनों में लिखित |
उत्पत्ति- गुर्जरी अपभ्रंश से | उत्पत्ति – शौरसेनी अपभ्रंश से |
वागड़ी:-
- मुख्य क्षेत्र – डुँगरपुर, बाँसवाड़ा (वागड़ क्षेत्र)
- ग्रियर्सन ने इस बोली को भीली कहा है।
- वागड़ी की सहायक बोली भीली है।
- इस बोली पर गुजराती भाषा का प्रभाव है।
- संत मावजी के उपदेश- इसी बोली में है।
- मावजी के लिखित पद चौपड़ा कहलाते हैं।
- संत मावजी को वागड़ का धणी कहा जाता है।
गोडवाड़ी – गोडवाड़ क्षेत्र।
- मुख्य क्षेत्र- जालोर
- इस बोली को दीयावड़ी भी कहा जाता है।
देवड़ावाटी- इस बोली का मुख्य क्षेत्र- सिरोही
- इस क्षेत्र में देवड़ा वंश का शासन होने के कारण यहाँ की बोली को देवड़ावाटी कहा जाता है।
कुबड़ी:-
- यह बोली कुबड़ पट्टी/बांका पट्टी क्षेत्र में बोली जाती है।
- क्षेत्र- नागौर से अजमेर के मध्य का भू-भाग।
- इस क्षेत्र में पानी में फ्लोराइड की मात्रा अधिक होने के कारण हड्डियों में टेड्डापन आ जाता इस कारण इस क्षेत्र को बांकापट्टी/कुबड़ पट्टी कहते हैं।
नाडियाँ:- मुख्य क्षेत्र – पाली
- पाली में लूणी नदी के प्रवाह क्षेत्र को नाडा कहा जाता है। इस क्षेत्र में के आसपास के भू-भाग पर नाडिया भाषा बोली जाती है।
थली:-
- शाब्दिक अर्थ – रेतीला भू-भाग।
- बोली का मुख्य क्षेत्र – बीकानेर, जैसलमेर।
शेखावाटी :- इस बोली का मुख्य क्षेत्र शेखावाटी क्षेत्र- सीकर, चूरू, झुंझुनूँ
लोहंद तथा पंजाबी भाषा- हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर में बोली जाती है।
ढाटी – इस बोली का मुख्य क्षेत्र जैसलमेर है।
जैसलमेर को प्राचीन समय में मांड/ढाट कहा जाता था।
ढढकी:- इस बोली का मुख्य क्षेत्र बाड़मेर है।
इस बोली को मालाणवी भी कहा जाता है।
मेवाड़ी:-
- मारवाड़ी की उपबोली है।
- मेवाड़ क्षेत्र में बोली जाती है।
- मुख्य क्षेत्र- उदयपुर, चित्तौड़गढ़, राजसंमद
- अगोया – जोधपुर से ब्यावर तक के क्षेत्र में बोली जाती है।
ढूँढ़ाड़ी:-
- ढूँढाड़ क्षेत्र में बोली जाती है।
- मुख्य क्षेत्र- जयपुर, अजमेर, किशनगढ़, लावा (टोंक), दौसा।
- इस बोली को जयपुरी/झाड़शाही भी कहते हैं।
- ढूँढ़ाड़ी एवं हिन्दी का मिश्रण सधुक्कड़ी कहलाता है।
- ढूँढ़ाड़ी बोली का उल्लेख सर्वप्रथम आठ देश गुजरी नामक पुस्तक में मिलता है।
- जनसंख्या की दृष्टि से सबसे बड़ी बोली।
- संत दादू जी की अधिकांश रचनाऐं इसी भाषा में लिखित (सधुक्कड़ी)
- ढूँढ़ाड़ी की उत्पत्ति शौरसेनी से मानी जाती है।
- ढूँढ़ाड़ी भाषा का साहित्यिक रूप पिंगल कहलाता है।
तोरावाटी:-
- मुख्य क्षेत्र सीकर व झुँझुनूँ है।
- कांतली नदी का प्रवाह क्षेत्र – तोरावटी कहलाता है।
- यह नदी झुँझुनूँ को बराबर दो भागों में बांटती है।
- इस नदी के तट पर ताम्रयुगीन सभ्यताओं की जननी गणेश्वर सभ्यता का विकास हुआ था। (नीम का थाना- सीकर)
- पूर्णत: राजस्था न में आंतरिक प्रवाह क्षेत्र सबसे लम्बी नदी।
राजावटी:- जयपुर से टोंक तक भू- भाग में बोली जाती है।
चौरासी :- इस बोली का मुख्य क्षेत्र टोंक, सवाई माधोपुर, भीलवाड़ा है।
काठेड़ी :- जयपुर से धौलपुर तक के भू-भाग में बोली जाती है।
जगरौटी:- करौली (मुख्य जिला) – धौलपुर
खैराड़ी :- इसकी बोली का मुख्य क्षेत्र शाहपुरा (भीलवाड़ा) है। यह एक कर्कश बोली है।
हाड़ौती :- इस बोली का मुख्य क्षेत्र कोटा बूँदी, झालावाड़ व बाराँ है।
- वर्तनी की दृष्टि से सबसे कठोर।
- हाड़ौती का सर्वप्रथम उल्लेख केलॉग द्वारा लिखित “हिंदी व्याकरण” में मिलता है।
- सूर्यमल्ल मिश्रण की रचनाएँ हाड़ौती में लिखित है।
- बूँदी का राजकवि।
- इनकी रचनाएँ- बिहारी सतसई,वंश भास्कर।
ब्रजभाषा:- इस बोली का मुख्य क्षेत्र भरतपुर, अलवर।
मेवाती बोली :-
- मेवाती बोली मेवात क्षेत्र में बोली जाती है।
- मुख्य क्षेत्र निम्न है- भरतपुर, अलवर।
- हिन्दी से सर्वाधिक समानता रखने वाली बोली।
- चरणदास तथा सहजोबाई की रचनाएँ मेवाती में लिखित हैं।
अहीरवाटी/हीरवाटी :–
- इस बोली का मुख्य क्षेत्र अलवर, जयपुर है।
- अहीर शब्द का अर्थ – यादव होता है।
- इस बोली का क्षेत्र – बहरोड़ (अलवर), मुण्डावर (अलवर), कोठपुतली (जयपुर) क्षेत्र को संयुक्त रूप से राठ क्षेत्र कहा जाने के कारण इस बोली को राठी भी कहा जाता है।
मालवी :-
- मारवाड़ी तथा ढूँढ़ाड़ी का मिश्रण है।
- इस बोली के प्रमु ख क्षेत्र मालवा
- राजस्थान में इस बोली का क्षेत्र- टोंक, बूँदी, झालावाड़
- चम्बलावड़ी• मालवी बोली के उपनाम से भी जानी जाती है।
- मालवी की दो उपबोलियां है जो निम्न है- रांगड़ी, नीमाड़ी
- रांगडी, मारवाड़ी व मालवी का मिश्रण है।
- मालवा क्षेत्र के राजपुतों की प्रमुख बोली है।
- नीमाड़ी – इस बोली को दक्षिणी राजस्थानी भी कहा जाता है।


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