भारत में संवैधानिक विकास
- किसी भी देश के संविधान का निर्माण सदैव उसके अतीत की नींव पर किया जाता है। अत: किसी भी संविधान को समझने के लिए उसकी पृष्ठभूमि तथा उसके इतिहास को जानना जरूरी होता है। भारत के संविधान का निर्माण भी एक दिन में बनकर तैयार नहीं हुआ है, उसे एक लम्बी विकास यात्रा तय करनी पड़ी है।
- भारत में ब्रिटिश 31 दिसंबर, 1600 ई. में ईस्ट इंडिया कम्पनी के रूप में, व्यापार करने आए। महारानी एलिजाबेथ प्रथम के चार्टर द्वारा उन्हें भारत में व्यापार करने के अधिकार प्रदान किए गए। कम्पनी के शासन को नियंत्रित करने के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा विभिन्न एक्ट बनाए गये जो इस प्रकार हैं-
1773 का अधिनियम –
- 1773 ई. में पारित एक्ट को रेगुलेटिंग एक्ट कहा जाता है। इस अधिनियम का अत्यधिक संवैधानिक महत्व है क्योंकि-
- भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी के कार्यों को नियमित तथा नियंत्रित करने की दिशा में ब्रिटिश सरकार का यह पहला कदम था।
- इसके द्वारा पहली बार कम्पनी के प्रशासनिक और राजनीतिक कार्यों को मान्यता मिली।
- इसके द्वारा भारत में केंद्रीय प्रशासन की नींव रखी गई।
- इस अधिनियम ने कम्पनी के शासन के लिए पहली बार एक लिखित संविधान प्रस्तुत किया और सुनिश्चित शासन-पद्धति का श्रीगणेश किया।
- इस अधिनियम द्वारा बंगाल के 'गवर्नर' को बंगाल का 'गवर्नर जनरल' बनाया गया तथा लार्ड वारेन हेस्टिंग्स बंगाल के प्रथम गवर्नरों जनरल बने।
- बम्बई तथा मद्रास के गर्वनरों को बंगाल के गवर्नर जनरल के अधीन कर दिया गया।
- गवर्नर जनरल की सहायता के लिए एक चार सदस्यीय कार्यकारी परिषद का गठन किया गया।
- 1774 में फोर्ट विलियम (कलकत्ता) में 'एपेक्स न्यायालय के रूप में उच्चतम न्यायालय की स्थापना' की गई, जिसके प्रथम मुख्य न्यायाधीश एलिजाह एम्प्रे बने।
1784 का अधिनियम –
- रेगुलेटिंग एक्ट की कमियों को दूर करने के लिए यह अधिनियम लाया गया था। इस अधिनियम का नाम तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री पिट्स द यंगर के नाम पर रखा गया।
- इसने कम्पनी के राजनैतिक तथा वाणिज्यिक कार्यों को पृथक-पृथक कर दिया।
- इसके तहत भारत से सम्बंधित मामलों को ब्रिटिश सरकार के प्रत्यक्ष नियंत्रण में लाया गया।
- कम्पनी के राजनैतिक मामलों के संचालन के लिए 'बोर्ड ऑफ कन्ट्रोल' (नियंत्रक मंडल) की तथा प्रशासनिक मामलों के लिए बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स (निदेशक मण्डल) की स्थापना की गई।
- इसी एक्ट के तहत भारत में कम्पनी के अधीन क्षेत्र को पहली बार ब्रिटिश आधिपत्य का क्षेत्र कहा गया।
1833 का अधिनियम –
- ब्रिटिश भारत के केन्द्रीयकरण की दिशा में यह अधिनियम निर्णायक कदम था। इसकी मुख्य विशेषताएँ निम्न हैं-
- इसके तहत बंगाल के गवर्नर जनरल को भारत का गवर्नर जनरल बनाया गया तथा उसे समूचे देश के प्रशासन का कार्यभार सौंपा गया।
- लार्ड विलियम बैंटिक भारत के प्रथम गवर्नर जनरल बनाए गए।
- ईस्ट इंडिया कम्पनी के व्यापारिक एकाधिकार की पूर्ण समाप्ति कर दी गई।
- गवर्नर जनरल की कार्यकारी परिषद में चौथे सदस्य के रूप में लार्ड मैकाले की नियुक्ति की गई। मैकाले को आधुनिक शिक्षा का जनक माना जाता है।
