Part- 02 नियंत्रण एवं समन्वय

थाइमस ग्रन्थि

• यह ग्रन्थि वक्ष में  हृदय से आगे स्थित होती है।
• यह गुलाबी, चपटी तथा द्विपालित ग्रन्थि है।
• बाल्यावस्था में थाइमस ग्रन्थि का आकार बड़ा होता है तथा यह अधिक सक्रिय होती है परन्तु उम्र बढ़ने के साथ-साथ थाइमस ग्रन्थि का आकार छोटा तथा धीरे-धीरे यह निष्क्रिय हो जाती है।
• थाइमस ग्रन्थि से थाइमोसीन हार्मोन स्त्रावित होता है।
• थाइमस ग्रन्थि प्रतिरक्षा तंत्र का विकास करती है जो रोगों से लड़ने की क्षमता प्रदान करता है
नोट- एड्स रोग में टी-हेल्पर कोशिका में कमी आ जाती है जिससे व्यक्ति का प्रतिरक्षा तंत्र कमजोर हो जाता है।

अग्नाशय ग्रन्थि (Pancreas Gland)

• अग्नाशय ग्रन्थि आमाशय के पश्च भाग में पाई जाती है।
• यह अन्त:स्त्रावी एवं बहिस्त्रावी दोनों प्रकार की ग्रन्थि हैं अत: इस कारण इसे मिश्रित ग्रन्थि कहा जाता है।
• यह शरीर की दूसरी सबसे बड़ी ग्रन्थि है।
• अग्नाशय ग्रन्थि के अन्त:स्त्रावी भाग की खोज लैगरहैंस नामक वैज्ञानिक ने की थी, इस कारण इसके अन्त:स्त्रावी भाग को लैगरहैंस द्विपिकाएं कहते है।
• लैगरहैंस द्विपिकाओं में चार प्रकार की कोशिकाएँ पाई जाती हैं-

1. एल्फा कोशिका - एल्फा कोशिका द्वारा ग्लुकागॉन हार्मोन स्त्रावित होता है।
• ग्लुकागॉन हार्मोन ग्लाइकोजन को ग्लूकोज में परिवर्तित करता है अर्थात् यह रक्त में शर्करा की मात्रा को बढ़ाता है।

2. बीटा कोशिका - बीटा कोशिका द्वारा इन्सुलिन हार्मोन का स्त्रावण होता है।
• इन्सुलिन का व्यापारिक नाम ह्यूमूलिन है।
•  इन्सुलिन को शुद्ध अवस्था में पृथक बेटिंग व बेस्ट ने किया था, इन्सुलिन के टीके की खोज भी इन्होंने ही की थी।
•  मानव इन्सुलिन की खोज सॉन ने की थी।
• इन्सुलिन के प्रोटीन 51 एमिनो एसिड से बने  होते हैं।इन्सुलिन प्रथम प्रोटीन है जिसे प्रयोगशाला में कृत्रिम रूप से तैयार किया गया है।
• यह ग्लुकोज को ग्लाइकोजन में बदलता है अर्थात् रक्त में ग्लूकोज के स्तर को कम करता है।
• इन्सुलिन की कमी से हाइपरग्लाइसीमिया की स्थिति उत्पन्न हो जाती है इस स्थिति में रक्त में शर्करा की मात्रा बढ़ जाती है जिसके  कारण डाइबिटीज मेलाइटस रोग हो जाता है इस रोग के कारण मूत्र में शर्करा की मात्रा बढ़ जाती है।
• इन्सुलीन हार्मोन की अधिकता के कारण रक्त में शर्करा का स्तर कम हो जाता है। इस स्थिति को हाइपोग्लाइसीमिया कहते है।
• सामान्य स्थिति में रक्त में शर्करा की मात्रा  60-120 ml प्रति 100 ml होती है।
• खाने से पहले 60-90 ml प्रति 100 ml एवं खाने के बाद 90-140 ml प्रति 100 ml होती है।

3. डेल्टा या गामा कोशिका- इनके द्वारा सोमेटोस्टेनीन हार्मोन स्त्रावित होता है।
•  यह हार्मोन वृद्धि हार्मोन को संदमित करता है।

