स्थानीय स्वशासन- पंचायत एवं नगरीय स्वशासन

स्थानीय स्वशासन- पंचायती राज


  • भारत में स्थानीय शासन प्राचीन काल से ही रहा है जिसमें वैदिक काल में पंचायत, ग्राम सभा, समिति आदि का उल्लेख मिलता है। अंग्रेजों द्वारा सर्वप्रथम 1667 में मद्रास नगर परिषद् की स्थापना की गई जिसे 1687 में नगर निगम में क्रमोन्नत किया गया।
  • लॉर्ड रिपन को स्थानीय स्वशासन का पिता कहा जाता है इन्होंने 1882 में स्थानीय स्वशासन के लिए एक संकल्प पारित किया था जिसे स्थानीय स्वशासन का मैग्नाकार्टा कहा जाता है।
  • 1919 में शासन अधिनियम (मॉण्टेग्यू चेम्सफोर्ड सुधारों) के तहत पंचायत अधिनियम पारित कर ग्राम पंचायतों को वैधानिक दर्जा प्रदान किया गया था। संविधान निर्माण करते समय भी पंचायती राज व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए नीति निदेशक तत्वों में अनुच्छेद-40 में इसका प्रावधान किया गया।
  • वर्तमान संविधान में स्थानीय स्वशासन राज्य सूची का विषय है। भारत में पंचायती राज व्यवस्था का प्रारम्भ होने से पूर्व निम्न समितियों की सिफारिश थी-

1. बलवंतराय मेहता समिति, 1957 –

  • लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण पर बल देते हुए देश में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था की सिफारिश की थी।
  • इस सिफारिश का क्रियान्वयन सर्वप्रथम राजस्थान में 2 अक्टूबर, 1959 को नागौर जिले के बगदरी गाँव में पंडित जवाहरलाल नेहरू के द्वारा पंचायतीराज व्यवस्था का उद̖घाटन किया गया।

2. अशोक मेहता समि ति, 1977 –

  • जनसंख्या के आधार पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के लिए स्थान आरक्षित होने चाहिए।
  • त्रि-स्तरीय पंचायती राज पद्धति को केवल जिला एवं पंचायत समिति स्तर पर "द्विस्तरीय पद्धति" में बदलना चाहिए।

3. जी.वी.के. राव समि ति, 1985 –

  • संस्थाओं का कार्यकाल 8 वर्ष किया जाए।
  • राज्य वित्त आयोग का गठन किया जाए।
  • चार स्तर पर पंचायतीराज व्यवस्था।

4. एल.एम. सिंघवी  समिति, 1986 –

  • पंचायतीराज विभाग को संवैधानिक रूप से मान्यता देने और उनको संरक्षण की आवश्यकता है।

5. पी.के. थुंगन समि ति, 1988 –

  • इन्होंने भी पंचायतों को संवैधानिक दर्जा देने की बात की।
  • पंचायतीराज व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा देने के लिए राजीव गांधी सरकार द्वारा 64वां संविधान संशोधन विधेयक संसद में लाया गया जो लोकसभा में पारित होने के बाद राज्यसभा में पारित नहीं हो सका।

73वें संविधान संशोधन अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ

  • 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा प्रदान कि या गया। 24 अप्रैल, 1993 को यह अधिनियम सम्पूर्ण देश में लागू किया गया।
  • लागू/पारित – 24 अप्रैल, 1993
  • पंचायतीराज दिवस – 24 अप्रैल
  • भाग – 9 में पंचायत नाम से
  • अनुसूची – 11वीं
  • अनुच्छेद – 243A – O तक
  • विषय – 29
  • इसके माध्यम से ग्रामसभा (243A) को मान्यता दी गई जिसमें एक पंचायत क्षेत्र के सभी वयस्क मतदाता जिनका नाम मतदाता सूची में अंकित है मिलकर ग्राम सभा का निर्माण करेंगे।
  • पंचायतराज संस्थाओं को त्रि-स्तरीय मान्यता मिली जिसमें

