मूल अधिकार
मौलिक अधिकार
अनु. 17- अस्पृश्यता का अंत-
- यह भारतीय समाज में व्याप्त कुरीति अस्पृश्यता का अन्त करता है तथा छुआ-छूत का समर्थन करने वालों को दण्डित करने की व्यवस्था करता है। संसद ने अनुच्छेद-17 के अधीन शक्ति का प्रयोग करते हुए 'अस्पृश्यता अपराध अधिनियम,1955' अधिनियमित किया, जिसे सन् 1976 में पुन: संशोधन कर 'नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1976' नया नाम दिया गया। अनुच्छेद-17 स्वत: क्रियान्वित कानून है अर्थात् इसके उल्लंघन पर न्यायालय सीधे भारतीय दण्ड संहिता के आधार पर दण्ड दे सकता है।
अनु. 18- उपाधियों का निषेध-
- यह उपाधियों का उन्मूलन करता है। अनुच्छेद-18 के खण्ड(1) में कहा गया है कि राज्य नागरिक व गैर-नागरिकों को सैनिक तथा शैक्षणिक सेवाओं से जुड़ी उपाधियों के अतिरिक्त अन्य उपाधियाँ देने पर प्रतिबंध लगाता है।
2. स्वतंत्रता का अधिकार(अनुच्छेद-19 से 22):
अनु. 19- वाक्-स्वातन्त्र्य आदि विषयक कुछ अधिकारों का संरक्षण –
- स्वतंत्रता लोकतंत्र का आधारभूत लक्षण है एवं अनुच्छेद-19 केवल भारतीय नागरिकों के लिए है। अनुच्छेद-19(1) के अन्तर्गत प्रारम्भ में भारतीय संविधान के द्वारा सभी नागरिकों को कुल 7 स्वतंत्रताएँ प्रदान की गई थी परन्तु 44वें संविधान संशोधन, 1978 के माध्यम से अनुच्छेद-19(1)(च) में उपबंधित सम्पत्ति के अर्जन, धारण और व्ययन की स्वतंत्रता को समाप्त कर दिया गया।
वर्तमान में भारतीय संविधान के द्वारा सभी नागरिकों को अनुच्छेद-19(1) के अन्तर्गत 6 स्वतंत्रताएँ प्रदान की गई हैं-
• अनु. 19(1)(क) : वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
• अनु. 19(1)(ख) : शांतिपूर्ण व निरायुद्ध सम्मेलन की स्वतंत्रता
• अनु. 19(1)(ग) : संघ, संगठन या सहकारी समिति (97 संशोधन 2011) बनाने की स्वतंत्रता
• अनु. 19(1)(घ) : अबाध संचरण या आगमन की स्वतंत्रता
• अनु. 19(1)(ङ) : निवास की स्वतंत्रता
• अनु. 19(1)(च) :
• अनु. 19(1)(छ) : रोजगार या जीविका की स्वतंत्रता
अनु. 20- अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण –
- अनुच्छेद-20 के अन्तर्गत व्यक्तियों को राज्य के विरुद्ध अपराध के संबंध में निम्नलिखित संवैधानिक संरक्षण प्राप्त हैं-
1. कार्योत्तर विधियों से संरक्षण (Ex-Post-Facto Law) अनुच्छेद-20(1) –
- अनुच्छेद 20(1) में कहा गया है कि किसी व्यक्ति को प्रवृत्त विधि के अतिक्रमण या उल्लंघन के आधार पर ही अपराधी ठहराया जायेगा।
2. दोहरे दण्ड से संरक्षण(Protection from Double Jeopardy) –
- अनुच्छेद-20 के खण्ड (2) में कहा गया है कि किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक बार से अधिक 'दण्डित' या 'अभियोजित' नहीं किया जायेगा।
3. आत्म-अभिशंसन से संरक्षण(Protection from Self Incrimination) &
- अनुच्छेद-20(3) में कहा गया है कि किसी व्यक्ति को, जो कि अपराधी है, स्वयं अपने विरुद्ध साक्ष्य देने के लिये बाध्य नहीं किया जायेगा।
अनु. 21- प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण –
- अनुच्छेद-21 में कहा गया है कि किसी भी व्यक्ति को उसके प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता से कानून अथवा विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
- 'ए.के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य, ए.आई.आर. 1950' मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा, कि अनुच्छेद-21 विधान मण्डल विधि द्वारा किसी व्यक्ति को प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित कर सकता है।
- 'मेनका गाँधी बनाम भारत संघ ए.आई.आर. 1978' मामले में उच्चतम न्यायालय ने गोपालन मामले में दिये अपने निर्णय को उलट दिया तथा निर्णय दिया कि अनुच्छेद-21 के तहत प्राप्त संरक्षण केवल कार्यपालिका की मनमानी कार्यवाही के विरुद्ध ही नहीं बल्कि विधानमण्डलीय कार्यवाही के विरुद्ध भी उपलब्ध है अर्थात् विधायिका विधि द्वारा किसी व्यक्ति को उसके प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित नहीं कर सकती है।
- अनुच्छेद-21 की महत्ता के कारण डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने इसे 'संविधान का मेरुदण्ड’ तथा ‘मेग्नाकार्टा' कहा है।
- 44 वें संविधान संशोधन अधिनियम-1978 में संसद ने अनुच्छेद-359 में संशोधन करके स्पष्ट किया कि अनुच्छेद-20 तथा 21 में प्रदत्त स्वतंत्रता के अधिकार को आपातकाल में भी निलम्बित नहीं किया जा सकता।
अनुच्छेद-21(क) – शिक्षा का मूल अधिकार –
- 86वें संविधान संशोधन अधिनियम-2002 द्वारा संविधान में एक नया अनुच्छेद-21(क) जोड़ा गया जिसमें प्रारंभिक शिक्षा का अधिकार सम्मिलित है। अनुच्छेद-21(क) में कहा गया है कि राज्य का यह कर्त्तव्य होगा कि वह 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बालकों को नि:शुल्क व अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराये। शिक्षा के मूल अधिकार के क्रियान्वयन के लिए संसद ने 'शिक्षा का अधिकार विधेयक-2009' पारित किया जो 1 अप्रैल, 2010 से लागू हो गया। राजस्थान ने इसे 1 अप्रैल, 2011 से लागू किया गया।


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