4. F कोशिका- इसके द्वारा पॉलीपेप्टाइड नामक हार्मोन स्त्रावित होता है।

► एड्रीनल ग्रंथि या अधिवृक्क ग्रंथि-
• एड्रीनल ग्रंथि शरीर में वृक्क के ऊपर स्थित होती है।
• इनकी संख्या 2 होती है।
• एड्रीनल ग्रंथि को “संकटकालीन ग्रंथि” कहते हैं, क्योंकि यह व्यक्ति को संकटकालीन परिस्थितियों से लड़ने की क्षमता प्रदान करती है।
• एड्रीनल ग्रंथि संकट के समय मस्तिष्क को चुनौती देती है, इस कारण इसे “Wisdom of Life” भी कहा जाता है।
• इसे 3F ग्रंथि भी कहा जाता है क्योंकि
F = Fear (डर)
F = Fight (लड़ाई)
F = Flight (उड़ना)
• एड्रीनल ग्रंथि इन परिस्थितियों में कार्य करती है।
• इसे 4S ग्रंथि भी कहा जाता है क्योंकि यह Suger, Salt, Sex Harmon तथा Stress का नियमन भी करती है।
• अधिवृक्क ग्रंथि के दो भाग होते हैं।
1. बाहरी वल्कुट/कॉर्टेक्स
2. अंदरुनी मध्यांश/मेडूला

एड्रीनल ग्रंथि से स्त्रावित हार्मोन- एड्रीनल ग्रन्थि के मेडूला तथा कॉर्टेक्स भाग से हार्मोन स्त्रावित होते हैं।
• कॉर्टेक्स भाग से 80-90% हार्मोन स्त्रावित होते हैं, जबकि मेडूला भाग 10-20% हार्मोन का स्त्रावण करता है।

कॉर्टेक्स भाग से स्त्रावित हार्मोन-
• ग्लुकोकार्डियस – कार्टेसॉल हार्मोन ग्लूकोकार्डियस हार्मोन का ही भाग है।
• कार्य- ये हार्मोन ग्लूकोज के उपापचय का नियंत्रण करता है, इसलिए इसे “जीवन रक्षक हार्मोन” कहा जाता है।
- ये प्रोटीन तथा वसा के उपापचय का नियंत्रण करता है।
- वर्तमान में इस हार्मोन का उपयोग अंग प्रत्यारोपण तथा गठिया रोग के उपचार में किया जाता है।\
• मिनरलोकार्डियस -  एल्डोस्ट्रिरॉन हार्मोन मिनरलोकॉर्डियस का ही भाग है।
• ये हार्मोन शरीर में सोडियम (Na+) व पोटेशियम (K+) का स्तर कम करना है।
• यह हार्मोन रक्त में सोडियम (Na+) का स्तर बढ़ाता है तथा पोटेशियम (K+) का स्तर कम करता है।
• यदि एड्रीनल ग्रंथि के कॉटेक्स भाग को हटा दिया जाए तो व्यक्ति की तुरन्त मृत्यु हो जाएगी क्योंकि शरीर में संपूर्ण सोडियम का उत्सर्जन हो जाएगा।
• हाइपोनेट्रियम स्थिति में शरीर में Na+ की मात्रा अधिक हो जाती है, इसके विपरीत हाइपरनेट्रियम स्थिति में सोडियम की मात्रा शरीर में बढ़ जाती है।
• हाइपोकेलेमिया की स्थिति में शरीर में पोटेशियम की मात्रा कम एवं हाइपरकेलेमिया की स्थिति में शरीर में पोटेशियम की मात्रा अधिक होती है।

• लिंग हार्मोन -  पुरुषों में लिंग हार्मोन टेस्टोस्टिरॉन तथा मादा में एस्ट्रोजन हार्मोन होते है।
• पुरुषों में लिंग हार्मोन की अधिकता से महिलाओं के समान लक्षण दिखाई देने लगते हैं, जिसे गायनेकोमेस्ट्रिया कहते हैं जैसे – आवाज का पतली होना।
• महिलाओं में लिंग हार्मोन की अधिकता से पुरुषों के लक्षण आ जाते हैं, जिसे विरलिज्म कहा जाता है जैसे- चेहरे पर दाढ़ी मूंछ आना, आवाज मोटी होना आदि।
• पुरुषों में टेस्टोस्टिरॉन हार्मोन की अधिकता से शिश्न की लम्बाई बढ़ जाती है, जिसे मेक्रोजाइगेटोसोमिया कहा जाता है।

मेडूला भाग से स्त्रावित हार्मोन –
मेडूला भाग से एपिनेफ्रीन/एड्रीनेलीन हार्मोन एवं नॉर एपिनेफ्रीन/ नॉर एड्रीनेलीन हार्मोन स्त्रावित होता हैं।

• कार्य- ये हार्मोन डर एवं जोश उत्पन्न करते हैं।
• इन हार्मोनों के प्रभाव से पुतलियों का आकार बढ़ जाता है, रोंगटे खडे हो जाते हैं, हृदय धड़कन बढ़ जाती है एवं रक्त दाब बढ़ जाता है।
• इन दोनों हार्मोन को संकटकालीन हार्मोन तथा 3F हार्मोन कहा जाता है।