1. ग्राम स्तर – ग्राम पंचायत
2. खण्ड स्तर – पंचायत समिति
3. जिला स्तर – जिला परिषद् का प्रावधान है।

  • पंचायतीराज संस्थाओं की संरचना का निर्धारण राज्य विधानमण्डल द्वारा किया जाएगा।
  • पंचायतीराज के तीनों स्तरों पर सदस्यों का चुनाव जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से किया जाएगा लेकिन मध्यवर्ती एवं उच्च स्तर पर अध्यक्षों का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित सदस्यों द्वारा किया जाएगा।
  • पंचायतीराज संस्थाओं में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण प्रदान किया गया है तथा सामान्य वर्ग में महिला को 1/3 आरक्षण निश्चित किया गया है हालांकि कुछ राज्यों में यह आरक्षण 50% तक कर दिया गया है।
  • पंचायतीराज संस्थाओं का कार्यकाल प्रथम बैठक से 5 वर्ष निर्धारित किया गया है, इस दौरान यदि पंचायत का विघटन हो जाता है तो अगली पंचायत का गठन 6 महीने से पहले करना होगा तथा यह शेष कार्यकाल के लिए ही गठित होगी।
  • पंचायतीराज संस्थाओं में चुनाव लड़ने की न्यूनतम आयु 21 वर्ष निश्चित की गई है। पंचायतीराज संस्थाओं की वित्तीय स्थिति की समीक्षा के लिए राज्य वित्त आयोग (अनुच्छेद-243 I) को मान्यता प्रदान की गई है।
  • पंचायतों के चुनाव संबंधी सारे कार्यों के लिए राज्य निर्वाचन आयोग (243-K) का प्रावधान किया गया है जिसकी नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है।
  • पंचायतीराज संबंधी प्रावधान अनुसूचित क्षेत्रों एवं जनजातीय क्षेत्रों, मिजोरम, मेघालय, नागालैण्ड, दिल्ली, मणिपुर के पर्वतीय क्षेत्रों, प. बंगाल के गोरखालैण्ड क्षेत्र आदि में लागू नहीं होंगे।
  • परन्तु संसद के द्वारा दिलीप सिंह भूरिया समिति की सिफारिशों के आधार पर 1996 में PESA (पेशा) यानि पंचायत की अनुसूचित क्षेत्र विस्तार अधिनियम का निर्माण किया गया है जो कि वर्तमान भारत के 10 राज्यों में लागू हैं।

संवैधानिक प्रावधान भाग-9: पंचायतें

243

परिभाषाएँ

243क(A)

ग्राम सभा

243ख(B)

पंचायतों का गठन

243ग(C)

पंचायतों की संरचना

243घ(D)

स्थानों का आरक्षण

243ङ(E)

पंचायतों की अवधि, आदि

243च(F)

सदस्यता के लिए निरर्हताएँ

243छ(G)

पंचायतों की शक्तियाँ, प्राधिकार और उत्तरदायित्व

243ज(H)

पंचायतों द्वारा कर अधिरोपित करने की शक्तियाँ और उनकी निधियाँ

243झ(I)

वित्तीय स्थिति के पुनर्विलोकन के लिए वित्त आयोग का गठन

243ञ(J)

पंचायतों के लेखाओं की संपरीक्षा

243ट(K)

पंचायतों के लिए निर्वाचन

243ठ(L)

संघ राज्यक्षेत्रों को लागू होना

243ड़(M)

इस भाग का कतिपय क्षेत्रों को लागू न होना

243ढ़(N)

विद्यमान विधियों और पंचायतों का बना रहना

243ण(O)

