जिला प्रशासन

Note- राजस्थान में संभागीय व्यवस्था की शुरूआत 1949 में हीरालाल शास्त्री सरकार द्वारा की गई। 1962 में मोहनलाल सुखाड़िया सरकार के द्वारा संभागीय व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया। 1987 में हरिदेव जोशी सरकार के द्वारा संभागीय व्यवस्था की शुरूआत दुबारा की गई।
जिलाधीश/कलेक्टर/कलक्टर
- प्रशासनिक सुगमता की दृष्टि से सभी राज्यों को छोटी-छोटी इकाईयों में विभक्त किया जाता है, जिन्हें जिलों की संज्ञा दी जाती है।
- 1772 में गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स के द्वारा कलेक्टर के पद का सृजन किया गया तथा इसी के साथ आधुनिक जिला प्रशासन की शुरूआत मानी जाती है। रॉल्फ शैल्डन प्रथम जिला कलेक्टर बने थे।
- जिलाधीश जिला प्रशासन का सबसे महत्वपूर्ण तथा प्रभावशाली पद होता है। इसका चयन संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा के माध्यम से किया जाता है।
- राज्य प्रशासनिक सेवा का वरिष्ठ अधिकारी जिसकी भारतीय प्रशासनिक सेवा में पदोन्नति हुई है। उसे भी जिलाधीश के रूप में नियुक्त किया जा सकता है।
- यह अधिकारी राज्य सरकार के लिए कार्य करता है परन्तु इसकी नियुक्ति, शर्तें, वरिष्ठता संबंधी नियम, अनुशासन आदि केन्द्र सरकार के द्वारा निर्धारित किए जाते हैं।
- अनुच्छेद 311 के अन्तर्गत इसके कार्यकाल को सुरक्षा प्रदान की गई है जिसके अनुसार केन्द्र सरकार की अनुमति के बिना इसे पद से नहीं हटाया जा सकता है।
- यद्यपि इन पर प्रशासनिक नियंत्रण राज्य सरकार का होता है।
- जिलाधीश जिला प्रशासन का मस्तिष्क, आँख, कान, नाक होता है। तथा इसी के द्वारा जिले के समस्त प्रशासन का संचालन किया जाता है।
कार्य/भूमिका-
(1) जिले में कानून तथा शान्ति व्यवस्था को बनाए रखना।
(2) न्यायिक अधिकारी के रूप में- जिला पुलिस तंत्र पर नियंत्रण रखना, जिले में प्रदर्शन तथा आतंकवादी गतिविधियों पर नियंत्रण रखना, जाति तथा मूल निवास आदि प्रमाण पत्र जारी करना, जिला कारागार का निरीक्षण करना।
(3) जिला राजस्व अधिकारी के रूप में- राजस्व एकत्रण, राजस्व दर का निर्धारण, राजस्व संबंधी मुकदमों की सुनवाई करना, भू-अभिलेखों का क्रियान्वयन, नक्शा निर्माण, सर्वेक्षण संबंधी आकड़ों को सुरक्षित रखना।
(4) जिला निर्वाचन अधिकारी के रूप में- संसद तथा विधानमंडलों के चुनावों का सम्पादन करना।
(5) जिला आपदा प्रबन्धक अधिकारी के रूप में- आपदा संरक्षण करना।
(6) जिले में प्रोटोकाल संबंधी दायित्वों का पालन करना।
(7) जिले में अशान्ति की स्थिति में धारा 144 की उद्घोषणा करना।
(8) जनता की शिकायतों का निवारण करना।
(9) समन्वयकर्ता की भूमिका निभाना- राज्य प्रशासन तथा जिला प्रशासन के मध्य, जिला प्रशासन व स्थानीय प्रशासन के मध्य समन्वयकर्ता की भूमिका निभाता है।
- रजनी कोठारी ने जिलाधीश के पद को संस्थागत करिश्मा की संज्ञा दी है।
उपखण्ड अधिकारी (S.D.M.)
