Part- 01 नियन्त्रण व समन्वय

ग्रंथियाँ (Glands) :-
• कोशिकाओं का वह समूह जो तरल पदार्थों का स्त्राव करें, उसे ग्रंथियाँ कहा जाता है।
• मानव में ग्रंथियाँ तीन प्रकार की होती हैं- 
1. अन्त: स्त्रावी
2. बहि: स्त्रावी
3. मिश्रित

अन्त: स्त्रावी :- कोशिकाओं का वह समूह जो तरल पदार्थों के रूप में हार्मोन्स का स्त्राव करे, अन्त:स्त्रावी ग्रंथियाँ कहलाती है।
• इन ग्रंथियों में नलिकाकार संरचनाएँ नहीं पायी जाती इसलिए इन्हें नलिका विहीन ग्रंथियाँ कहा जाता है।
• अन्त: स्त्रावी ग्रंथियाँ तंत्रिका तंत्र के साथ मिलकर शरीर का नियमन तथा नियंत्रण करती है, जिसे न्यूरो एण्डो क्राइनोलॉजी कहा जाता है।
• अन्त: स्त्रावी विज्ञान का जनक थॉमस एडिसन को कहा जाता है।
• मानव में इनकी संख्या 9 होती है।

हार्मोन :-
• वे रासायनिक पदार्थ जो प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, वसीय अम्ल व स्टेरॉइड प्रकृति के होते हैं, हार्मोन कहलाते हैं।
• हार्मोन शब्द स्टारलिंग ने दिया था।
• सबसे पहले खोजा गया हार्मोन ‘सिक्रेटीन’ है।
• हार्मोनों का लक्षित अंग दूर होता है।


पीयूष ग्रंथि :-

पीयूष ग्रंथि मस्तिष्क के अग्र भाग में स्फेनाइड   हड्‌डी के सेला टर्सिका नामक गुहा में पायी जाती है।
• पीयूष ग्रंथि हाइपोथैलेमस से इन्फडी बुलम द्वारा जुड़ी रहती है।
• पीयूष ग्रंथि मानव की सबसे छोटी अन्त:स्त्रावी ग्रंथि है।
• इनका भार 0.3-0.4 ग्राम होता है।
• इनका आकार मटर के दाने जैसा होता है।

पीयूष ग्रंथि से निकलने वाले हार्मोन :-
1. GH
2. LH
3. ACTH
4. TSH
5. FSH
6. MSH
7. प्रोलेक्टिन/मिल्क हार्मोन
8. ऑक्सिटॉसिन/पिटोसिन
9. ADH

पीयूष ग्रंथि से निकलने वाले हार्मोन :-

1. GH (Growth Harmon)/वृद्धि हार्मोन/ सोमेटोट्रॉपिक हार्मोन :-
• यह शरीर की शारीरिक वृद्धि करता है।
• बाल्यावस्था में इस हार्मोन की कमी से बौनापन (ड्रोफेनिज्म) रोग होता है।
• बाल्यावस्था में इस हार्मोन की अधिकता से भीमकाय (जाइगेटिज्म) रोग होता है।
• एक्रोमिगेली – वयस्क अवस्था में इस हार्मोन की अधिकता से शरीर के किसी विशेष अंग की वृद्धि ज्यादा हो जाती है, जिसे एक्रोमिगेली कहा जाता है।

2. LH (ल्युटिनाइजिंग हार्मोन) :-
• यह हार्मोन महिलाओं में अण्डोत्सर्ग करवाता है।
• पुरुषों में यह हार्मोन शुक्रजनन को प्रेरित करता है। (र्स्पमेटोजिनेसिस)

3. ACTH (एडिनोकार्टिको ट्रोपिक हार्मोन) :-
 यह एड्रीनल ग्रंथि पर कार्य करता है।

4. TSH (थायरॉइड स्टेमुलेटिंग हार्मोन) :-
• 
यह थायरॉइड ग्रंथि से थायरॉक्सिन के स्त्रावण को प्रेरित करता है।

5. FSH (फोलिकल स्टेमुलेटिंग हार्मोन) :-
• 
यह महिलाओं में अण्डजनन (ऊजिनेसिस) को प्रेरित करता है।
• यह महिलाओं में MC को नियंत्रित करता है।
• पुरुषों में यह शुक्रजनन को प्रेरित करता है।
• FSH तथा LH हार्मोन संयुक्त रूप से गोनेडोट्रोपिक हार्मोन कहलाता है।

