भारत में संवैधानिक विकास
1919 का भारत शासन अधिनियम -
- इस अधिनियम का उद्देश्य भारत में क्रमिक रूप से उत्तरदायी सरकार की स्थापना करना था।
- भारत सचिव मोंटेग्यू के द्वारा संवैधानिक घोषणा की गयी यही घोषणा 1919 के भारत शासन अधिनियम के रूप में पारित हुई।
- इस अधिनियम को मोंटेग्यू चेम्सफोर्ड अधिनियम भी कहा जाता है। मोन्टेग्यू इस समय भारत के सचिव थे जबकि चेम्सफोर्ड भारत के वायसराय पद पर कार्यरत थे।
- साम्प्रदायिक निर्वाचन से उत्पन्न असंतोष, 1916 में कांग्रेस व मुस्लिम लीग में लखनऊ समझौता, के परिणामस्वरूप 1919 का भारत शासन अधिनियम पारित हुआ था।
- इस अधिनियम ने पहली बार भारत में द्विसदनीय व्यवस्था और प्रत्यक्ष निर्वाचन की व्यवस्था प्रारम्भ की थी। इस प्रकार भारतीय विधान परिषद के स्थान पर राज्य परिषद (उच्च सदन) तथा विधान सभा (निम्न सदन) का गठन किया गया।
- इस अधिनियम के अनुसार वायसराय की कार्यकारी परिषद के 6 सदस्यों में से तीन सदस्यों का भारतीय होना अनिवार्य कर दिया गया।
- इसके तहत प्रान्तों में द्वैध शासन तथा आंशिक उत्तरदायी शासन की स्थापना की गई। इसके अंतर्गत प्रान्तीय विषयों को दो भागों में बाँटा गया-
- आरक्षित विषय
- हस्तांतरित विषय
- सम्पत्ति तथा शिक्षा के आधार पर सीमित संख्या में लोगों को मताधिकार प्रदान किया गया तथा जिनकी आय 10 हजार रुपये वार्षिक थी, वही मत दे सकता था।
- साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली का विस्तार करते हुए सिक्खों, भारतीय ईसाइयों, आंग्ल-भारतीयों तथा यूरोपियों के लिए भी पृथक निर्वाचन की व्यवस्था की गई।
- इस अधिनियम द्वारा लन्दन में भारतीय उच्चायुक्त की स्थापना की गई।
- सिविल सेवकों की भर्ती के लिए एक केन्द्रीय लोक सेवा आयोग का प्रावधान किया गया। 1923 में गठित ली आयोग की सिफारिशों के आधार पर सर रॉस बार्कर की अध्यक्षता में 1926 में केन्द्रीय लोक सेवा आयोग का गठन किया गया।
- पहली बार केन्द्रीय बजट को राज्यों के बजट से अलग कर दिया गया तथा राज्य विधानसभाओं को अपना बजट स्वयं बनाने के लिए अधिकृत कर दिया गया।
- महिलाओं को मताधिकार प्रदान किया गया। (न्यूजीलैण्ड विश्व का प्रथम ऐसा देश है जिसने 1893 में महिलाओं को मत देने का अधिकार प्रदान किया था।)
- इस अधिनियम द्वारा 10 वर्ष बाद इसकी समीक्षा हेतु एक वैधानिक आयोग के गठन का प्रावधान किया गया था जिसका पालन करते हुए सन् 1927 में साईमन आयोग का गठन किया गया था।
- इस अधिनियम के द्वारा भारत में पहली बार केन्द्रीय तथा प्रान्तीय सरकारों के बीच प्रशासन के समस्त विषयों को दो भागों में विभाजित किया गया जो भारत में संघात्मक व्यवस्था के निर्माण की दिशा में प्रथम प्रयास था।
- प्रान्तों के लिए प्रस्तावित द्वैध-शासन प्रणाली 1 अप्रैल, 1921 को आरंभ की गई जो 1 अप्रैल, 1937 तक लागू रही।
1935 का भारत शासन अधिनियम -
- यह अधिनियम भारत में पूर्ण उत्तरदायी सरकार के गठन में एक मील का पत्थर साबित हुआ। इस अधिनियम की प्रस्तावना 1919 की ही थी तथा भारत के लिए तैयार संवैधानिक प्रस्तावों में यह सबसे बड़ा, जटिल तथा अंतिम अधिनियम था। इस अधिनियम में 14 भाग, 321 धाराएँ तथा 10 अनुसूचियाँ थीं।
- इस अधिनियम के द्वारा प्रान्तों में द्वैध शासन को समाप्त कर दिया गया तथा प्रान्तीय स्वायत्तता का प्रावधान किया गया। प्रान्तीय विषयों पर विधि बनाने का पूर्ण अधिकार प्रान्तों को प्रदान किया गया एवं उन पर से केन्द्र का नियंत्रण समाप्त कर दिया गया जिसके कारण राज्यों में पूर्ण उत्तरदायी सरकार की स्थापना हुई।