कुशिंग रोग:- ये  रोग कार्टेसॉल हार्मोन की अधिकता से होता है, इस स्थिति में शरीर में जल एवं सोडियम का जमाव अधिक हो जाता है।
लक्षण-
i. भार में वृद्धि।
ii. चेहरे पर सूजन।
iii. थकान का अनुभव होना।

एडिसन रोग:- ये रोग कार्टेसॉल हार्मोन की कमी से होता है।
लक्षण-
i. रुधिर दाब कम हो जाता है।
ii. भार में कमी।
iii. मांसपेशियाँ कमजोर।
iv. थकान।

कॉन्स रोग:- ये रोग एल्डोस्टिरॉन हार्मोन की अधिकता से होता है।
• इस रोग में शरीर में लवणों का संतुलन बिगड़ जाता है।
• इस रोग में त्वचा कास्यपूर्ण  हो जाती है।

मादा जनन तंत्र:- मादा जनन तंत्र को दो भागों में बाँटा जाता है।
1. प्राथमिक जननांग

2. द्वितीयक जननांग

1. प्राथमिक जननांग:- अण्डाशय (Ovaries) को प्राथमिक जननांग में शामिल किया जाता है।
• अण्डाशय में अण्डकोशिका का निर्माण होता है, इस कारण इसे प्राथमिक जननांग कहा जाता है।
• प्रत्येक मादा में एक जोड़ा अण्डाशय होता है।
• अण्डाशय पेरिटोनियम झिल्ली द्वारा उदर से सटा रहता है।
• अण्डाशय से दो हार्मोन एस्ट्रोजन तथा प्रोजेस्टेरॉन का स्त्राव होता है।

2. द्वितीयक जननांग:-
(i) अण्डाशय (फैलोपियन नलिका)
• इसकी संख्या दो है।
• अण्डाशय से अण्ड कोशिका फैलोपियन नलिका में पहुँचती है, इसे अण्डोत्सर्ग कहते हैं।
• अण्डोत्सर्ग पीयूष ग्रंथि से निकलने वाले ल्यूटिनाइजिंग हार्मोन के प्रभाव में होती है।
• फैलोपियन नलिका में अण्डकोशिका 48 घंटे रहती है, यदि 48 घंटे के भीतर शुक्राणुओं से अण्डकोशिका का संयोजन नहीं होता तो अण्डकोशिका टूटकर शरीर से बाहर आ जाती है।

(ii) गर्भाशय (Uterus):- गर्भाशय एक नाशपती के समान संरचना होती है।
• गर्भाशय पर तीन झिल्लियाँ पाई जाती है-
i. पेरिमेट्रियम
ii. मायोमेट्रियम
iii. एण्डोमेट्रियम
• पेरिमेट्रियम तथा मायोमेट्रियम स्थायी झिल्लियाँ होती है, जबकि एण्डोमेट्रियम अस्थायी झिल्ली होती जो मासिक चक्र के दौरान टूटती व बनती है।

योनि (Vagina):-
• योनि वंशीय ऊतकों से बनी एक नलिकाकार संरचना होती है।
• योनि का एक सिरा मादा जनन छिद्र के रूप में तथा दूसरा सिरा गर्भाशय की ग्रीवा से जुड़ा रहता है।
• वीर्य योनि द्वारा ही गर्भाशय में पहुँचता है।

अण्डोत्सर्ग (Ovalation):- अण्डोत्सर्ग मासिक चक्र के 14वें दिन होता है।
• अण्डाशय से अण्डकोशिका का फेलोपियन नलिका में आना अण्डोत्सर्ग कहलाता है।

निषेचन (Fertilization):- शुक्राणु तथा अण्डाणु के केन्द्रों के आपस में संलयन को निषेचन कहते हैं।
• इसकी खोज हर्टविग ने सी-अर्चिन में की थी।
• निषेचन की प्रक्रिया फेलोपियन नलिका में होती है।

भ्रूणीय विकास (Embryonic Development):- अगुणित नर (शुक्राणु) व मादा (अण्डाणु) के 23 + 23 गुणसूत्र निषेचन द्वारा द्विगुणित युग्मनज (46 गुणसूत्र) का निर्माण करते हैं।
• विदलन के द्वारा निर्मित 8-16 कोशिकीय युग्मनज मोरुला कहलाता है।
• यह मोरुला आगे चलकर ब्लास्टुला या ब्लास्टोसिस में परिवर्तित होता है।
• युग्मनज की यह ब्लास्टोसिस अवस्था गर्भाशय की भित्ति से जुड़ती है।
• ब्लास्टोसिस अवस्था के पश्चात् गैस्टुला का निर्माण होता है और इस दौरान तीन जनन स्तर विकसित होते हैं।
• सभी अंग व अंगतंत्र का निर्माण इन्हीं जनन स्तरों से होता है।