6. MSH (मेलेनोसाइट स्टेमुलेटिंग हार्मोन) :-
• 
यह मिलेनोसाइट (मिलेनोएमार्फस) को मिलेनिन में बदलता है जिससे त्वचा का रंग गहरा होता है।

7. प्रोलेक्टिन/मिल्क हार्मोन :-
• 
यह दुग्ध ग्रंथियों में दुग्ध निर्माण को प्रेरित करता है।

8. ऑक्सिटॉसिन/पिटोसिन/ Love Harmon/ प्रसव पीड़ा/जन्म सहायक हार्मोन/ Birth Harmon/ दुग्ध हार्मोन :-
• 
यह हार्मोन गर्भवती महिला में पाया जाता है।
• यह हार्मोन गर्भाशय व योनि में अनिश्चित संकुचन पैदा करता है, जिससे गर्भाशय तथा योनि का आकार बढ़ जाता है।
• यह हार्मोन प्रसव के समय पीड़ा उत्पन्न करता है।
• यह दुग्ध ग्रंथियों में दुग्ध निर्माण को प्रेरित करता है।
• वर्तमान में ऑक्सिटॉसिन व प्रोलेक्टिन के टीके गाय व भैंसों को दिये जाते हैं, जिससे इनकी दुग्ध उत्पादन क्षमता बढ़ जाती है।

9. ADH (एन्टीडाई यूरेटिक हार्मोन) (वेसोप्रेसिन) :-
• 
यह शरीर में जल व लवण का संतुलन बनाता है।
• यह शरीर में जल की हानि को कम करता है।
• मरुस्थलीय जीवों में इस हार्मोन की अधिकता होती है जैसे – ऊँट, कंगारू, चूहा अपने जीवन में कभी पानी नहीं पीता।
• लम्बे समय से चाय, कॉफी व एल्कोहॅल के सेवन से इस हार्मोन की कमी हो जाती है, जिससे मूत्र निष्कासन की दर 10-15 गुणा बढ़ जाती है, जिसे डाइबिटीज इन्सीपिडस रोग कहा जाता है तथा इस लक्षण को बहुमूत्रतता (बार-बार मूत्र आना) कहा जाता है।

पिनियल ग्रंथि :-

• यह मस्तिष्क का भाग है।
• यह मस्तिष्क के अग्र भाग में पायी जाती है।
• यह डाईसेफेलॉन के पृष्ठ भाग में पायी जाती है।
• अन्य नाम – जैविक घड़ी, तीसरी आँख (मेंढ़क), मस्तिष्क की रेती, एसिबुलाई।

कार्य :-
• नींद, मूड व रंग का निर्धारण करती है।
• रंग निर्धारण हेतु यह मिलेटोनिन हार्मोन का स्त्रावण करती है।
• मिलेटोनिन MSH के विपरीत कार्य करता है।
• मिलेटोनिन, मिलेनिन को मिलेनोसाइट में बदलता है, जिससे त्वचा का रंग हल्का होता है।
• यह उभयचर व रेपटाइल्स में रंग परिवर्तन में सहायता करता है। (रंग बदलते की प्रक्रिया मेटोक्रोसिस कहलाती है।)
• यह ग्रंथि लैंगिक परिपक्वता में देरी लाती है।
• चूहे की बाल्यावस्था में यदि पिनियल ग्रंथि को निकाल दिया जाये तो उसमें लैंगिक परिपक्वता जल्दी आ जाती है।
• जन्म से अंधे बच्चों में प्रकाश के प्रति कम संवेदनशीलता होती है, जिससे उनमें लैंगिक परिपक्तवता जल्दी आ जाती है।
• एकमात्र ऐसी ग्रंथि जो प्रकाश के द्वारा प्रभावित होती है।
• यह दैनिक प्रक्रियाओं का नियमन करती है, इसलिए इसे जैविक घड़ी कहा जाता है।
• 7-8 वर्ष की उम्र में यह नष्ट होना आरम्भ हो जाती है तथा 14 वर्ष में यह पूर्ण रूप से नष्ट हो जाती है, नष्ट होने के पश्चात् यह CaCO3 व CaPO4 के रूप में जम जाती है इसलिए इसे ‘मस्तिष्क की रेती’ कहा जाता है।