- उपखण्ड अधिकारी (S.D.M.) जिला तथा तहसील के मध्य समन्वय की भूमिका का निर्वहन करता है। इसका चयन राज्य की प्रशासनिक सेवा की परीक्षा के माध्यम से किया जाता है। यह अपने क्षेत्र के प्रशासन का सम्पादन जिलाधीश के नेतृत्व में करता है।
भूमिका-
(1) दण्डनायक के रूप में अपने क्षेत्र में शान्ति व्यवस्था को बनाए रखना, पुलिस थानों तथा चौकियों का निरीक्षण करना, अशान्ति की स्थिति में धारा-144 को लागू करना।
(2) उपखण्ड के राजस्व अधिकारी के रूप में भू-अभिलेख तैयार करना, राजस्व प्रशासन के निम्न स्तरीय पदाधिकारी- तहसीलदार, कानूनगो, पटवारी के कार्यों का निरीक्षण करना।
(3) न्यायिक अधिकारी के रूप में भूमि-सीमा विवाद, भू-राजस्व, सम्पत्ति सम्बन्धी विवादों की सुनवाई करना।
(4) प्रशासनिक अधिकारी के रूप में गाँवों में आर्थिक सामाजिक विकास कार्यक्रमों का संचालन तथा उनका निरीक्षण करना।
(5) जन्म-मृत्यु सम्बन्धी प्रमाण-पत्र जारी करना।
(6) नाम-परिवर्तन सम्बन्धी प्रमाण-पत्र जारी करना।
तहसीलदार
- राजस्व प्रशासन के व्यवस्थित संचालन के लिए राज्य में प्रत्येक उपखण्ड को तहसीलों में विभाजित किया गया है। जिसका प्रमुख पदाधिकारी तहसीलदार होता है।
- इसका चयन राजस्थान तहसीलदार सेवा के अन्तर्गत किया जाता है।
- इस पर राजस्व मण्डल का नियंत्रण होता है जो कि राजस्थान में अजमेर में स्थित है।
कार्य/भूमिका-
(1) भू-राजस्व से संबंधित कार्य:-
तहसील में भू-अभिलेखों का संरक्षण करना, पटवारी- कानूनगो व भूमि निरीक्षकों के कार्यों का निरीक्षण करना, भू-राजस्व के संकलन पर निगरानी रखना।
(2) तहसीलदार द्वितीय क्षेणी के कार्यपालक दण्डनायक के रूप में कार्य करता है तथा वह चारागाह की भूमि, सीमा विवाद, भू-सम्पत्ति का विभाजन, सरकारी भूमि का अतिक्रमण आदि से सम्बन्धित विवादों की सुनवाई करता है।
(3) प्रशासनिक कार्य:-
1. जन्म मृत्यु का पंजीयन करना।
2. विकास कार्यक्रम तथा योजनाओं का संकलन करना।
3. प्रोटोकाल सम्बन्धी दायित्वों का पालन।
4. राहत कार्यों में भुगतान अधिकारी।
पटवारी/पटवार
- राजस्व प्रशासन का सबसे प्राचीन तथा पुराना पदाधिकारी पटवारी है जिसका प्रचलन भारत में मुगलकाल में ही विद्यमान है।
- यह राजस्व प्रशासन की सबसे प्राचीन धरोहर मानी जाती है। इस पद पर यह अपने कार्यों के लिए राजस्व मंडल के प्रति उत्तरदायी होता है।
- इस पद पर कार्मिक नियुक्ति हेतु राजस्व मंडल उत्तरदायी है।
भूमिका-
(1) ग्राम स्तर पर भू-राजस्व एवं शुल्कों का एकत्रण करना।
(2) एकत्रित राजस्व को तहसील मुख्यालय में जमा करवाना।
(3) खेत की सीमा, सर्वेक्षण से सम्बन्धित आवेदन प्राप्त करना।
(4) किसानों को जोन से सम्बन्धित पूर्ण जानकारी प्रदान करना।
(5) किसानों को बैंक ऋण प्राप्ति की सुविधा, भू-विक्रय आदि कार्य के लिए जानकारी उपलब्ध कराना।
(6) राजस्व अभिलेखों की नकल प्राप्त करना।
लोक नीति
परिभाषा
- इसका अभिप्राय सरकार के द्वारा बनाई गई नीतियों से माना जाता है। अर्थात जनता की विविध माँगों तथा कठिनाईयों को दूर करने के लिए सरकार के द्वारा जो नीतियाँ बनाई जाती है। उन्हें लोक नीति की संज्ञा दी जाती है।
- लोकतांत्रिक शासन में लोक नीति के माध्यम से सरकार अपनी शासन प्रणाली को व्यावहारिक रूप प्रदान करती है।
लोक नीति के लक्षण/विशेषताएँ:-
(1) लोक-कल्याण पर आधारित होती हैं।
(2) सरकारी संस्थाओं के द्वारा निर्मित होती हैं।
(3) भविष्योन्मुख होती हैं।
(4) जटिल प्रक्रिया का परिणाम होती हैं।
(5) इसमें विभिन्न निकायों तथा प्राधिकरणों का भी योगदान होता हैं।
(6) सकारात्मक या नकारात्मक दोनों हो सकती हैं।
लोक नीति के निर्माण के चरण:-
(1) समस्या को पहचानना
(2) समस्या के समाधान के लिए उपलब्ध विकल्पों का तुलनात्मक अध्ययन करना।
(3) सबसे उत्तम विकल्प का चयन करना।
(4) नीतियों का क्रियान्वयन करना।
(5) क्रियान्वयन की देखरेख करना।
(6) मूल्यांकन करना।
लोक नीति के प्रकार
1. विषय वस्तु के आधार पर इसको निम्न प्रकार से विभाजित किया जा सकता है-
- आर्थिक नीति- व्यापार नीति, मुद्रा नीति
- सामाजिक नीति- शिक्षा नीति, महिलाओं से संबंधित नीति
- राजनीतिक-विदेश नीति, सुरक्षा नीति
2. तकनीकी प्रकृति के आधार पर इसको निम्न प्रकार से विभाजित किया जा सकता है-
- तात्विक नीति- पूरे समाज के विकास से सम्बन्धित नीति-शिक्षा, रोजगार के अवसर।
- नियंत्रक नीति- सरकार की ओर से काम करने वाली संस्थाओं को लेकर।
- निमार्णकारी नीति- किसी क्षेत्र विशेष में नई संस्थाओं का गठन करना।
- वितरक नीति- समाज के किसी विशिष्ट वर्ग के लिए नीति।

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