सरकारी विधेयक और गैर सरकारी विधेयक में अंतर
सरकारी विधेयक | गैर सरकारी विधेयक |
इसे संसद में मंत्री द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। | इसे संसद में मंत्री के अलावा किसी भी सदस्य द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। |
यह सरकार की नीतियों को प्रदर्शित करता है। | यह सार्वजनिक मामले पर विपक्षी दल के मंतव्य को प्रदर्शित करता है। |
संसद द्वारा इसके पारित होने की पूरी उम्मीद होती है। | इसके संसद में पारित होने की कम उम्मीद होती है। |
सदन द्वारा अस्वीकृत होने पर सरकार को इस्तीफा देना पड़ सकता है। | इसके अस्वीकृत होने पर सरकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। |
सदन में प्रस्तुत करने के लिए सात दिनों का नोटिस होना चाहिए। | सदन में प्रस्तुत करने के लिए ऐसे प्रस्ताव के लिए एक माह का नोटिस होना चाहिए। |
इसे संबंधित विभाग द्वारा विधि विभाग के परामर्श से तैयार किया जाता है। | इसका निर्माण संबंधित सदस्य की जिम्मेदारी होती है। |
संसद की प्रमुख वित्तीय समितियाँ-
संसद की निम्न वित्तीय समितियाँ है-
1. लोकलेखा समिति –
स्थापना – इस समिति की स्थापना 1921 में भारत सरकार अधिनियम 1919 के तहत की गई और यह संसदीय समितियों में सबसे प्राचीन समिति है।
गठन – एक वर्ष के लिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व के एकल-संक्रमणीय मत द्वारा।
सदस्य संख्या – 22 (15 लोकसभा तथा 7 राज्यसभा सदस्य)
कार्य – (1) नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की वार्षिक रिपोर्ट की जाँच करना अर्थात̖ सार्वजनिक व्यय की जाँच करना। (2) भारत सरकार के वार्षिक वित्तीय खातों तथा सदन के समक्ष प्रस्तुत अन्य खातों की जाँच करना। (3) विनियोग लेखों की जाँच करना।
अध्यक्ष की नियुक्ति – लोकसभा के अध्यक्ष द्वारा नियुक्त किया जाता है। सामान्यत: विपक्षी पार्टी के किसी सदस्य को इसका अध्यक्ष चुना जाता है।
लोकलेखा समिति को प्राक्कलन समिति की ‘जुडवाँ’ बहन तथा ‘रखवाला कुत्ता’ के नाम से भी जाना जाता हैं।
2. प्राक्कलन समिति –
स्थापना – 1950 में ‘जॉन मथाई’ की सिफारिश पर की गयी। यह वर्तमान स्थायी समितियों में सबसे बड़ी समिति है।
गठन – एक वर्ष के लिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व के एकल-संक्रमणीय मत द्वारा।
सदस्य संख्या – 30 सभी लोकसभा से।
कार्य – (1) वित्तीय प्रशासन में मितव्ययता लाने और प्रशासन में कुशल एवं वैकल्पिक नीतियों के संबंध में सुझाव देना। (2) समिति यह भी निश्चित करती है कि अनुमानों में निहित नीति की सीमा के अंतर्गत धन का समुचित वितरण किया गया अथवा नहीं?