निर्वाचन संबंधी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप का वर्जन

पंचायतीराज संस्थाओं के कार्य (11वीं अनुसूची एवं अनुच्छेद 243 छ: के अनुसार) – 29 विषय
1. कृषि, जिसके अंतर्गत कृषि विस्तार है।
2 भूमि विकास, भूमि सुधार का कार्यान्वयन, चकबंदी और भूमि संरक्षण।
3. लघु सिंचाई, जल प्रबंध और जलविभाजक क्षेत्र का विकास।
4. पशुपालन, डेयरी उद्योग और कुक्कुट-पालन।
5. मत्स्य उद्योग।
6. सामाजिक वानिकी और फार्म वानिकी।
7. लघु वन उपज।
8. लघु उद्योग, जिनके अंतर्गत खाद्य प्रसंस्करण उद्योग भी है।
9. खादी, ग्रामोद्योग और कुटीर उद्योग
10. ग्रामीण आवासन।
11. पेयजल।
12. ईंधन और चारा।
13. सड़कें, पुलिया, पुल, फेरी, जलमार्ग और अन्य संचार साधन।
14. ग्रामीण विद्युतीकरण, जिसके अंतर्गत विद्युत का वितरण है।
15. अपारंपरिक ऊर्जा स्त्रोत।
16. गरीबी, उन्मूलन कार्यक्रम।
17. शिक्षा, जिसके अंतर्गत प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय भी हैं।
18. तकनीकी प्रशिक्षण और व्यावसायिक शिक्षा।
19. प्रौढ़ और अनौपचारिक शिक्षा।
20. पुस्तकालय।
21. सांस्कृतिक क्रियाकलाप।
22. बाजार और मेले।
23. स्वास्थ्य और स्वच्छता, जिनके अंतर्गत अस्पताल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और औषधालय भी हैं।
24. परिवार कल्याण।
25. महिला और बाल विकास।
26. समाज कल्याण, जिसके अंतर्गत विकलांगों और मानसिक रूप से मंद व्यक्तियों का कल्याण भी है।
27. दुर्बल वर्गों का और विशिष्टतया, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों का कल्याण।
28. सार्वजनिक वितरण प्रणाली।
29. सामुदायिक आस्तियों का अनुरक्षण।

राजस्थान के संदर्भ में पंचायतीराज

\Rightarrow देश में त्रिस्तरीय पंचायतीराज व्यवस्था 2 अक्टूबर, 1959 को लागू करने वाला राजस्थान पहला राज्य बना। इस व्यवस्था में तीन स्तरों जिसमें ग्राम पंचायत, पंचायत समिति तथा जिला परिषद में विभाजित किया गया।
\Rightarrow स्वतंत्रता से पूर्व बीकानेर राजस्थान की प्रथम रियासत थी जिसने पंचायतीराज लागू किया था।
\Rightarrow राजस्थान में पंचायती राज से संबंधित निम्नसमितियों का गठन किया गया है -

  • 1964 सादिक अली समिति
  • 1973 गिरधारी लाल व्यास समिति
  • 1990 हरलाल सिंह खर्रा समिति
  • 2009 कटारिया समिति
  • 2010 वी.एस. व्यास समिति

\Rightarrow वी.एस. व्यास समिति की सिफारिश पर कृषि, प्राथमिक शिक्षा, चिकित्सा तथा स्वास्थ्य, सामाजिक न्याय व अधिकारिता विभाग, महिला व बाल विकास जैसे विभागों को पंचायतीराज को प्रदान किए गये।

राजस्थान में पंचायती राज व्यवस्था
(73वें संविधान संशोधन अधिनियमराजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994  पंचायती राज नियम, 1996 के अधीन)

 

विवरण

ग्राम स्तर (निम्नतम स्तर)

खण्ड स्तर (मध्य स्तर)

जिला स्तर (शीर्ष स्तर)

1.

संस्था का नाम

ग्राम पंचायत

पंचायत समिति

जिला परिषद

2.

क्षेत्राधिकार व गठन

गाँव या गाँवों का समूह

विकास खंड (ब्लॉक)

एक  जिला

3.