गर्भकाल:- निषेचन से लेकर जन्म तक का समय गर्भकाल कहलाता है।
मानव में 9 महीने का गर्भकाल।
गाय में 9 महीने का गर्भकाल।
भैंस में 10 महीने का गर्भकाल
चूहा में 22 दिन का गर्भकाल।
कुत्तिया में 2\frac{1}{2} महीने का गर्भकाल।
हाथी में 22 महीने का गर्भकाल।
• चूहे का गर्भकाल न्यूनतम होता है।
• हाथी का गर्भकाल अधिकतम होता है।

अण्डाशय से निकलने वाले हार्मोन:-
1. एस्ट्रोजन:- ये ग्रेफियन फोलिकल से स्त्रावित होता है। इस हार्मोन के प्रभाव से महिला में द्वितीयक लैंगिक लक्षण प्रकट होते हैं इसलिए ऐस्ट्रोजन हार्मोन को ‘सुन्दरता का हार्मोन’ कहा जाता है।
2. प्रोजिस्ट्ररॉन:- ये कार्पल्स ल्यूटियम से निकलता है। जब प्रोजिस्ट्ररॉन का स्तर ऐस्ट्रोजन से ज्यादा होता है तब अण्डोत्सर्ग होता है इसलिए प्रोजिस्ट्रेरॉन हार्मोन को ‘गर्भावस्था का हार्मोन’ कहा जाता है।

महिलाओं में निम्न द्वितीयक लक्षण पाए जाते है:-
i. आवाज का पतली होना।
ii. स्तनों का विकास होना।
iii. जननांगों पर बाल आना।
iv. कमर के नीचे वाले भाग का बड़ा होना।
v. मासिक चक्र का आरम्भ होना।
vi. कंकाल पेशियों का विकास होना।

महिलाओं के द्वितीयक लैंगिक लक्षणों का क्रम निम्न प्रकार से होता है-
i. थेलार्की – स्तनों का विकास।
ii. प्यूबार्की – जननांगों पर बाल आना।
iii. मिनार्की – मासिक चक्र का आरम्भ होना,
• मासिक चक्र 12 से 14 वर्ष की आयु में प्रारम्भ होता है।
iv. मिनापॉज – मासिक चक्र 50-55 वर्ष की आयु में बंद हो जाता है।

ओस्ट्रियोपोरोसिस:- 50 से 55 वर्ष की आयु में महिलाओं में मिनापॉज अवस्था आ जाती है जिससे उनकी कंकाल पेशियों का विकास रुक जाता है तथा हड्डियों में छेद होने शुरू हो जाते हैं।
• मिनापॉज अवस्था में एस्ट्रोजन हार्मोन की कमी हो जाती है।

प्यूबर्टी/किशोरावस्था:- महिला तथा पुरुष में द्वितीयक लैंगिक लक्षणों का प्रकट होना किशोरावस्था कहलाता है।
• पुरुषों में यह लक्षण 14-16 वर्ष की आयु में दिखाई देते हैं।
• महिलाओं में यह लक्षण 12-14 वर्ष की आयु में दिखाई देते हैं।

प्रिकानसियस प्यूबर्टी:- समय से पूर्व किशोरावस्था का आगमन प्रिकानसियस प्यूबर्टी कहलाता है।
• मनोरंजन के साधन इनका कारण है। जैसे- टी.वी., मोबाइल, कम्प्यूटर आदि।

अपरा/प्लेसेन्टा:-
• अपरा निर्माण निषेचन के बाद होता है।
• अपरा नामक संरचना केवल गर्भवती महिला में पाई जाती है।

अपरा के निम्न कार्य होते हैं-
• भ्रुण को पोषण देना।
• भ्रुण को 02 देना।
• भ्रुण के शरीर में निर्मित उत्सर्जी पदार्थों को बाहर निकालना।

अपरा से निकलने वाले हार्मोन निम्न है-
1. H.C.G. (हयूमन कोरोनिक गोन्डोट्रॉपिक हार्मोन)
• इस हार्मोन की सहायता से महिला अपनी प्रेंगनेंसी टेस्ट कर सकती है इसलिए इसे प्रेंगनेंसी टेस्ट हार्मोन कहा जाता है।
• वर्तमान में इस हार्मोन का दुरूपयोग लिंग निर्धारण में होता है जिससे कन्या भ्रुण हत्या हो रही है।

2. R.H. (रिलेम्सिग हार्मोन):-
• गर्भाशय मे संकुचन को प्रेरित करता है।

ऐमनियोसेन्टेसिस:-
• ये एक रायासनिक पदार्थ है जो योनि से निकाला जाता है।
• ऐमनियोसेन्टेसिस पदार्थ की सोनोग्राफी करके लिंग निर्धारण किया जाता है।
• सोनोग्राफी में x-किरणों का उपयोग किया जाता है।