अध्यक्ष की नियुक्ति – लोकसभा के अध्यक्ष द्वारा।
3. सार्वजनिक उपक्रम समिति –
स्थापना – 1 मई 1964 में कृष्णा मेनन समिति के सुझाव पर।
गठन – एक वर्ष के लिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व के एकल-संक्रमणीय मत द्वारा।
सदस्य संख्या – 22 (15 लोकसभा तथा 7 राज्यसभा सदस्य)
कार्य – (1) सरकारी उपक्रमों के लेखा एवं रिपोर्ट का परीक्षण (2) सरकारी उपक्रमों पर कैग की रिपोर्ट का परीक्षण (3) सरकारी उपक्रमों का व्यवसाय के सिद्धांतों एवं वाणिज्य प्रयोग के तहत काम का परीक्षण।
अध्यक्ष की नियुक्ति – लोकसभा अध्यक्ष द्वारा।
धन विधेयक व सामान्य विधेयक में अन्तर
धन विधेयक | सामान्य विधेयक |
केवल लोकसभा में प्रस्तुत किया जाता है। | किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है। |
प्रस्तुत करने से पूर्व राष्ट्रपति की अनुमति जरूरी है। | राष्ट्रपति की पूर्वानुमति आवश्यक नहीं है। |
संयुक्त अधिवेशन का प्रावधान नहीं है। | संयुक्त अधिवेशन का प्रावधान है। |
राज्यसभा इसको संशोधित या अस्वीकृत नहीं कर सकती है। | राज्यसभा द्वारा संशोधित एवं अस्वीकृत किया जा सकता है। |
राज्यसभा अधिकतम 14 दिन तक रोक सकती है। | राज्यसभा अधिकतम 6 माह तक रोक सकती है। |
संविधान के अनु. 110 के तहत धन विधेयक को परिभाषित किया गया है जिसमें भारत की संचित निधि से धन का विनियोग, व्यय की रकम बढ़ाना, संचित निधि में धन जमा कराना या निकालना आता है।
धन विधेयक और वित्त विधेयक में अन्तर
क्र.सं. | धन विधेयक | वित्त विधेयक |
1 | धन विधेयक को पारित करने की प्रक्रिया अनु.109 में दी गयी है। | वित्त विधेयक को पारित करने की प्रक्रिया अनु.117 में दी गयी है। |
2 | धन विधेयक का विषय क्षेत्र वित्त विधेयक की अपेक्षा सीमित होता है अत: प्रत्येक धन विधेयक होता है। | वित्त विधेयक धन विधेयक से व्यापक होता है, अत: प्रत्येक वित्त विधेयक धन विधेयक नहीं होता है। |
3 | धन विधेयक का विषय क्षेत्र वित्त विधेयक की अपेक्षा सीमिति होता है अत: प्रत्येक धन विधेयक वित्त विधेयक होता है। | वित्त विधेयक धन विधेयक से व्यापक होता है, अत: प्रत्येक वित्त विधेयक धन विधेयक नहीं होता है। |
4 | धन विधेयक को राज्यसभा में पेश नहीं किया जा सकता है। | अनु. 117 (3) के अधीन आने वाले वित्त विधेयक को छोड़कर अन्य वित्त विधेयकों को भी राज्यसभा में पेश नहीं किया जा सकता है। |
5 | धन विधेयक राज्यसभा द्वारा पारित नहीं किया जाता है वरन सिफारिश सहित या रहित लौटा दिया जाता है। | वित्त विधेयक को दोनों सदनों द्वारा पारित किया जाता है। |
6 | धन विधेयक के संबंध में संयुक्त बैठक का प्रावधान नहीं है। | वित्त विधेयक के संबंध में संयुक्त बैठक बुलायी जा सकती है। |
लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर)
• अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव लोकसभा की प्रथम बैठक में निर्वाचित सदस्यों द्वारा किया जाता है।
• अध्यक्ष अपना त्याग पत्र उपाध्यक्ष को, उपाध्यक्ष अपना त्याग पत्र अध्यक्ष को देता है।