सदस्य

सरपंच, उपसरपंच व पंच ग्राम सभा द्वारा निर्वाचित पंच (प्रत्येक वार्ड से एक पंच)

प्रधान, उपप्रधान व सदस्य

1. निर्वाचित सदस्य

2. पदेन सदस्य:

(i) सभी पंचायतों के सरपंच

(ii) संबंधित क्षेत्र के राज्य विधानसभा सदस्य

जिला प्रमुख, उपजिला प्रमुख व सदस्य

1. निर्वाचित सदस्य

2. पदेन सदस्य:

(i) जिले के सभी पंचायत समितियों के प्रधान

(ii) जिले के सभी लोकसभा, राज्यसभा व विधानसभा सदस्य

4.

सदस्यों का निर्वाचन

प्रत्येक वार्ड में पंजीकृत वयस्क सदस्यों द्वारा प्रत्यक्षत: निर्वाचित

पंचायत समिति क्षेत्र के प्रत्यक्षत: निर्वाचित

जिला परिषद क्षेत्र के निर्धारित निर्वाचन क्षेत्र से प्रत्यक्षत: निर्वाचित

5.

निर्वाचित सदस्यों की योग्यता

न्यूनतम आयु 21 वर्ष

आयु 21 वर्ष

आयु 21 वर्ष

6.

निर्वाचित सदस्य संख्या

(न्यूनतम पंच-9) तीन हजार से अधिक जनसंख्या पर प्रति 1 हजार या उसके किसी भाग के लिए 2 अतिरिक्त पंच

(न्यूनतम -15) एक लाख से अधिक जनसंख्या होने पर। प्रत्येक अतिरिक्त 15 हजार या उसके किसी भाग के लिए 2 अतिरिक्त सदस्य

(न्यूनतम -17) चार लाख से अधिक जनसंख्या होने पर। प्रत्येक अतिरिक्त एक लाख या उसके किसी भाग के लिए 2 अतिरिक्त सदस्य

7.

निर्वाचित सदस्यों द्वारा त्यागपत्र

विकास अधिकारी को

प्रधान को

जिला प्रमुख को

8.

अध्यक्ष का पदनाम

सरपंच

प्रधान

जिला प्रमुख

9.

अध्यक्ष का चुनाव

ग्राम सभा के सभी वयस्क सदस्यों द्वारा बहुमत के आधार पर प्रत्यक्षत: निर्वाचित।

केवल निर्वाचित सदस्यों द्वारा बहुमत के आधार पर अपने में से ही निर्वाचित।

केवल निर्वाचित सदस्यों द्वारा बहुमत के आधार पर अपने में से ही निर्वाचित।

10.

अध्यक्ष द्वारा त्यागपत्र

विकास अधिकारी को

जिला प्रमुख को

संभागीय आयुक्त को

11.

उपाध्यक्ष

उपसरपंच

उपप्रधान

उपजिला प्रमुख

12.

उपाध्यक्ष का चुनाव

निर्वाचित पंचों द्वारा बहुमत के आधार पर अपने में से ही।

केवल निर्वाचित सदस्यों द्वारा बहुमत के आधार पर अपने में से ही।

केवल निर्वाचित सदस्यों द्वारा बहुमत के आधार पर अपने में से ही।

13.

उपाध्यक्ष द्वारा पद से त्यागपत्र

विकास अधिकारी को

प्रधान को

जिला प्रमुख को

14.

बैठकें

प्रत्येक 15 दिन में कम से कम एक बार

प्रत्येक माह में कम से कम एक बार

प्रत्येक 3 माह में कम से कम एक बार

15.

सरकारी अधिकारी

ग्राम सचिव (ग्राम सेवक) (ग्राम विकास अधिकारी V.D.O.)

खंड विकास अधिकारी (B.D.O.)

मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO)

  • ग्राम पंचायत – 11316
  • पंचायत समिति – 352
  • जिला परिषद् – 33

15 नवंबर, 2019 को अधिसूचना जारी करके राजस्थान में 57 नई पंचायत समिति तथा 1456 नई ग्राम पंचायतों के गठन को मंजूरी दी गई।      

ग्राम सभा-

  • 73वें संविधान संशोधन द्वारा अनुच्छेद-243(क) के अंतर्गत ग्राम सभा को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया।
  • ग्राम पंचायत क्षेत्र के सभी वयस्क मतदाता इसके सदस्य होते हैं।
  • इनकी बैठक वर्ष में 4 बार (26 जनवरी, 1मई, 15 अगस्त तथा 2 अक्टूबर) बुलाई जाती है।
  • बैठक की अध्यक्षता सरपंच द्वारा तथा अनुपस्थिति में उपसरपंच द्वारा।
  • राजस्थान में ग्राम सभाओं का शुभारम्भ 26 जनवरी, 1990 को सांगानेर (जयपुर) पंचायत समिति की मुहाना ग्राम पंचायत में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा किया गया।
  • बैठक बुलाने के लिए 1/10 सदस्यों का समर्थन आवश्यक है।
  • संवैधानिक मान्यता प्राप्त पंचायतीराज की सबसे छोटी इकाई है।    

वार्ड सभा-

  • पहला राज्य, जहाँ जनवरी, 2000 में वार्ड सभाओं का गठन किया गया।
  • वार्ड के सभी सदस्य जिसकी अध्यक्षता वार्ड पंच द्वारा की जाती है।
  • यह पंचायतीराज की सबसे छोटी इकाई होती है।
  • प्रतिवर्ष 2 बैठकें होती हैं कोरम 1/10 सदस्य का होना चाहिए।

सरपंचप्रधान और प्रमुखतुलनात्मक अध्ययन

 

आधार बिन्दु

सरपंच (ग्राम पंचायत)

प्रधान (पंचायत समिति)

प्रमुख (जिला परिषद्)

1.

निर्वाचक मण्डल

पंचायत सर्किल के निर्वाचक (मतदाता)

पंचायत समिति के निर्वाचित सदस्य

जिला परिषद के निर्वाचित सदस्य

2.

निर्वाचन विधि

प्रत्यक्ष अर्थात् सीधे वयस्क मतदाताओं द्वारा किन्तु यदि पंचायत के मतदाता सरपंच का निर्वाचन करने में असफल रहते हैं तो राज्य सरकार रिक्त स्थान पर 6 माह की कालावधि के भीतर निर्वाचन द्वारा भरे जाने तक किसी व्यक्ति को नियुक्त करेगी और तब तक वह निर्वाचित सरपंच समझा जाएगा।

अप्रत्यक्ष अर्थात् जनता द्वारा निर्वाचित पंचायत समिति के सदस्यों द्वारा आकस्मिक रिक्त होने पर वे निर्वाचन से इस पद को पुन: भरते हैं यदि वह रिक्ति एक माह से अधिक की हो।

अप्रत्यक्ष अर्थात् जनता द्वारा निर्वाचित जिला परिषद के सदस्यों द्वारा।

3.

पदावधि

पाँच वर्ष सामान्यत:

पाँच वर्ष सामान्यत:

पाँच वर्ष सामान्यत:

4.

योग्यताएँ

- पंचायती राज संस्था के मतदाताओं की सूची में मतदाता के रूप में रजिस्ट्रीकृत हो।

- कम से कम 21 वर्ष का हो।

- पंचायती राज संस्था के मतदाताओं की सूची में मतदाता के रूप में रजिस्ट्रीकृत हो।

- कम से कम 21 वर्ष का हो।

- पंचायती राज संस्था के मतदाताओं की सूची में मतदाता के रूप में रजिस्ट्रीकृत हो।

- कम से कम 21 वर्ष का हो।

5.

आरक्षण

नियमानुसार एससी, एसटी, ओबीसी तथा इन वर्गों एवं सामान्य वर्ग की महिलाओं के लिए अध्यक्ष पद के लिए भी आरक्षण होगा जो कि चक्रानुक्रम में होगा।

नियमानुसार एससी, एसटी, ओबीसी तथा इन वर्गों एवं सामान्य वर्ग की महिलाओं के लिए अध्यक्ष पद के लिए भी आरक्षण होगा जो कि चक्रानुक्रम में होगा।

नियमानुसार एससी, एसटी, ओबीसी तथा इन वर्गों एवं सामान्य वर्ग की महिलाओं के लिए अध्यक्ष पद के लिए भी आरक्षण होगा जो कि चक्रानुक्रम में होगा।

6.