- भारत में कानूनों को संचालित तथा सुधारने के लिए एक विधि आयोग की स्थापना की गई।
- भारत में दास प्रथा को गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया।
1853 का अधिनियम –
- ब्रिटिश संसद द्वारा पारित किए गए चार्टर अधिनियमों की श्रृंखला में यह अंतिम अधिनियम था। इस अधिनियम की निम्नलिखित विशेषताएँ थीं -
- सम्पूर्ण भारत के लिए एक विधानमण्डल की स्थापना की बात कही गई।
- गवर्नर जनरल की परिषद के विधायी एवं प्रशासनिक कार्यों को अलग कर दिया गया।
- इसमें सिविल सेवकों की भर्ती एवं चयन हेतु खुली प्रतियोगी परीक्षा व्यवस्था का शुभारंभ किया गया था। इस प्रकार विशिष्ट सिविल सेवा भारतीय नागरिकों के लिए भी खोल दी गई।
- इसने प्रथम बार भारतीय केन्द्रीय विधान परिषद् में स्थानीय प्रतिनिधित्व प्रारम्भ किया।
- लॉर्ड डलहौजी ने प्रसन्न कुमार टैगोर को गवर्नर जनरल परिषद् का सचिव नियुक्त किया।
1858 का भारत शासन अधिनियम –
- भारत के शासन को अच्छा बनाने वाला अधिनियम के नाम से प्रसिद्ध इस कानून को भारत के शिक्षित वर्ग ने अपने अधिकारों का मैग्नाकार्टा की संज्ञा दी। इस अधिनियम की मुख्य विशेषताएँ निम्नवत हैं-
- इसके तहत ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त कर दिया गया तथा भारत का शासन सीधे महारानी विक्टोरिया अर्थात् ब्रिटिश ताज के अधीन चला गया।
- गवर्नर जनरल को वायसराय की उपाधि प्रदान की गई। अब वह भारत में ब्रिटिश ताज का प्रत्यक्ष प्रतिनिधि बन गया। लॉर्ड कैनिंग भारत के प्रथम वायसराय बने।
- भारत का शासन ब्रिटिश ताज की ओर से चलाने के लिए भारत मंत्री या भारत सचिव का गठन किया गया तथा उसकी सहायता के लिए 15 सदस्यीय भारत परिषद् का गठन किया गया।
- भारत सचिव ब्रिटिश कैबिनेट का सदस्य था तथा यह भारत के प्रशासन का निरीक्षण, निर्देशन तथा नियंत्रण करता था एवं संपूर्ण भारत के प्रशासन के लिए ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदायी होता था। सर चार्ल्स वुड प्रथम भारत सचिव बने।
- इस अधिनियम द्वारा भारतीय मामलों पर ब्रिटिश संसद का सीधा नियंत्रण स्थापित किया गया।
1861 का भारतीय परिषद् अधिनियम –
- यह अधिनियम भारतीय संवैधानिक और राजनीतिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण अधिनियम था जिसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्न थी-
- केन्द्र तथा प्रान्तों में विधानपरिषदों की स्थापना की गई।
- विभागीय प्रणाली या 'पोर्टफोलिया व्यवस्था' को इसने वैधानिक मान्यता प्रदान की। इस प्रकार भारत में मंत्रिमंडलीय व्यवस्था की नींव रखी गई जिसके जनक लॉर्ड कैनिंग माने जाते हैं
- गवर्नर जनरल को आपातकाल में विधानपरिषद की अनुमति के बिना अध्यादेश जारी करने के लिए अधिकृत किया गया तथा विधेयक पर वीटो की शक्ति भी प्रदान की गई।
- कलकत्ता, बम्बई तथा मद्रास में उच्च न्यायालयों की स्थापना का प्रावधान किया गया।
भारत परिषद अधिनियम-1892 –
भारत परिषद् अधिनियम-1892 की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
- इस अधिनियम द्वारा पहली बार निर्वाचन पद्धति की शुरूआत की गई, परन्तु यह पद्धति परोक्ष निर्वाचन की थी अर्थात् केन्द्रीय विधानमण्डल में 5 गैर-सरकारी सदस्यों की नियुक्ति प्रान्तीय विधान मण्डल के सदस्यों द्वारा की जानी थी। गवर्नर जनरल की विधान परिषद् का नाम भारतीय विधान परिषद् हो गया।
