मूल अधिकार



मूल अधिकार

  • वे अधिकार जो व्यक्ति के जीवन के लिए मौलिक एवं अनिवार्य हैं, जो संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदान किये जाते हैं, उन्हें मौलिक अधिकार कहा जाता है।
  • मूल अधिकारों का सर्वप्रथम प्रयोग ब्रिटेन में हुआ।
  • ब्रिटिश सम्राट जॉन द्वारा सन् 1215 ई. में हस्ताक्षरित अधिकार पत्र मूल अधिकार सम्बन्धी प्रथम लिखित दस्तावेज हैं।
  • मूल अधिकार वर्तमान भारतीय संविधान के भाग-3 और अनुच्छेद-12 से 35 में हैं।
  • ये अमेरिका के संविधान से प्रभावित हैं।
  • मूल अधिकारों की माँग सर्वप्रथम भारत में बाल गंगाधर तिलक ने स्वराज्य विधेयक 1895 के माध्यम से की।
  • मूल अधिकारों के निर्माण का प्रथम प्रयास 1928 में मोतीलाल नेहरू ने 'नेहरू रिपोर्ट' के माध्यम से किया।
  • वर्ष 1931 के करांची अधिवेशन में कहा गया "स्वाधीन भारत के किसी भी संविधान को मौलिक अधिकारों की गारण्टी होनी चाहिए।"
  • भारत में सर्वप्रथम मौलिक अधिकारों की स्पष्ट रूप से मांग वर्ष 1935 में जवाहर लाल नेहरू ने की।
  • जवाहरलाल नेहरू ने मूल अधिकारों को 'संविधान की अंतरआत्मा की संज्ञा दी है। '
  • संविधान सभा द्वारा मूल अधिकार तथा अल्पसंख्यक समिति का गठन किया गया जिसके अध्यक्ष सरदार पटेल थे।
  • मूल संविधान में नागरिकों को 7 मौलिक अधिकार प्रदान किये गये थे परन्तु 44वें संविधान संशोधन द्वारा 1978 में सम्पत्ति के अधिकार को मूल अधिकारों से हटाकर कानूनी अधिकार बना दिया गया।

वर्तमान में मूल अधिकारों की संख्या 06 है।

1.  समानता का अधिकार (अनुच्छेद-14 से 18)
2.  स्वतंत्रता का अधिकार(अनुच्छेद-19 से 22)
3.  शोषण के विरुद्ध अधिकार(अनुच्छेद-23 से 24)
4.  धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार(अनुच्छेद-25 से 28)
5.  संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार(अनुच्छेद-29 से 30)
6.  संवैधानिक उपचारों का अधिकार(अनुच्छेद-32)

अनुच्छेद-12  इसके अंतर्गत राज्य को परिभाषित किया गया है तथा राज्य में भारत सरकार, राज्य सरकार विधानमण्डल तथा सभी स्थानीय निकाय एवं अन्य ऐसे सभी प्राधिकारी शामिल होंगे जिन्हें संविधान या विधि के अंतर्गत नियम बनाने, कानून बनाने, आदेश जारी करने तथा अधिसूचना जारी करने का अधिकार प्राप्त है।
अन्य प्राधिकारी के अंतर्गत ऐसे प्राधिकारी या निकाय आते हैं जो संविधान द्वारा सृजित किये जाते हैं और जिन्हें विधि या उपविधि बनाने की शक्ति प्राप्त होती है।

अनुच्छेद-13 – मूल अधिकारों से असंगत विधियाँ –
- इसके अंतर्गत न्यायालयों को मूल अधिकारों का सजग प्रहरी या अभिभावक बनाया गया है।
- इसके तहत न्यायालय ऐसे किसी भी विधि को अवैध घोषित कर सकता है, जो मूल अधिकारों से असंगत हो। इस प्रकार अप्रत्यक्ष रूप से न्यायिक पुनर्विलोकन की अभिव्यक्ति होती है। इसके अंतर्गत निम्नलिखित सिद्धांत निहित हैं-