शपथ

रिटर्निंग अधिकारी या सक्षम अधिकारी

रिटर्निंग अधिकारी या सक्षम अधिकारी

रिटर्निंग अधिकारी या सक्षम अधिकारी

7.

त्यागपत्र

सरपंच अपना त्यागपत्र संबंधित पंचायत समिति के विकास अधिकारी को संबोधित करके देता है।

प्रधान अपना त्यागपत्र अपने जिले के जिला प्रमुख को संबोधित करके देता है।

प्रमुख अपना त्यागपत्र अपने खण्ड आयुक्त को संबोधित करके देता है।

8.

अविश्वास प्रस्ताव

पंचायत के 1/3 वार्ड पंचों द्वारा अविश्वास प्रस्ताव लाया जा सकता है जिस पर विचार हेतु सक्षम अधिकारी तीस दिन में बैठक बुलाएगा, जो स्थगित नहीं की जा सकती है। प्रस्ताव 2/3 बहुमत से पारित होने पर पद रिक्त माना जाएगा किन्तु ऐसा प्रस्ताव विफल हो जाने पर उस दिन से एक वर्ष तक पुन: अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया जा सकता है। अपने निर्वाचन के प्रारंभिक दो वर्षों में भी उसके विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया जा सकता है।

पंचायत समिति के 1/3 सदस्यों द्वारा (शेष वही प्रक्रिया जो सरपंच के अविश्वास प्रस्ताव पर लागू होती है।)

जिला परिषद् के 1/3 सदस्यों द्वारा (शेष वही प्रक्रिया जो सरपंच/प्रधान के अविश्वास प्रस्ताव पर लागू होती है।)

  • राजस्थान पंचायतीराज संशोधन अधिनियम, 2018 के अनुसार पंच या सदस्यों के रूप में निर्वाचन लड़ने के लिए निरर्हता संबंधी प्रावधान में कुष्ठ रोग से ग्रस्त व्यक्ति को निरर्हित नहीं माना है। इसके अलावा दो बच्चों की गणना में निरर्हता के संबंध में दिव्यांग बच्चों की गणना नहीं की जायेगी।

स्थानीय स्वशासन- नगरीय शासन

  • स्थानीय शासन ग्रामीण इकाईयों की भाँति शहरों में भी प्राचीन काल से चला आ रहा है जिसमें मेगस्थनीज ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व भारत के एक नगर के शासन का उल्लेख किया है। अबुल फजल की आईन-ए-अकबरी में नगरीय शासन का विवरण दिया गया है।
  • अंग्रेजों द्वारा 1687 में मद्रास में नगर निगम की स्थापना की गई थी।

74वां संविधान संशोधन अधिनियम

  • लागू/पारित – 1जून, 1993
  • भाग – 9 क में नगरपालिकाएँ नाम से
  • अनुसूची – 12वीं
  • अनुच्छेद – 243P – ZG तक
  • विषय – 18

इस संविधान की प्रमुख विशेषताएँ –

  • इसके द्वारा तीन प्रकार के नगर निकायों का गठन किया गया-

(A) नगर पंचायत - वह क्षेत्र जो ग्रामीण क्षेत्र से शहरी क्षेत्र में परिवर्तित हो रहा है।
(B) नगरपरिषद् – छोटे शहरी क्षेत्रों के लिए।
(C) नगर निगम – बड़े शहरी क्षेत्रों के लिए।