- परिषद के सदस्यों को सीमित मात्रा में प्रश्न पूछने तथा बजट पर विचार-विमर्श का अधिकार प्रदान किया गया।
- इस अधिनियम द्वारा संसदीय शासन परोक्ष रूप से प्रारम्भ हुआ तथा प्रतिनिधि शासन की नींव डाली गई।
1909 का भारत शासन अधिनियम –
- भारतीय संवैधानिक विकास की पृष्ठभूमि में 1909 के अधिनियम के प्रावधान महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इन प्रावधानों के परिणामस्वरूप भारत में संवैधानिक विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ था।
- सन् 1907 के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस का दो भागों में बँटवारा हुआ – नरम दल और गरम दल।
- सन् 1906 में ढ़ाका पश्चिम बंगाल मुस्लिम लीग की स्थापना के फलस्वरूप सर अरूण्डेल समिति की सिफारिश पर सन् 1909 का अधिनियम पारित किया गया, जिसे मॉर्ले मिंटो अधिनियम कहा जाता है।
- इस अधिनियम को मॉर्ले मिण्टो सुधार अधिनियम के नाम से भी जाना जाता है।
- इस समय लॉर्ड मॉर्ले इंग्लैण्ड में भारत के राज्य सचिव थे और मिंटो भारत में वायसराय थे।
- इस अधिनियम ने पृथक निर्वाचन के आधार पर मुस्लिमों के लिए साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व का प्रावधान किया, इसके अन्तर्गत मुस्लिम सदस्यों का चुनाव मुस्लिम मतदाता ही कर सकते थे।
- इस प्रकार इस अधिनियम ने सांप्रदायिकता को वैधानिकता प्रदान की। इसलिए लॉर्ड मिंटो को साम्प्रदायिक निर्वाचन के जनक के रूप में जाना जाता है।
- इस अधिनियम में केन्द्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों के आकार में वृद्धि की गई।
- केन्द्रीय परिषद की सदस्य संख्या 16 के स्थान पर 60 हो गई। प्रान्तीय विधान परिषदों की संख्या निश्चित नहीं थी।
- गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी परिषद तथा भारत परिषद में भारतीयों की नियुक्ति का प्रावधान किया था।
- सत्येन्द्र प्रसाद सिन्हा वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में प्रथम भारतीय सदस्य बने। सत्येन्द्र प्रसाद को विधि सदस्य बनाया गया था।
- इस अधिनियम में पहली बार सदस्यों को विस्तार से प्रश्न पूछने तथा बजट पर विचार विमर्श का अधिकार दिया गया था।
- बजट की विवेचना, लोकहित के विषयों पर चर्चा तथा अनुपूरक प्रश्न पूछने का अधिकार इस अधिनियम की देन है।
- मुसलमानों के लिए पृथक मताधिकार तथा पृथक निर्वाचन क्षेत्र की व्यवस्था कर ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपनायी गयी।
- पृथक निर्वाचन मण्डल के बार में लॉर्ड मिंटो ने लॉर्ड मोरले को लिखा कि- ‘हम भारत में नाग के बीज बो रहे हैं, जिसका फल विषैला होगा।’
1919 का भारत शासन अधिनियम -
- इस अधिनियम का उद्देश्य भारत में क्रमिक रूप से उत्तरदायी सरकार की स्थापना करना था।
- भारत सचिव मोंटेग्यू के द्वारा संवैधानिक घोषणा की गयी यही घोषणा 1919 के भारत शासन अधिनियम के रूप में पारित हुई।
- इस अधिनियम को मोंटेग्यू चेम्सफोर्ड अधिनियम भी कहा जाता है। मोन्टेग्यू इस समय भारत के सचिव थे जबकि चेम्सफोर्ड भारत के वायसराय पद पर कार्यरत थे।
- साम्प्रदायिक निर्वाचन से उत्पन्न असंतोष, 1916 में कांग्रेस व मुस्लिम लीग में लखनऊ समझौता, के परिणामस्वरूप 1919 का भारत शासन अधिनियम पारित हुआ था।
