संसद 










संसद की शक्तियाँ

लोकसभा

राज्यसभा

विधायी शक्तियाँ

भारतीय संविधान ने संसद को संघ सूची, समवर्ती सूची, अवशिष्ट विषयों पर कानूनों का निर्माण करने का अधिकार दिया है। कोई भी साधारण विधेयक लोकसभा या राज्यसभा में से किसी एक में प्रस्तावित किया जा सकता है। प्रस्तावित विधेयक दोनों सदनों में पारित होने के बाद राष्ट्रपति के पास अनुमति हेतु भेजा जाता है।

संविधान के अनुच्छेद 108(1) के अनुसार यदि संसद के दोनो सदनों में किसी विधेयक को लेकर सहमति ना हो तो संयुक्त अधिवेशन बुलाया जा सकता है।

कार्यपालिका शक्ति

कार्यपालिका क्षेत्र में संसद में लोकसभा की शक्ति व्यापक है। लोकसभा कार्यपालिका पर नियंत्रण रखती है। मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति ही उत्तरदायी होती है। मंत्रिपरिषद के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लोकसभा में ही लाया जा सकता है। लोकसभा समय-समय पर मंत्रियों से उनके विभागों के कार्यों एवं उपलब्धियों के संबंध में प्रश्न कर सकती है। लोकसभा सदस्य स्थगन प्रस्ताव या काम रोको प्रस्ताव तथा अन्य प्रस्तावों के माध्यम से मंत्रियों के कार्यों की आलोचना कर सकते है।

कार्यपालिका क्षेत्र में राज्यसभा की शक्तियाँ लोकसभा की अपेक्षा बहुत कम है। राज्यसभा को मंत्रियों के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव रखने की शक्ति प्राप्त नहीं है, पर मंत्रियों से उनके विभागों के संबंध में प्रश्न किए जा सकते हैं। राज्यसभा के सदस्य स्थगन या काम रोको प्रस्ताव द्वारा मंत्रियों के कार्यों की आलोचना कर सकते हैं।

वित्तीय शक्ति

भारतीय संविधान द्वारा वित्तीय क्षेत्र के संबंध में शक्ति लोकसभा को ही प्रदान की गई है। धन विधेयक लोकसभा में ही प्रस्तावित किए जा सकते हैं। लोकसभा से पारित होने के बाद धन विधेयक राज्यसभा को भेजा जाता है। वार्षिक बजट और अनुदान संबंधी माँग भी लोकसभा के समक्ष ही रखी जाती है और इस प्रकार के समस्त व्यय की स्वीकृति देने का एकाधिकार लोकसभा को ही प्राप्त है।

राज्यसभा को वित्तीय क्षेत्र में लोकसभा की तुलना में काफी कम शक्तियाँ प्राप्त हैं। लोकसभा में पारित धन विधेयक को राज्यसभा के पास भेजा जाता है। राज्यसभा द्वारा 14 दिनों के अन्दर धन विधेयक पर अपना विचार लोकसभा को नहीं भेजती है, तो विधेयक पारित माना जाता है।

 

 

 

 

 

संविधान संशोधन संबंधित विधेयक

संविधान संशोधन के संबंध में लोकसभा और राज्यसभा दोनों को समान अधिकार प्राप्त हैं। संविधान संशोधन से संबंधित विधेयक संसद के किसी भी सदन में प्रस्तावित किया जा सकता है पर जिस सदन में प्रस्तावित किया जाता है उसमें विधेयक के पारित हो जाने के बाद दूसरे सदन में पारित किया जाता है और दोनों सदनों में पारित हो जाने के बाद विधेयक राष्ट्रपति के पास अनुमति के लिए भेजा जाता है।

यदि दोनों सदनों में संविधान संशोधन संबंधी विधेयक पर असहमति हो तो संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक का कोई प्रावधान नहीं है। व्यवहार में, अब तक तीन बार दोनों सदनों के मध्य मतभेद की स्थिति पैदा हुई-

  1. 1970 में राजाओं के प्रिवीपर्स समाप्ति का संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में पारित परन्तु राज्यसभा ने अस्वीकृत कर दिया।

  2. 1978 में 45वें संविधान संशोधन को लोकसभा में पारित कर दिया किन्तु राज्यसभा ने पाँच संशोधन किए, जिसे बाद में लोकसभा ने स्वीकार कर लिया।

  3. 1989 में 64वें और 65वें संविधान संशोधन विधेयकों को लोकसभा द्वारा पारित किए जाने के बाद राज्सभा में उसे समर्थन नहीं मिला। 

विविध शक्तियाँ

राष्ट्रपति का निर्वाचन, उपराष्ट्रपति का निर्वाचन, राष्ट्रपति द्वारा जारी की गई आपात उघोषणाओं का अनुमोदन, राष्ट्रपति पर महाभियोग, राष्ट्रपति द्वारा जारी अध्यादेशों का अनुमोदन, उपराष्ट्रपति, उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के मुख्य एवं अन्य न्यायाधीशों, महालेखा परीक्षकों, निर्वाचन आयुक्त आदि की पदमुक्ति।

 