थायरॉइड ग्रंथि :-

• यह मानव शरीर की सबसे बड़ी अन्त:स्त्रावी ग्रंथि है।
• स्थिति – गले में श्वास नली के मध्य।
• महिलाओं में इसका आकार पुरुषों की तुलना में बड़ा होता है।
• भार – 25-30 ग्राम
• NOTE :- एकमात्र ऐसी अन्त:स्त्रावी ग्रंथि जिसके सभी हार्मोन निष्क्रिय अवस्था में पाये जाते हैं।

थायरॉइड़ ग्रंथि से निकलने वाले हार्मोन –
 थायरॉक्सिन :-
• थायरॉक्सिन का निर्माण दो रासायनिक पदार्थों से होता है।
• T4 – टेट्रा आयाडो थाइरोनिन
• T3 – टाई आयडो थाइरोनिन
• थायरॉक्सिन के संश्लेषण में आयोडीन की आवश्यकता होती है इसलिए इसे आयोडीन युक्त हार्मोन कहा जाता है।
• शरीर में आयोडीन की कमी होने पर थायरॉइड ग्रंथि अपने आकार को बढ़ा लेती है।
• रक्त से अधिक मात्रा में आयोडीन के अवशोषण हेतु थायरॉइड ग्रंथि फूल जाती है, जिसे गलगण्ड/घेंघा/गॉइटर रोग कहा जाता है।
• पहाड़ी इलाकों में रहने वाले लोगों में घेंघा रोग सर्वाधिक होता है ,जिसे एन्डेमिक घेंघा कहा जाता है।
• समुद्री भोजन करने वाले लोगों में यह रोग कभी नहीं होता है।
• प्रतिदिन थायरॉक्सिन के संश्लेशण हेतु 120 mgm. आयोडिन की आवश्यकता होती है।
• 100 ml रक्त में 0.3 gm आयोडीन होता है।

¨ थायरॉक्सिन के कार्य :-
• यह शरीर की शारीरिक, मानसिक व जननिक वृद्धि करता है।
• यह उभयचर में कायान्तरण करता है।
• कायान्तरण :- लार्वा अवस्था को वयस्क में रूपान्तरण करने की प्रक्रिया कायान्तरण कहलाती है। जैसे – मेढ़क के लार्वा (टेडपोल) के वयस्क में रूपांतरण।
• महिला के MC का नियंत्रण करता है।
• NOTE :- जिन महिलाओं में इस हार्मोन की कमी हो जाती है वह बांझ कहलाती है।
• यह BMR (Basal metabolic rate) का नियंत्रण करता है।
• BMR (Basal metabolic rate) :- शरीर में ऊर्जा निर्माण की दर BMR कहलाती है।
• BMR α\frac1{Weight}
• BMR भार पर निर्भर करता है।
• BMR बढ़ने पर तापमान में वृद्धि हो जाती है, जिससे भार में कमी आ जाती है।
• BMR ¯ ® तापमान ¯ ® भार ­\uparrow
• हृदय – थाइरोक्सिन \uparrow - हृदय गति बढ़ जाती है।
• पाचन – थाइरोक्सिन ­\uparrow - पाचन की क्रियाशीलता \uparrow­
• [डायरिया (दस्त) लगेगी, भूख बढ़ेगी]
• तंत्रिका – तंत्रिका कोशिका में उपस्थित माइलीन सीट के निर्माण में सहायक।
• रक्त – RBC के निर्माण में प्रेरित
• थाइरोक्सिन \uparrow­ - माइटोकोन्ड्रिया की संख्या ­\uparrow - श्वसन की क्रिया ­\uparrow – भार की कमी कार्बोहाइड्रेट, वसा, प्रोटीन के उपापचय का नियंत्रण करता है।