- इस अधिनियम ने पहली बार भारत में द्विसदनीय व्यवस्था और प्रत्यक्ष निर्वाचन की व्यवस्था प्रारम्भ की थी। इस प्रकार भारतीय विधान परिषद के स्थान पर राज्य परिषद (उच्च सदन) तथा विधान सभा (निम्न सदन) का गठन किया गया।
- इस अधिनियम के अनुसार वायसराय की कार्यकारी परिषद के 6 सदस्यों में से तीन सदस्यों का भारतीय होना अनिवार्य कर दिया गया।
- इसके तहत प्रान्तों में द्वैध शासन तथा आंशिक उत्तरदायी शासन की स्थापना की गई। इसके अंतर्गत प्रान्तीय विषयों को दो भागों में बाँटा गया-(i) आरक्षित विषय (ii)हस्तांतरित विषय
- सम्पत्ति तथा शिक्षा के आधार पर सीमित संख्या में लोगों को मताधिकार प्रदान किया गया तथा जिनकी आय 10 हजार रुपये वार्षिक थी, वही मत दे सकता था।
- प्रान्तों के लिए प्रस्तावित द्वैध-शासन प्रणाली 1 अप्रैल, 1921 को आरंभ की गई जो 1 अप्रैल, 1937 तक लागू रही।
1935 का भारत शासन अधिनियम -
- यह अधिनियम भारत में पूर्ण उत्तरदायी सरकार के गठन में एक मील का पत्थर साबित हुआ। इस अधिनियम की प्रस्तावना 1919 की ही थी तथा भारत के लिए तैयार संवैधानिक प्रस्तावों में यह सबसे बड़ा, जटिल तथा अंतिम अधिनियम था। इस अधिनियम में 14 भाग, 321 धाराएँ तथा 10 अनुसूचियाँ थीं।
- इस अधिनियम के द्वारा प्रान्तों में द्वैध शासन को समाप्त कर दिया गया तथा प्रान्तीय स्वायत्तता का प्रावधान किया गया। प्रान्तीय विषयों पर विधि बनाने का पूर्ण अधिकार प्रान्तों को प्रदान किया गया एवं उन पर से केन्द्र का नियंत्रण समाप्त कर दिया गया जिसके कारण राज्यों में पूर्ण उत्तरदायी सरकार की स्थापना हुई।
- केन्द्र में द्वैध शासन प्रणाली का शुभारंभ किया गया, जिसके अन्तर्गत केन्द्रीय प्रशासन के विषयों को आरक्षित एवं हस्तांतरित में विभाजित किया गया।
- केन्द्र तथा उसकी इकाईयों के मध्य शक्तियों का विभाजन किया गया। संघ सूची में 59 विषय, राज्य सूची में 54 विषय तथा समवर्ती सूची में 36 विषय शामिल किए गए। अवशिष्ट शक्तियाँ गवर्नर जनरल में निहित की गई।
- इसमें ने केवल संघीय लोक सेवा आयोग की स्थापना की गई बल्कि प्रांतीय सेवा आयोग और दो या अधिक राज्यों के लिए संयुक्त सेवा आयोग की स्थापना भी की गई।
- साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व का विस्तार करते हुए उसमें दलितों, महिलाओं तथा मजदूरों को भी शामिल किया गया।
- 1858 द्वारा स्थापित भारत परिषद की समाप्ति कर दी गई।
- उच्चतम न्यायालय तथा रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की स्थापना का प्रावधान किया गया। 1937 में संघीय न्यायालय की स्थापना दिल्ली में हुई जिसके प्रथम मुख्य न्यायाधीश मोरिज गायर बने।
- इसने 11 राज्यों में से छ: द्विसदनीय व्यवस्थाएँ प्रारंभ की गई। इस प्रकार बंगाल, बम्बई, मद्रास, बिहार, संयुक्त प्रांत और असम में द्विसदनीय विधान परिषदें और विधानसभाएँ बन गई।
- 1935 के अधिनियम में कोई प्रस्तावना नहीं जोड़ी गई, अपितु 1919 की प्रस्तावना को ही इसके साथ जोड़ दिया गया।
- आपातकालीन प्रावधान तथा गवर्नर जनरल का वीटो एवं अध्यादेश जारी करने की शक्ति प्रदान की गई।
- पं. जवाहर लाल नेहरू ने 1935 के अधिनियम को ‘दासता का एक नया अधिकार पत्र’ तथा ‘अनेक ब्रेकों वाली परन्तु इंजन रहित मशीन’ की संज्ञा दी है।