  • नगरीय संस्थाओं के तीनों स्तरों पर सदस्यों का चुनाव जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से किया जाएगा लेकिन मध्यवर्ती एवं उच्च स्तर पर अध्यक्षों का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित सदस्यों द्वारा किया जाएगा।
  • नगरीय संस्थाओं में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण प्रदान किया गया है तथा सामान्य वर्ग में आरक्षण प्रदान किया गया है तथा सामान्य वर्ग में महिला को 1/3 आरक्षण निश्चित किया गया है हालांकि कुछ राज्यों में यह आरक्षण 50% तक कर दिया गया है।
  • नगरीय संस्थाओं का कार्यकाल प्रथम बैठक से 5 वर्ष निर्धारित किया गया है, इस दौरान यदि पंचायत का विघटन हो जाता है तो अगली पंचायत का गठन 6 महीने से पहले करना होगा तथा यह शेष कार्यकाल के लिए ही गठित होगी।
  • नगरीय संस्थाओं में चुनाव लड़ने की न्यूनतम आयु 21 वर्ष निश्चित की गई है।
  • अनु.-243 y के अंतर्गत नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति के लिए राज्य वित्त आयोग का गठन किया जाएगा। पंचायतों में यह वित्त आयोग का प्रावधान अनु. 243-I में किया गया।
  • नगरपालिकाओं के लिए निर्वाचन का काम राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा किया जाता है जिसका प्रावधान अनु.-243 ZA तथा पंचायतों के लिए यह प्रावधान अनु.-243 K में किया गया है।

राजस्थान में नगरीय शासन व्यवस्था

  • माउण्ट आबू में 1864-65ई. में राज्य की पहली नगरपालिका जोड़ी गई। 1866 में अजमेर के ब्यावर में नगरपालिका की स्थापना की गई।
  • स्वतंत्रता के पश्चात राजस्थान में नगरपालिका कस्बा अधिनियम पारित किया गया लेकिन 1959 में इस अधिनियम को समाप्त कर राजस्थान नगरपालिका अधिनियम लागू किया गया।
  • 74वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा राजस्थान में नगरीय शासन को तीन स्तर पर मान्यता मिल गई।

(A) नगर पंचायत - वह क्षेत्र जो ग्रामीण क्षेत्र से शहरी क्षेत्र में परिवर्तित हो रहा है।
(B) नगरपरिषद् – छोटे शहरी क्षेत्र के लिए।
(C) नगर निगम – बड़े शहरी क्षेत्रों के लिए।

 

 

नगरपालिका (152)

नगर परिषद (34) प्रथम श्रेणी

नगर निगम (07)

1. जनसंख्या

20 हजार से अधिक किन्तु एक लाख तक जनसंख्या

1 लाख से अधिक व पाँच लाख तक जनसंख्या

पाँच लाख से अधिक जनसंख्या

2. अध्यक्ष (शीर्ष)

अध्यक्ष/सभापति

सभापति

महापौर (मेयर)

3. उपाध्यक्ष

उपाध्यक्ष/ उपसभापति

उपसभापति

उपमहापौर (डिप्टी मेयर)

4. वार्ड सदस्य

पार्षद

पार्षद

पार्षद

नगरीय स्वशासन की विभिन्न संस्थाओं से संबंधित प्रावधान

सदस्यों का निर्वाचन

वयस्क मताधिकार के आधार पर वार्डों से प्रत्यक्षत: निर्वाचन किया जाता है। शहरी स्थानीय निकाय के प्रत्येक वार्ड से एक पार्षद चुना जाता है।

सदस्यों की संख्या

नगर परिषद/नगरपालिका में सदस्यों की न्यूनतम संख्या 13 होगी।

पार्षदों की योग्यताएँ

पार्षद के चुनाव के लिए न्यूनतम आयु 21 वर्ष, उसका नाम उस क्षेत्र की मतदाता सूची में पंजीकृत हो, निर्वाचन कानून के तहत निरर्ह घोषित नहीं किया गया हो।

अध्यक्ष/ उपाध्यक्ष का चुनाव

निर्वाचित पार्षदों द्वारा अपने में से ही या अन्य बाहरी सदस्य को बहुमत से पारित कर अप्रत्यक्ष चुनाव द्वारा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव करेंगे।

