राज्य सूचना आयोग
स्थापना
- राज्य सूचना आयोग की स्थापना सूचना के अधिकार अधिनियम-2005 के तहत राजस्थान में 18 अप्रैल 2006 को हुई।
कार्या लय
- राज्य सूचना आयोग का कार्यालय जयपुर में है।
संरचना
- राज्य सूचना आयोग में एक मुख्य सूचना आयुक्त एवं 10 से अनधिक अन्य सूचना आयुक्त होंगे।
नि युक्ति
- राज्य सूचना आयोग के सदस्यों की नियुक्ति राज्य के राज्यपाल द्वारा एक समिति की सिफारिश पर की जायेगी। समिति में तीन सदस्य होंगे-
1. राज्य का मुख्यमंत्री
2. राज्य विधानसभा में विपक्ष का नेता
3. एक केबिनेट मंत्री
का र्यकाल
- राज्य मुख्य सूचना आयुक्त एवं अन्य राज्य सूचना आयुक्त सरकार द्वारा निर्धारित अवधि तक पद पर बने रह सकते हैं।
- राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त के वेतन, भत्ते एवं अन्य सेवा शर्तें सरकार द्वारा निर्धारित किये जाएंगे।
कार्य (Functions)
- राज्य सूचना आयोग का यह दायित्व है कि वह किसी भी व्यक्ति से प्राप्त शिकायतों का निवारण करे।
- आयोग को उचित आधार पर जाँच करने की शक्ति प्राप्त है, (बिना शिकायतें मिले) अर्थात् आयोग किसी ठोस आधार पर किसी मामले की जाँच का आदेश दे सकता है।
प्रति वेदन
- राज्य सूचना आयोग अपना वार्षिक प्रतिवेदन प्रतिवर्ष राज्य सरकार को प्रस्तुत करता है। सरकार आयोग के प्रतिवेदन को विधानमण्डल के दोनों सदनों के समक्ष रखती है।
लोकायुक्त
- भारत में सबसे पहले लोकायुक्त कानून उड़ीसा ने 1970 में पारित कर दिया था किन्तु लोकायुक्त संस्था की स्थापना 1983 में हुई। 1971 में महाराष्ट्र प्रथम राज्य है जहाँ पर लोकायुक्त संस्था की स्थापना की गई थी।
- राजस्थान में 1973 में यह संस्था स्थापित की गई थी। राजस्थान में उपलोकायुक्त का भी प्रावधान किया गया है।
- प्रथम लोकायुक्त – आई.डी. दुआ
- उप लोकायुक्त – के.पी.यू. मेनन
नियुक्ति
- राज्यपाल द्वारा निम्न पदाधिकारियों की सलाह पर -
- मुख्यमंत्री से
- विधानसभा में विपक्ष के नेता से
- राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से सलाह करते हैं।
योग्यता
- उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश रह चुका हो या सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश रह चुका हो।
कार्य काल
- 5 वर्ष या 65 वर्ष जो भी पहले हो|
वेत न
- उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के बराबर होता है।
कार्य -
1. मंत्रियों तथा राज्य कर्मचारियों के विरुद्ध जनता से प्राप्त शिकायतों की जाँच करता है।
2. प्राप्त शिकायतों की निष्पक्ष जाँच करता है।
3. जाँच के बाद मामले को निरस्त करना या सक्षम अधिकारी को कार्यवाही हेतु अनुशंसा करना।
4. दुर्भावना से की गई शिकायतों के क्रम में शिकायतकर्ता को दण्डित करता है। (6 माह की सजा व 50 हजार रुपये जुमार्ना)
5. लोकायुक्त जाँच के लिए राज्य की जाँच एजेन्सियों की सहायता लेते हैं।
6. ये मामले से सम्बंधित फाइलें व दस्तावेज मँगा सकते हैं।
यह निम्न के विरुद्ध जाँच नहीं कर सकता-
1. मुख्यमंत्री
2. न्यायिक सेवा के सदस्यों के विरुद्ध
3. महालेखाकार राजस्थान
4. राजस्थान लोक सेवा आयोग
5. निर्वाचन आयुक्त
6. विधानसभा सचिवालय के कर्मचारी
7. सरपंच, वार्डपंच, MLA और नगरीय संस्थाओं के निर्वाचित प्रतिनिधि।
- सिविल कोर्ट के अधिकार प्राप्त होते हैं। (1908 में)
- यह अपनी वार्षिक रिपोर्ट राज्यपाल को देता है। (प्रतिवर्ष)
अ न्य नाम –
1. नख दन्त विहीन संस्था
2. Vegetarian Tiger
3. निष्प्रभावी संस्था
- यह निष्प्रभावी संस्था है क्योंकि यह संस्था अभी तक एक संतोषजनक स्तर को नहीं छू पाई है।
- यह संस्था पूर्ण अधिकार प्राप्त संस्था नहीं है।
- यह एक परामर्शदात्री संस्था है।
- इसकी सलाह मानने के लिए बाध्यकारी नहीं है।
- यह मुख्यमंत्री, विधायक, सरपंच, पंच, नगरीय संस्थाओं के जन प्रतिनिधियों के विरुद्ध सुनवाई नहीं करती है।
- भारत में कुल 26 राज्यों व एक केन्द्रशासित प्रदेश दिल्ली में लोकायुक्त व्यवस्था है।


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