लोकसभा के समान

विशिष्ट शक्तियाँ

  1. अनु. 118 (4) के अन्तर्गत दोनों सदनों की संयुक्त बैठक होने पर लोकसभाध्यक्ष उसकी अध्यक्षता करता है तथा अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष की अनुपस्थिति में राज्यसभा का उप सभापति अध्यक्षता करता है।

  2. अनु. 110 (3) के अन्तर्गत कोई विधेयक धन-विधेयक है अथवा नहीं इसका निर्धारण लोकसभा अध्यक्ष ही करते हैं।

  3. कार्यपालिका के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लोकसभा में ही लाये जा सकते हैं।

  4. स्थगन प्रस्ताव अविश्वास प्रस्ताव, केवल लोकसभा में ही लाये जा सकते हैं।

  1. अनुच्छेद 67 के अनुसार उपराष्ट्रपति की पदच्युति हेतु आवश्यक है कि पहले प्रस्ताव राज्यसभा में पारित किया जाए।

  2. अनुच्छेद 249 के अनुसार राज्यसभा राज्य सूची के किसी विषय को राष्ट्रीय महत्व घोषित कर सकती है।

  3. अनुच्छेद 312 के अनुसार राज्यसभा प्रस्ताव पारित कर नई अखिल भारतीय सेवाएँ स्थापित करने का अधिकार संसद को दे सकती है।

  • अनुच्छेद 109 के अनुसार धन विधेयक केवल लोकसभा में ही प्रस्तावित किये जाते है। वार्षिक बजट एवं अनुदान संबधी माँगें भी लोकसभा के समक्ष ही रखी जाती है।
  • किसी विधेयक पर दोनों सदनों में पूर्ण सहमति न होने पर राष्ट्रपति अनुच्छेद 108 के तहत संयुक्त अधिवेशन बुला सकता है जिसकी अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष द्वारा की जाती है। यह अधिवेशन सिर्फ साधारण विधेयक व वित्त विधेयक के सम्बन्ध में ही बुलाया जाता है जबकि धन विधेयक व संविधान संशोधन विधेयक के संबंध में नहीं बुलाया जाता है अभी तक 3 बार संयुक्त अधिवेशन बुलाया जा चुका है जो निम्न है-

विधेयक

वर्ष

प्रधानमंत्री

दहेज प्रतिषेध विधेयक, 1960

1961

जवाहरलाल नेहरू

बैकिंग सेवा आयोग विधेयक

1978

मोरारजी देसाई

आंतकवाद निरोधक अध्यादेश

2002

अटल बिहारी वाजपेयी

  • संयुक्त अधिवेशन की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष की अनुपस्थिति में लोकसभा उपाध्यक्ष करता है यदि वह भी अनुपस्थित हो तो राज्यसभा का उपसभापति करता है। अत: संयुक्त अधिवेशन की अध्यक्षता राज्यसभा का सभापति (उपराष्ट्रपति) नहीं करता है क्योंकि वह किसी भी सदन का सदस्य नहीं होता है।
  • संयुक्त बैठक का कोरम दोनों सदनों की कुल सदस्य संख्या का 1/10 भाग होती है।
  • किसी भी विधेयक की स्वीकृति के सम्बन्ध में राष्ट्रपति के पास अनुच्छेद 111 के अनुसार तीन विकल्प होते हैं-

(A) अनुमति दे दे।
(B) अनुमति रोक सकता है
(C) अपने सुझाव के साथ पुनर्विचार के लिए लौटा सकता है।

  • किन्तु दोनों सदन विधेयक को पुन: संशोधन सहित पारित कर देते हैं तो राष्ट्रपति विधेयक पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य होता है।

संसद में सामान्य प्रक्रिया
प्रश्नकाल: बैठक के पश्चात कार्यवाही का प्रथम घंटा (दोपहर-11-12) इसमें संसद सदस्यों द्वारा लोक महत्व के राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय मामलों पर प्रश्न पूछे जाते हैं। इसमें तीन प्रकार के प्रश्न पूछे जाते हैं।
(i) तारांकित प्रश्न : वह प्रश्न जिनका उत्तर तुरन्त मौखिक रूप में दिया जाये। इसमें पूरक प्रश्न पूछा जा सकता है।
(ii) अतारांकित प्रश्न : प्रश्न का उत्तर लिखित रूप में दिया जाता है पूरक प्रश्न नहीं पूछे जाते हैं।
(iii) अल्प सूचना प्रश्न : लोक महत्व के तात्कालिक मामलो से संबधित जिनका उत्तर मौखिक में तात्कालिक दिया जाता है।

शून्यकाल : प्रश्नकाल के तुरन्त बाद का एक घंटे का समय जिसमें बिना पूर्व सूचना के सार्वजनिक महत्व का कोई भी प्रश्न उठाया जा सकता है। इस प्रकार संसदीय व्यवस्था में शून्यकाल भारत की देन है।

- इसके अलावा भी संसदीय प्रस्ताव है जिसमें स्थगन प्रस्ताव, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, विशेषाधिकार प्रस्ताव, निन्दा प्रस्ताव, कटौती प्रस्ताव, अविश्वास प्रस्ताव, विश्वास प्रस्ताव इत्यादि हैं।