• लोकसभा के अध्यक्ष व उपाध्यक्ष को तात्कालिक समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित संकल्प द्वारा हटाया जाता है लेकिन इनकी जानकारी 14 दिन पूर्व अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष को देनी होती है।
• अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष दोनों का पद रिक्त होने पर ऐसा सदस्य अध्यक्ष व उपाध्यक्ष के कर्त्तव्यों का पालन करता है जिसको राष्ट्रपति नियुक्त करता है।
• अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष की अनुपस्थिति में लोकसभा द्वारा अवधारित व्यक्ति अध्यक्ष के कर्त्तव्यों का पालन करेगा।
• जब लोकसभा अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष को पद से हटाने का संकल्प लोकसभा में विचाराधीन हो तब वह उसकी अध्यक्षता नहीं करेगा लेकिन उसे बोलने तथा कार्यवाही में भाग लेने का पूरा अधिकार है।
• प्रथमत: मतदान में भाग नहीं लेता है किन्तु किसी प्रश्न पर सदन में बराबर मत आने की स्थिति में वह निर्णायक मत देता है।
अध्यक्ष की शक्तियाँ एवं कार्य -
(i) लोकसभा एवं राज्यसभा के संयुक्त अधिवेशन में अध्यक्षता करता है।
(ii) कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं इस बात का निर्णय अध्यक्ष ही करता है।
(iii) दल-बदल के आधार पर अयोग्यता संबधी प्रश्नों का निर्णय करता है।
(iv) बराबर मत होने की दशा में निर्णायक मत देने का अधिकार है।
• संसदीय शासन व्यवस्था होने के कारण कार्यपालिका को (मंत्रिपरिषद) व्यवस्थापिका (लोकसभा) के नियंत्रण में कार्य करना पड़ता है।
लोकसभा के अध्यक्ष
क्र.सं. | नाम | अवधि |
1 | जी.वी. मावलंकर | 15 मई 1952 – 27 फरवरी 1956 |
2 | एम.ए. अयंगर | 1956-1962 |
3 | सरदार हुकुम सिंह | 1962-1967 |
4 | एन. संजीव रेड्डी | 1967-1969 |
5 | जी.एस. ढिल्लो | 1969-1975 |
6 | बलिराम भगत | 1976-1977 |
7 | एन. संजीव रेड्डी | 26 मार्च 1977 – 13 जुलाई 1977 |
8 | के.एम. हेगड़े | 1977-1980 |
9 | बलराम जाखड़ | 1980-1989 |
10 | रवि रे | 1989-1991 |
11 | शिवराज पाटिल | 1991-1996 |
12 | पी.ए. संगमा | 1996-1998 |
13 | जी.एम.सी. बालयोगी | 1998-2002 |
14 | मनोहर जोशी | 2002-2004 |
15 | सोमनाथ चटर्जी | 2004-2009 |
16 | मीरा कुमार | 2009-2014 |
17 | सुमित्रा महाजन | 2014-2019 |
18 | ओम बिड़ला | 19 जून 2019 से |
कार्यवाहक या सामयिक अध्यक्ष (प्रोटेम स्पीकर)
जब नवीन लोकसभा चुनी जाती है तब राष्ट्रपति लोकसभा के उस व्यक्ति को कार्यवाहक अध्यक्ष नियुक्त करता है जिसे लोकसभा सदस्य होने का सबसे लम्बा अनुभव होता है। राष्ट्रपति उस सामयिक अध्यक्ष को शपथ दिलाता है। वह मुख्यत: दो कार्य करता है-
1. नई लोकसभा के सदस्यों को शपथ दिलवाना
2. लोकसभा की प्रथम बैठक की अध्यक्षता करना।
संविधान तथा लोकसभा प्रक्रिया नियमों के अंतर्गत तथा अन्यथा प्रोटेम स्पीकर को वे सारी शक्तियाँ प्राप्त हैं जो कि अध्यक्ष को होती हैं तथापि वह तभी तक कार्य करता है जब तक लोकसभा द्वारा अध्यक्ष का निर्वाचन नहीं कर लिया जाता।प्रथम बैठक में अध्यक्ष चुने जाने के बाद उसका पद स्वत: ही समाप्त हो जाता है। (17 वीं लोकसभा में डॉ. वीरेन्द्र कुमार के द्वारा प्रोटेम स्पीकर की भूमिका निभाई गई थी।


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