कार्यकाल

प्रत्येक नगरीय स्थानीय निकाय का कार्यकाल 5 वर्ष होगा।

विघटन

किसी निकाय के विघटन की स्थिति में विघटन की तिथि से 6 माह में चुनाव कराने आवश्यक हैं लेकिन केवल 6 माह की अवधि शेष है तो चुनाव सामान्य चुनाव के साथ होंगे। पुनर्गठित निकाय शेष अवधि के लिए ही कार्य करेगा।

आरक्षण

सभी पदों पर सभी वर्गों में 1/3 स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित हैं जो क्रमिक रूप से रोटेशन द्वारा निर्धारित किए जाते हैं। अनुसूचित जातियों व जनजातियों के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में स्थान आरक्षित होंगे। राज्य सरकार ने पिछड़े वर्गों के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में स्थान आरक्षित किए हैं।

12वीं अनुसूचीनगरपालिकाओं के अधिकार
संविधान के 74वें संशोधन द्वारा 12वीं अनुसूची (अनुच्छेद-243ब) में 18 विषयों को सम्मिलित किया गया है। राज्य विधानमण्डल विषयों पर नगरपालिकाओं को अधिकार दे सकता है-
1. नगर योजना।
2. भूमि प्रयोग व भवन निर्माण।
3. सामाजिक विकास हेतु योजनाएँ।
4. सड़कें और पुल निर्माण।
5. घरेलू, वाणिज्य एवं औद्योगिक प्रयोजनार्थ जलापूर्ति।
6. स्वास्थ्य, सफाई सेवा और कूड़ा-करकट का प्रबंधन।
7. अग्निशमन सेवाएँ
8. नगरीय, वानिकी, पर्यावरण संरक्षण आदि पहलुओं का प्रबंधन।
9. विकलांग व मंदबुद्धि आदि के सामाजिक हितों की सुरक्षा।
10. बस्तियों का सुधार-उन्नयन।
11. शहरी गरीबी कम करने का प्रयास।
12. बाग-बगीचे, खेल-मैदान की सुविधाएँ।
13. सांस्कृतिक व कला पक्षों का संवर्धन।
14. कब्रों, श्मशानों तथा उनके लिए भूमि व्यवस्था।
15. जन्म-मृत्यु पंजीकरण।
16. पशुओं पर क्रूरता की रोकथाम।
17. सड़कों का विद्युतीकरण, बस स्टॉप, वाहन पार्किंग व्यवस्था का संधारण।
18. बूचड़खानों का विनियमन।

जिला योजना समिति –
अनु.-243 ZD के तहत प्रत्येक जिले में जिला स्तर पर एक जिला योजना समिति का गठन किया जाएगा जो जिले में पंचायतों और नगरपालिका द्वारा बनाई गई योजना को समेकित करेगी। जिला आयोजना समिति में कुल 25 सदस्य होंगे जिनमें से 20 सदस्य ग्रामीण और नगरीय क्षेत्रों की जनसंख्या के अनुपात में जिला परिषद/नगर निकायों के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों में से निर्वाचित किए जाएँगे।           
5 अन्य सदस्य जिनमें-

1. जिला कलेक्टर
2. CEO, जिला परिषद्
3. अतिरिक्त मुख्य कार्यकारी अधिकारी, जिला परिषद्
4. दो व्यक्ति जिसमें संसद सदस्य/विधानसभा सदस्य राज्य सरकार द्वारा निर्देशित नाम             

महानगर योजना समिति –

  • जिला योजना समिति के माध्यम से ही महानगर योजना समिति का गठन किया गया जो महानगरों के विकास के लिये योजना बनायेगी। इसके 2/3 सदस्य नगरपालिकाओं एवं पंचायतों के अध्यक्षों द्वारा चुने जायेंगे।

छावनी मण्डल –

  • ऐसे क्षेत्रों में की जाती है जहाँ सेना निवास करती है। यह रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करता है तथा इसकी अध्यक्षता छावनी के कमांडिंग ऑफिसर द्वारा की जाती है। राजस्थान में केवल नसीराबाद (अजमेर) में स्थानीय प्रशासन हेतु छावनी मण्डल स्थापित है।