- केन्द्र में द्वैध शासन प्रणाली का शुभारंभ किया गया, जिसके अन्तर्गत केन्द्रीय प्रशासन के विषयों को आरक्षित एवं हस्तांतरित में विभाजित किया गया।
- केन्द्र तथा उसकी इकाईयों के मध्य शक्तियों का विभाजन किया गया। संघ सूची में 59 विषय, राज्य सूची में 54 विषय तथा समवर्ती सूची में 36 विषय शामिल किए गए। अवशिष्ट शक्तियाँ गवर्नर जनरल में निहित की गई।
- इसमें ने केवल संघीय लोक सेवा आयोग की स्थापना की गई बल्कि प्रांतीय सेवा आयोग और दो या अधिक राज्यों के लिए संयुक्त सेवा आयोग की स्थापना भी की गई।
- साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व का विस्तार करते हुए उसमें दलितों, महिलाओं तथा मजदूरों को भी शामिल किया गया।
- 1858 द्वारा स्थापित भारत परिषद की समाप्ति कर दी गई।
- उच्चतम न्यायालय तथा रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की स्थापना का प्रावधान किया गया। 1937 में संघीय न्यायालय की स्थापना दिल्ली में हुई जिसके प्रथम मुख्य न्यायाधीश मोरिज गायर बने।
- इसने 11 राज्यों में से छ: द्विसदनीय व्यवस्थाएँ प्रारंभ की गई। इस प्रकार बंगाल, बम्बई, मद्रास, बिहार, संयुक्त प्रांत और असम में द्विसदनीय विधान परिषदें और विधानसभाएँ बन गई।
- 1935 के अधिनियम में कोई प्रस्तावना नहीं जोड़ी गई, अपितु 1919 की प्रस्तावना को ही इसके साथ जोड़ दिया गया।
- आपातकालीन प्रावधान तथा गवर्नर जनरल का वीटो एवं अध्यादेश जारी करने की शक्ति प्रदान की गई।
- पं. जवाहर लाल नेहरू ने 1935 के अधिनियम को ‘दासता का एक नया अधिकार पत्र’ तथा ‘अनेक ब्रेकों वाली परन्तु इंजन रहित मशीन’ की संज्ञा दी है।
- जिन्ना ने इस अधिनियम को पूर्णतया सड़ा हुआ तथा मूलरूप से अस्वीकृत बताया।
- पण्डित मदन मोहन मालवीय ने कहा, कि यह एक्ट ऊपर से लोकतांत्रिक है, परन्तु अंदर से खोखला है।
- उपर्युक्त आलोचनाओं के बावजूद वर्तमान भारतीय संविधान का 2/3 भाग 1935 के अधिनियम से ही ग्रहण किया गया है। स्वतंत्रता के पश्चात नए संविधान के लागू होने तक भारत ने इसी अधिनियम के अंतर्गत शासन कार्य किया था। जेनिंग्स के अनुसार, वर्तमान भारतीय संविधान 1935 के अधिनियम पर ही आधारित है। इस अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार भारत के सन् 1937 में चुनाव कराए गये थे।
- पहली बार केन्द्रीय विधान सभा का गठन 9 फरवरी, 1920 को हुआ था।
- केन्द्रीय विधान सभा के पहले भारतीय अध्यक्ष विट्ठल भाई पटेल थे।
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम-1947 -
- 3 जून, 1947 की माउण्टबेटन योजना के आधार पर भारत के विभाजन की योजना प्रस्तुत की गई। इस योजना के आधार पर 18 जुलाई, 1947 को ब्रिटिश संसद ने भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 पारित किया। इस अधिनियम के द्वारा माउण्टबेटन योजना को वैधानिक रूप दिया गया।
- 14-15 अगस्त, 1947 की मध्य-रात्रि को भारत में ब्रिटिश शासन का अंत हो गया तथा भारत और पाकिस्तान नाम के दो अधिराज्यों की स्थापना हुई।
- ⇒ लॉर्ड माउण्टबेटन भारत अधिराज्य के प्रथम गवर्नर जनरल बने तथा जवाहरलाल नेहरू को भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में शपथ दिलायी गयी जबकि पाकिस्तान में मुहम्मद अली जिन्ना को गवर्नर जनरल तथा लियाकत अली को प्रधानमंत्री बनाया गया।
- भारत के प्रथम एवं अंतिम भारतीय गवर्नर जनरल सी. राजगोपालाचारी बने तथा 1946 में बनी संविधान सभा को स्वतंत्र भारतीय डोमिनियन की संसद के रूप में स्वीकार कर लिया गया। 15 अगस्त, 1947 से 26 जनवरी, 1950 तक भारत का राजनीतिक दर्जा ब्रिटिश राष्ट्रकुल के एक औपनिवेशिक राज्य का था।


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