(i) ग्रहण या आच्छादन  का सिद्धांत –
संविधान लागू होने से पूर्व निर्मित विधि किसी मूल अधिकार से असंगत है, तो वह निष्क्रिय हो जायेगी लुप्त नहीं होगी। यदि मूल अधिकारों द्वारा लगाया गया प्रतिबंध हटा दिया जाए तो वह पुन: सक्रिय हो जायेगी।

(ii) अ धित्याग का सिद्धांत –
संविधान में कहा गया है कि कोई  व्यक्ति संविधान द्वारा प्राप्त मूल अधिकारों को स्वेच्छा से नहीं त्याग सकता है।

(iii) पृथ क्करणीयता का सिद्धांत –
यदि किसी अधिनियम का कोई भाग असंवैधानिक या मूल अधिकारों के विरुद्ध है तो अधिनियम के मूल उद्देश्य को समाप्त किये बिना अधिकारों से असंगत वाला भाग ही असंवैधानिक घोषित किया जायेगा, सम्पूर्ण अधिनियम नहीं।

मूल अधिकार

मौलिक अधिकार

1. समानता का अधिकार (अनुच्छेद-14 से 18):

अनु. 14- विधि के समक्ष समता –

  • यह विधि के समक्ष समानता अथवा विधि का समान संरक्षण प्रदान करता है। विधि के समक्ष समानता का प्रावधान ब्रिटिश संविधान से लिया गया है। इस व्यवस्था के अनुसार सभी व्यक्ति बिना किसी विभेद देश के सामान्य कानूनों से शासित होंगे अर्थात् कोई भी व्यक्ति विधि से ऊपर नहीं है।
  • मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980) के वाद में  उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय के बाद अनुच्छेद-14 में निहित विधि के शासन को संविधान का आधारभूत ढाँचा घोषित किया गया है।

अनु. 15- धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थल के आधार पर विभेद का प्रतिषेध –

  • यह मूल अधिकार केवल भारतीय नागरिकों के लिए है। इसके अंतर्गत समता के आधार को विशेष क्षेत्रों में लागू करने की व्यवस्था है। यह धर्म, मूल वंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर किसी भी प्रकार के विभेद को रोकता है।
  • अनुच्छेद-15(4) को प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम, 1951 द्वारा संविधान में अंत: स्थापित किया गया जिसके अनुसार शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण का प्रावधान किया गया है।
  • यह सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े हुए नागरिकों के लिए, अनुसूचित जाति के लिए, अनुसूचित जनजाति के लिए है।
  • 93वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2005 द्वारा संविधान के अनुच्छेद-15 में खण्ड(5) जोड़ा गया जिसमें कहा गया है कि राज्य नागरिकों के सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों या अनुसूचित जातियों, जनजातियों की उन्नति के लिए शैक्षिक संस्थाओं में प्रवेश के लिए छूट संबंधी विशेष उपबंध बना सकता है।
  • 103वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2019 के द्वारा अनुच्छेद-15 में (6) जोड़ा गया जिसके अनुसार राज्य अनुच्छेद-15(4) तथा अनुच्छेद-15(5) में वर्णित वर्गों के अतिरिक्त आर्थिक रूप से दुर्बल किन्हीं वर्गों की उन्नति के लिए विशेष उपबंध कर सकेगा।

अनु. 16- लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता-

  • यह अधिकार केवल भारतीय नागरिकों को प्राप्त है। यह अनुच्छेद सरकारी सेवाओं में सभी की नियुक्ति हेतु समानता के अवसर उपलब्ध कराता है।
  • 77वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1995 द्वारा अनुच्छेद (4)(क) जोड़ा गया, इसमें राज्य को यह शक्ति दी गई है कि वह अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों की उन्नति में आरक्षण की व्यवस्था कर सकता है।
  • 103वें संशोधन अधिनियम, 2019 से अनुच्छेद-16(6) जोड़ा गया जिसके अन्तर्गत राज्य को यह अधिकार प्रदान किया गया है कि वह अनुच्छेद-16(4) में वर्णित वर्ग के अतिरिक्त आर्थिक रूप से दुर्बल समुदाय के लिए भी नियुक्ति व पदों में आरक्षण की व्यवस्था कर सकेगा।