- जिन्ना ने इस अधिनियम को पूर्णतया सड़ा हुआ तथा मूलरूप से अस्वीकृत बताया।
- पण्डित मदन मोहन मालवीय ने कहा, कि यह एक्ट ऊपर से लोकतांत्रिक है, परन्तु अंदर से खोखला है।
- उपर्युक्त आलोचनाओं के बावजूद वर्तमान भारतीय संविधान का 2/3 भाग 1935 के अधिनियम से ही ग्रहण किया गया है। स्वतंत्रता के पश्चात नए संविधान के लागू होने तक भारत ने इसी अधिनियम के अंतर्गत शासन कार्य किया था। जेनिंग्स के अनुसार, वर्तमान भारतीय संविधान 1935 के अधिनियम पर ही आधारित है। इस अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार भारत के सन् 1937 में चुनाव कराए गये थे।
- पहली बार केन्द्रीय विधान सभा का गठन 9 फरवरी, 1920 को हुआ था।
- केन्द्रीय विधान सभा के पहले भारतीय अध्यक्ष विट्ठल भाई पटेल थे।
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम-1947 -
- 3 जून, 1947 की माउण्टबेटन योजना के आधार पर भारत के विभाजन की योजना प्रस्तुत की गई। इस योजना के आधार पर 18 जुलाई, 1947 को ब्रिटिश संसद ने भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 पारित किया। इस अधिनियम के द्वारा माउण्टबेटन योजना को वैधानिक रूप दिया गया।
- 14-15 अगस्त, 1947 की मध्य-रात्रि को भारत में ब्रिटिश शासन का अंत हो गया तथा भारत और पाकिस्तान नाम के दो अधिराज्यों की स्थापना हुई।
- लॉर्ड माउण्टबेटन भारत अधिराज्य के प्रथम गवर्नर जनरल बने तथा जवाहरलाल नेहरू को भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में शपथ दिलायी गयी जबकि पाकिस्तान में मुहम्मद अली जिन्ना को गवर्नर जनरल तथा लियाकत अली को प्रधानमंत्री बनाया गया।
- भारत के प्रथम एवं अंतिम भारतीय गवर्नर जनरल सी. राजगोपालाचारी बने तथा 1946 में बनी संविधान सभा को स्वतंत्र भारतीय डोमिनियन की संसद के रूप में स्वीकार कर लिया गया। 15 अगस्त, 1947 से 26 जनवरी, 1950 तक भारत का राजनीतिक दर्जा ब्रिटिश राष्ट्रकुल के एक औपनिवेशिक राज्य का था।
- साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली का विस्तार करते हुए सिक्खों, भारतीय ईसाइयों, आंग्ल-भारतीयों तथा यूरोपियों के लिए भी पृथक निर्वाचन की व्यवस्था की गई।
- इस अधिनियम द्वारा लन्दन में भारतीय उच्चायुक्त की स्थापना की गई।
- सिविल सेवकों की भर्ती के लिए एक केन्द्रीय लोक सेवा आयोग का प्रावधान किया गया। 1923 में गठित ली आयोग की सिफारिशों के आधार पर सर रॉस बार्कर की अध्यक्षता में 1926 में केन्द्रीय लोक सेवा आयोग का गठन किया गया।
- पहली बार केन्द्रीय बजट को राज्यों के बजट से अलग कर दिया गया तथा राज्य विधानसभाओं को अपना बजट स्वयं बनाने के लिए अधिकृत कर दिया गया।
- महिलाओं को मताधिकार प्रदान किया गया। (न्यूजीलैण्ड विश्व का प्रथम ऐसा देश है जिसने 1893 में महिलाओं को मत देने का अधिकार प्रदान किया था।)
- इस अधिनियम द्वारा 10 वर्ष बाद इसकी समीक्षा हेतु एक वैधानिक आयोग के गठन का प्रावधान किया गया था जिसका पालन करते हुए सन् 1927 में साईमन आयोग का गठन किया गया था।
- इस अधिनियम के द्वारा भारत में पहली बार केन्द्रीय तथा प्रान्तीय सरकारों के बीच प्रशासन के समस्त विषयों को दो भागों में विभाजित किया गया जो भारत में संघात्मक व्यवस्था के निर्माण की दिशा में प्रथम प्रयास था।


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