¨ थायरॉक्सिन की कमी से होने वाले रोग :-
A. जड़वामनता (क्रेटेनिज्म) :-

• बच्चों में थायरॉक्सिन की कमी से यह रोग होता है।
• इस रोग में बच्चे का शारीरिक, मानसिक व जननिक विकास नहीं हो पाता है।
• इस रोग के लक्षण :-
1. मंद बुद्धि
2. पेट बाहर निकला होना
3. सिर बड़ा
4. बौनापन
5. जननांगों का अर्द्धविकसित होना

B. मिक्सिडीमा रोग :- वयस्क में थायरॉइड़ की कमी से ऐसे रोगियों में वसा का अधिक जमाव हो जाता है इस कारण मोटे हो जाते हैं, वजन बढ़ जाता है तथा ठंड के प्रतिसंवेदनशील होते हैं।

C. हाशिमोटा :- थायरॉइड के उपचार में दी जाने वाली औषधियों के खिलाफ प्रतिरक्षा तंत्र (एंटी विष) का निर्माण कर लेता है, जिससे थायरॉइड ग्रंथि नष्ट हो जाती है।

¨ थायरॉक्सिन की अधिकता से होने वाले रोग:-
1. ग्रेव रोग :- इस रोग में नेत्र गोलक के नीचे श्लेष्मा का जमाव हो जाता है, जिससे नेत्र गोलक बड़े हो जाते हैं तथा ऐसे व्यक्तियों की दृष्टि डरावनी/घूरती हुई होती है।
• थायरॉक्सिन के अधिक स्त्राव के कारण थायरॉइड़ ग्रंथि में जगह-जगह गांठे बन जाती है। ऐसे रोगियों में BMR अधिक होती है।

2. कैल्शिटोनिन/थाइरोकैल्सिटोनिन :-
• यह हार्मोन रक्त में Ca2+ की मात्रा को कम करता है।
• यह हार्मोन PTH के विपरीत कार्य करता है।
• यह हार्मोन Vitamin-D के विपरीत कार्य करता है।
• कैल्सिटोनिन हार्मोन की कमी से हाइपर कैल्शिमियाँ तथा अधिकता से हाइपो कैल्शिमियाँ रोग होता है।
(i) पैराथायरॉइड ग्रंथि :-


• खोज – रेनार्ड                                                 
• विस्तृत अध्ययन – सेन्ट्रॉल
• संख्या – 4 (कई बार - 6)
• स्थिति – थायरॉइड ग्रंथि के पृष्ठ भाग में
• भार – 150 mgm
• हार्मोन – PTH (पैराथायरॉइड हार्मोन)/ पैराथ हार्मोन/ कोलिप हार्मोन (सबसे पहले पृथक करने वाले कोलिप थे।)

¨ कार्य :-
• ये रक्त में Ca2+ का अवशोषण बढ़ा देता है तथा फॉस्फेट का अवशोषण बढ़ा देता है।
• यह कैल्शिटोनिन के विपरीत कार्य करता है।
• एक स्वस्थ व्यक्ति में 1 किग्रा कैल्शियम पाया जाता है।
• 100 ml Blood = 12 mgm Ca+ होता है।

¨ PTH की कमी से होने वाले रोग :-
• टिटेनी रोग :- इस रोग में मांसपेशियों का स्वत: ही संकुचन तथा शिथिलन होता है, जिससे कई बार मांसपेशियों में ऐंठन आ जाता है।
• यदि Ca2+ की कमी डायफ्राम पेशिया तथा अन्तरा पर्शुक पेशियाँ में हो जाए तो श्वसन की क्रिया रुक जायेगी, जिससे तुरन्त मृत्यु हो जायेगी।
• PTH की अधिकता से Ca++ की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे हड्डियाँ भंगुर तथा कोमल हो जाती हैं, जिसे ऑस्ट्रियोपोरोसिस रोग कहा जाता है।